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September 05 2026 04:53 am

मनन मिश्रा के खिलाफ प्रदर्शनकारी वकीलों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका, CBI जांच की मांग खारिज

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देश की सर्वोच्च विधिक नियामक संस्था बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और उसके लंबे समय से काबिज अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा के खिलाफ देश भर के वकीलों और कानून के छात्रों में उपजा आक्रोश अब देश की शीर्ष अदालत की दहलीज तक पहुंच चुका है। नई दिल्ली स्थित बीसीआई मुख्यालय में विरोध प्रदर्शन के दौरान युवा वकीलों के साथ हुई कथित मारपीट, बदसलूकी और 'लीगल कॉकरोच' जैसे आपत्तिजनक बयानों के मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से निष्पक्ष जांच कराने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने मामले में सीधे दखल देने से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता वकीलों को तगड़ा कानूनी झटका दिया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि इस मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय एक पूरी तरह सक्षम, प्रभावी और उचित मंच है। इसके साथ ही पीठ ने वकीलों को अपनी मांगों को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की पूरी स्वतंत्रता देते हुए याचिका का निपटारा कर दिया।

बीसीआई दफ्तर में 20-21 अगस्त का बवाल: वकीलों के साथ मारपीट और 'लीगल कॉकरोच' वाला बयान

इस पूरे विवाद की जड़ें 20 और 21 अगस्त 2026 को नई दिल्ली स्थित बार काउंसिल ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय मुख्यालय में घटी उस अभूतपूर्व घटना से जुड़ी हैं, जिसने देश की कानूनी बिरादरी को झकझोर कर रख दिया था। उस दौरान युवा वकीलों और कानून के छात्रों का एक समूह बीसीआई के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा के कथित तानाशाही रवैये, राज्य बार काउंसिलों के चुनावों में देरी और छात्रों के खिलाफ दंडात्मक आदेशों के विरोध में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने पहुंचा था। आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान अज्ञात असामाजिक तत्वों और कुछ गुटों ने प्रदर्शनकारी वकीलों पर हमला कर दिया और उनके साथ जमकर मारपीट की गई।

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी करते हुए अदालत को बताया कि यह केवल वकीलों के दो गुटों के बीच का टकराव नहीं था, बल्कि कानून के रक्षकों को कुचलने की खुली साजिश थी। भूषण ने अदालत के समक्ष बेहद सनसनीखेज आरोप लगाते हुए कहा कि घटना के बाद बीसीआई चेयरमैन की ओर से एक ऐसा बयान जारी किया गया, जिसमें उन्होंने गर्व से यह दावा किया कि वहां कुछ 'लीगल कॉकरोच' (कानूनी तिलचट्टे) विरोध कर रहे थे, जिन्हें उनके वकीलों ने पीटकर वहां से भगा दिया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि जब बार काउंसिल जैसी संवैधानिक और विधिक गरिमा वाली संस्था का शीर्ष पदाधिकारी खुद खुलेआम हिंसा को सही ठहरा रहा हो, तो दिल्ली पुलिस की स्थानीय जांच पर भरोसा नहीं किया जा सकता, इसलिए मामले की जांच निष्पक्ष केंद्रीय एजेंसी यानी सीबीआई को सौंपी जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की दो टूक: 'हर मामले के लिए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाना सही नहीं'

सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस मामले की तत्काल सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के सीधे सुप्रीम कोर्ट आने के औचित्य पर गंभीर सवाल खड़े किए। अदालत ने कहा कि देश के नागरिकों और वकीलों के बीच ऐसा संदेश कतई नहीं जाना चाहिए कि हर विवाद, चाहे वह स्थानीय प्रकृति का ही क्यों न हो, सीधे सुप्रीम कोर्ट में ही सुना जाएगा।

