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July 08 2026 12:34 am

वैश्विक मंच पर पाकिस्तान की खुली फजीहत: अमेरिकी सांसदों ने लादेन का नाम लेकर शहबाज शरीफ को दिखाया आईना

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अमेरिका और ईरान के बीच चरम पर पहुंचे रणनीतिक तनाव को शांत करने के लिए पाकिस्तान द्वारा की जा रही कूटनीतिक मध्यस्थता की कोशिशों को अमेरिकी राजनीतिक हलकों में तगड़ा झटका लगा है। अमेरिकी सीनेटरों ने वैश्विक मंच पर पाकिस्तान के पुराने रिकॉर्ड को खंगालते हुए उसकी विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। यह ताजा विवाद तब और गहरा गया जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता आयतुल मसूद अली खामेनेई के अंतिम संस्कार के दौरान दिया गया एक बयान अंतरराष्ट्रीय मीडिया में वायरल हो गया। इसके बाद अमेरिकी सीनेटर रिक स्कॉट ने बेहद आक्रामक लहजे में पूरी दुनिया को याद दिलाया कि पाकिस्तान की असलियत क्या है और वह किसी भी अंतरराष्ट्रीय शांति प्रक्रिया में मध्यस्थ बनने के काबिल क्यों नहीं है।

ओसामा बिन लादेन का साया और अमेरिकी सीनेटर रिक स्कॉट का सीधा हमला

अमेरिकी सीनेटर रिक स्कॉट ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल 'एक्स' पर पाकिस्तान की विदेश नीति और उसके इतिहास पर तीखा हमला बोला। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आगाह करते हुए लिखा कि वाशिंगटन को कभी भी यह नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तान वास्तव में किस तरह का देश है।

स्कॉट ने तंज कसते हुए कहा कि जिस देश की नाक के नीचे दुनिया का सबसे खूंखार आतंकवादी ओसामा बिन लादेन एक दशक तक सुरक्षित छिपा रहा, और जहां आज भी ईशनिंदा कानूनों का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए चुनिंदा तरीके से किया जाता है, वह देश किसी वैश्विक समझौते का हिस्सा कैसे हो सकता है। उन्होंने आगे कहा कि जिस देश के प्रधानमंत्री सरेआम एक ऐसे नेता की प्रशंसा कर रहे हों जो अमेरिका विरोधी नीतियों का केंद्र रहा है, उसे अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका सौंपना एक बड़ी भूल होगी।

शहबाज शरीफ का विवादित बयान जिसने वाशिंगटन को भड़काया

इस पूरे विवाद की जड़ में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का वह भाषण है, जिसमें उन्होंने दिवंगत ईरानी नेता अली खामेनेई को एक महान विद्वान और दूरदर्शी मार्गदर्शक करार दिया था। शहबाज शरीफ ने अंतरराष्ट्रीय मंच से कहा था कि खामेनेई ने अटूट साहस, बेजोड़ धैर्य और मजबूत दृढ़ संकल्प के साथ दशकों तक ईरान की सेवा की है, जिसे दुनिया भर के करोड़ों मुस्लिम हमेशा याद रखेंगे।

उन्होंने जोर देकर कहा था कि पाकिस्तान और ईरान ऐतिहासिक रूप से दो सगे भाइयों की तरह हैं जो हर अच्छे-बुरे वक्त में एक-दूसरे के कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहेंगे। इस बयान के सामने आते ही अमेरिकी मीडिया और थिंक-टैंक भड़क गए। अमेरिकी टीवी विश्लेषक मार्क लेविन ने भी सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया कि जो देश खुद ईरान के प्रति पूरी तरह झुका हुआ है, वह निष्पक्ष होकर शांति वार्ता को कैसे आगे बढ़ा सकता है।

इजरायल विरोधी रुख और पाकिस्तानी हवाई अड्डों पर ईरानी विमानों की मौजूदगी का दावा

यह पहला मौका नहीं है जब वाशिंगटन में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर इतनी गंभीर नाराजगी देखी गई हो। इससे पहले दिग्गज अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम भी मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान के नाम पर कड़ी चिंता जता चुके हैं। ग्राहम ने तर्क दिया था कि इजरायल के प्रति पाकिस्तान का रवैया शुरू से ही बेहद नकारात्मक और कट्टर रहा है, जिससे मध्य पूर्व शांति वार्ता में उसकी निष्पक्षता शून्य हो जाती है।

सीनेटर ग्राहम ने अपने दावों में एक बड़ा खुलासा करते हुए कहा था कि ईरानी सैन्य विमानों को पाकिस्तान के रणनीतिक हवाई अड्डों पर देखा गया है, जो दोनों देशों के बीच गहरे सैन्य गठजोड़ को दर्शाता है। उन्होंने पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के उस पुराने बयान को भी रेखांकित किया जिसमें आसिफ ने साफ कहा था कि पाकिस्तान कभी भी 'अब्राहम अकॉर्ड्स' (इजरायल के साथ शांति समझौता) का समर्थन नहीं करेगा क्योंकि उसे इजरायल की नीयत पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं है।

आतंकवाद को संरक्षण देने का आरोप और कूटनीतिक गलियारों में नई बहस

अपनी पिछली टिप्पणियों का हवाला देते हुए रिक स्कॉट ने केवल पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि कतर की भूमिका पर भी उंगली उठाई है। उन्होंने साफ कहा कि इन दोनों ही मुल्कों पर लंबे समय से प्रतिबंधित वैश्विक आतंकवादी संगठनों को सुरक्षित पनाहगाह और वित्तीय मदद मुहैया कराने के गंभीर आरोप लगते रहे हैं। अमेरिकी सीनेटरों के अनुसार, ये देश मध्य पूर्व में एक स्थायी और न्यायपूर्ण शांति स्थापित करने के बजाय परोक्ष रूप से ईरान के रणनीतिक हितों को मजबूत करने का काम कर रहे हैं।

हालांकि, इस्लामाबाद में मौजूद पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी सांसदों की इन बेहद सख्त और अपमानजनक टिप्पणियों पर अभी तक कोई भी आधिकारिक प्रतिक्रिया देने से परहेज किया है। लेकिन इस कड़े अमेरिकी रुख के बाद, वैश्विक कूटनीति के गलियारों में इस बात को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है कि क्या पाकिस्तान वाकई में भविष्य की किसी अंतरराष्ट्रीय शांति वार्ता का हिस्सा बनने की योग्यता रखता है या नहीं।