पीठ ने अत्यंत तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, "ऐसा कतई नहीं दिखना चाहिए कि हर मसले को लेकर शीर्ष अदालत ही आना जरूरी है और न ही यह आभास जाना चाहिए कि बीसीआई से जुड़े मामलों में शीर्ष अदालत का कोई संस्थागत पूर्वाग्रह (Institutional Bias) है। जब घटना नई दिल्ली में बीसीआई कार्यालय में घटी है, तो आपके पास दिल्ली हाईकोर्ट के रूप में एक अत्यंत प्रभावी, सक्षम और संवैधानिक मंच पहले से मौजूद है। दिल्ली हाईकोर्ट इस पूरे मामले की सुनवाई करने और उचित राहत देने में पूरी तरह समर्थ है।" पीठ ने वकीलों को नसीहत देते हुए कहा कि अदालत के अधिकारी होने के नाते वकीलों से समाज के सामान्य नागरिकों की तुलना में कहीं अधिक अनुशासन और संस्थागत प्रक्रियाओं के सम्मान की अपेक्षा की जाती है। कानून ने वकीलों की शिकायतों के समाधान के लिए आंतरिक तंत्र और न्यायिक पदानुक्रम बना रखा है, जिसका पालन होना अनिवार्य है।

प्रशांत भूषण की तीखी दलीलें: विरोध का लोकतांत्रिक अधिकार और सुबूत मिटाने की आशंका

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के रुख के जवाब में जोरदार कानूनी दलीलें पेश कीं। उन्होंने कहा कि संविधान के तहत वकीलों को भी देश के किसी भी अन्य नागरिक की तरह शांतिपूर्ण विरोध और असहमति दर्ज कराने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। केवल इसलिए कि वे वकालत के पेशे से जुड़े हैं, उन पर हमला नहीं किया जा सकता और न ही उनकी आवाज को डंडे के बल पर दबाया जा सकता है।

भूषण ने शीर्ष अदालत से तत्काल हस्तक्षेप की गुहार लगाते हुए मुख्य रूप से बीसीआई परिसर के 20 और 21 अगस्त के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज को तत्काल जब्त और सुरक्षित (Preserve) करने का निर्देश देने की मांग की। उन्होंने आशंका जताई कि यदि तुरंत अदालत ने फुटेज को अपनी निगरानी में नहीं लिया, तो घटना के अहम इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और सीसीटीवी रिकॉर्डिंग हमेशा के लिए मिटा दी जाएगी। प्रशांत भूषण ने यह भी तर्क दिया कि चूंकि सुप्रीम कोर्ट पहले से ही बीसीआई के पुनर्गठन, चुनावों और चेयरमैन के कार्यकाल से जुड़े कई संवैधानिक मुकदमों की सुनवाई कर रहा है, इसलिए इस याचिका को भी उसी के साथ सुना जाना न्यायहित में होगा। हालांकि, पीठ के कड़े रुख को देखते हुए अंततः प्रशांत भूषण ने याचिका वापस लेने की सहमति जताई और अदालत से दिल्ली हाईकोर्ट में त्वरित अर्जी दाखिल करने की छूट मांगी, जिसे बेंच ने तुरंत स्वीकार कर लिया।

एक दिन पहले ही पर कतरे थे: सिर्फ 'कार्यवाहक' हैं मनन मिश्रा, एजी-एसजी की सहमति बिना फैसलों पर रोक

सुप्रीम कोर्ट द्वारा वकीलों की इस याचिका को हाईकोर्ट भेजने का यह फैसला उस ऐतिहासिक घटनाक्रम के ठीक 24 घंटे बाद आया है, जब इसी पीठ ने बीसीआई चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के पर पूरी तरह कतर दिए थे। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य बार काउंसिलों के चुनावों और बीसीआई के पुनर्गठन से जुड़े एक बड़े मामले की सुनवाई करते हुए मनन मिश्रा के 2030 तक पद पर बने रहने के दावों को प्रथम दृष्टया खारिज कर दिया था।

अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया था कि नई बार काउंसिल का विधिवत गठन होने तक मनन मिश्रा को केवल एक 'कार्यवाहक' (Pro-Tem) प्रमुख माना जाएगा। इसके साथ ही अदालत ने बीसीआई के कामकाज पर अभूतपूर्व न्यायिक नियंत्रण लगाते हुए आदेश दिया कि अब से बीसीआई का कोई भी बड़ा नीतिगत निर्णय भारत के अटॉर्नी जनरल (AG) और सॉलिसिटर जनरल (SG) की सक्रिय उपस्थिति और लिखित सहमति के बिना नहीं लिया जा सकेगा। सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े आदेश ने स्पष्ट कर दिया था कि बीसीआई की प्रशासनिक मनमानी और अनियंत्रित कार्यप्रणाली पर शीर्ष अदालत की नजर पूरी तरह पैनी है, लेकिन आपराधिक घटनाओं की जांच के लिए स्थापित कानूनी प्रक्रिया को बाइपास नहीं किया जाएगा।

नालसार विवाद से लेकर छात्रों की डिग्री तक: बीसीआई के अधिकार क्षेत्र पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख

बीसीआई चेयरमैन और वकीलों के बीच चल रहे इस टकराव की पृष्ठभूमि प्रतिष्ठित नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी 'नालसार' (NALSAR University of Law, Hyderabad) के दीक्षांत समारोह विवाद से भी जुड़ी हुई है। दरअसल, नालसार के छात्रों ने दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में सीजेआई के आमंत्रण को लेकर कुछ टिप्पणियां की थीं और विरोध जताया था। इससे नाराज होकर बीसीआई चेयरमैन मनन मिश्रा ने देश भर की राज्य बार काउंसिलों को आदेश जारी कर दिया था कि नालसार के 2026 के पूरे पासआउट बैच का वकालत के लिए एनरोलमेंट ही रोक दिया जाए।

इस तुगलकी फरमान के खिलाफ जब भारी विरोध हुआ, तो बीसीआई को बैकफुट पर आकर अपना फैसला वापस लेना पड़ा था। इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए साफ कर दिया कि जब तक कोई लॉ ग्रेजुएट विधिवत वकील के रूप में पंजीकृत नहीं हो जाता, तब तक बार काउंसिल ऑफ इंडिया या किसी राज्य बार काउंसिल के पास कानून के छात्रों पर कोई भी अनुशासनात्मक कार्रवाई (Disciplinary Action) करने का रत्ती भर भी विधिक अधिकार नहीं है। छात्रों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार केवल उनके संबंधित विश्वविद्यालय या संस्थान के पास होता है। शीर्ष अदालत की इस स्पष्ट व्यवस्था ने बीसीआई की सीमाएं तय कर दी थीं।

अब आगे क्या? दिल्ली हाईकोर्ट में कानूनी जंग और देश की विधिक व्यवस्था पर असर

सुप्रीम कोर्ट से दिल्ली हाईकोर्ट जाने की छूट मिलने के बाद अब याचिकाकर्ता वकीलों का समूह तुरंत दिल्ली हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल करने की तैयारी कर रहा है। वकीलों की मुख्य प्राथमिकता दिल्ली हाईकोर्ट से बीसीआई दफ्तर के 20-21 अगस्त के डिजिटल वीडियो रिकॉर्डर (DVR) और सीसीटीवी कैमरों की फुटेज को तुरंत सुरक्षित कराने का अंतरिम आदेश हासिल करना होगा। इसके साथ ही, स्थानीय पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए एक स्वतंत्र जांच दल (SIT) या सीबीआई से निष्पक्ष जांच कराने की मांग को हाईकोर्ट के समक्ष नए सिरे से पेश किया जाएगा।

यह पूरा विवाद भारतीय न्यायपालिका और विधिक पेशे के आंतरिक लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो रहा है। देश के लाखों वकीलों का प्रतिनिधित्व करने वाली सर्वोच्च संस्था के भीतर आंतरिक पारदर्शिता, नियमित लोकतांत्रिक चुनाव, सत्ता का केंद्रीकरण और युवा वकीलों के अधिकारों को लेकर जो सवाल उठे हैं, वे अब केवल बार रूम की चर्चा तक सीमित नहीं हैं। दिल्ली हाईकोर्ट में होने वाली आगामी सुनवाई और सुप्रीम कोर्ट में बीसीआई पुनर्गठन के लंबित मामले आने वाले दिनों में यह तय करेंगे कि देश की कानूनी व्यवस्था का यह सबसे बड़ा नियामक मंच किस दिशा में आगे बढ़ेगा।