घर की इन 5 जगहों पर बैठकर कभी न खाएं खाना, वास्तु दोष से रूठ जाती हैं मां लक्ष्मी और छा जाती है कंगाली
सनातन संस्कृति और वैदिक परंपरा में अन्न को साक्षात 'परब्रह्म' और मां अन्नपूर्णा का स्वरूप माना गया है। शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि व्यक्ति जैसा अन्न ग्रहण करता है, वैसा ही उसका मन और विचार बनता है। लेकिन आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग भोजन के पारंपरिक और वास्तु सम्मत नियमों को भूलते जा रहे हैं। अक्सर लोग सुविधा के नाम पर घर के किसी भी कोने में बैठकर या टीवी-मोबाइल देखते हुए भोजन करने लगते हैं।
वास्तु शास्त्र और आयुर्वेद के अनुसार आप क्या खा रहे हैं, इसके साथ-साथ आप कहां बैठकर और किस अवस्था में खा रहे हैं, इसका सीधा असर आपके शरीर की ऊर्जा, मानसिक संतुलन और घर की सुख-समृद्धि पर पड़ता है। गलत जगह पर बैठकर किया गया भोजन शरीर को पोषण देने के बजाय बीमारियों, मानसिक तनाव और आर्थिक तंगी का कारण बन जाता है।
बिस्तर पर बैठकर भोजन करने से बढ़ता है राहु का प्रकोप और अनिद्रा
अधिकांश घरों में यह देखा जाता है कि लोग अपने बेडरूम में आराम से बिस्तर पर बैठकर ही खाना खा लेते हैं। वास्तु शास्त्र में इसे सबसे बड़ा दोष माना गया है। बिस्तर मूल रूप से विश्राम और निद्रा का स्थान है। जब आप बिस्तर पर बैठकर अन्न ग्रहण करते हैं, तो वहां की ऊर्जा दूषित हो जाती है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बिस्तर पर भोजन करने से कुंडली में राहु ग्रह का नकारात्मक प्रभाव तेजी से बढ़ता है। इसके कारण व्यक्ति को रात में बेचैनी, बुरे सपने और अनिद्रा (Insomnia) जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। वैज्ञानिक और चिकित्सीय दृष्टि से भी बिस्तर पर खाने से भोजन के बारीक कण गद्दों और चादरों में समा जाते हैं, जिससे सूक्ष्म बैक्टीरिया और फंगस पनपते हैं जो त्वचा और पेट से जुड़े रोगों को जन्म देते हैं। वास्तु के अनुसार यह आदत घर से बरकत छीन लेती है और परिवार पर कर्ज का बोझ बढ़ाती है।
मुख्य द्वार और दहलीज पर भोजन करने से रुकती है बरकत
घर की दहलीज (चौखट) और मुख्य द्वार को वास्तु में ऊर्जा का प्रवेश द्वार माना जाता है। यहीं से सकारात्मक शक्तियां, सकारात्मक प्राण वायु और मां लक्ष्मी का आगमन घर के भीतर होता है। शास्त्रों में मुख्य द्वार या दहलीज पर बैठकर भोजन करने को सख्त मना किया गया है।
दहलीज पर बैठकर खाना खाने से आने वाली सकारात्मक ऊर्जा बाधित होती है और घर में 'अलक्ष्मी' यानी दरिद्रता का वास होने लगता है। ऐसा करने से परिवार के सदस्यों की तरक्की में बार-बार रुकावटें आती हैं और बनता हुआ काम अंतिम समय पर बिगड़ जाता है। यह स्थान बाहर की धूल, नकारात्मक तरंगों और आने-जाने वाले लोगों की नजरों के सीधे संपर्क में रहता है, जिससे भोजन की पवित्रता नष्ट हो जाती है और व्यक्ति नजर दोष का शिकार हो सकता है।
शौचालय के समीप भोजन करना सेहत और भाग्य दोनों के लिए घातक
आधुनिक मकानों और फ्लैटों में जगह की कमी के कारण कई बार लोग बाथरूम या वॉशबेसिन के ठीक सामने बैठकर खाने की व्यवस्था कर लेते हैं। वास्तु शास्त्र के अनुसार शौचालय और स्नानघर घर में राहु और नकारात्मक ऊर्जा के मुख्य केंद्र होते हैं।
शौचालय के ठीक सामने या उसके आसपास बैठकर भोजन करने से भोजन उस दूषित ऊर्जा को सोख लेता है। ऐसा भोजन करने से पाचन तंत्र कमजोर होता है, जठराग्नि मंद पड़ जाती है और पेट संबंधी गंभीर बीमारियां जन्म लेती हैं। इसके अलावा इससे परिवार में अशांति, सदस्यों के बीच चिड़चिड़ापन और दवाइयों पर अनावश्यक धन खर्च होने लगता है। भोजन का स्थान हमेशा शौचालय के दरवाजे से पर्याप्त दूरी पर और स्वच्छ माहौल में होना चाहिए।
कम रोशनी या अंधेरे में भोजन करने से बढ़ता है तामसिक प्रभाव
वास्तु और आयुर्वेद दोनों का मानना है कि भोजन हमेशा पर्याप्त रोशनी और हवादार स्थान पर बैठकर ही करना चाहिए। जिस कमरे में मंद रोशनी या अंधेरा हो, वहां बैठकर खाना खाने से मन में तामसिक प्रवृत्तियां और नकारात्मक विचार बढ़ने लगते हैं।
अंधेरे में बैठकर खाने से हमारी पाचन अग्नि सही ढंग से सक्रिय नहीं हो पाती, जिससे खाया हुआ भोजन सही से पचता नहीं है। इसके अलावा कम रोशनी में भोजन करने से उसमें बाल, धूल या किसी हानिकारक कीट के गिरने का खतरा बना रहता है, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद नुकसानदेह है। पर्याप्त प्रकाश में भोजन करने से मन प्रसन्न रहता है और भोजन के प्रति एकाग्रता बनी रहती है, जिससे शरीर को उसका पूरा पोषण प्राप्त होता है।
टूटे-चटके बर्तनों और अशुद्ध वातावरण में अन्न का अपमान
अक्सर लोग थोड़े से टूटे या चटके हुए बर्तनों का उपयोग घर में करते रहते हैं। वास्तु शास्त्र में टूटे हुए बर्तनों में भोजन करना अत्यंत अशुभ माना गया है। टूटे बर्तन दरिद्रता और दुर्भाग्य को आमंत्रित करते हैं।
टूटे हुए क्रॉकरी या धातु के बर्तनों में भोजन करने से मां अन्नपूर्णा का अनादर होता है, जिससे घर की धन-धान्य की स्थिति धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है। इसी तरह गंदी मेज, बिखरे हुए सामान या अस्वच्छ फर्श पर बैठकर खाना खाने से घर में कलह का वातावरण बनता है। भोजन हमेशा साफ, धुले हुए और साबुत बर्तनों में ही परोसा जाना चाहिए ताकि भोजन की ऊर्जा सकारात्मक बनी रहे।
सीढ़ियों के नीचे भोजन करने से बचें
अनेक घरों में जगह बचाने के लिए सीढ़ियों के नीचे डाइनिंग टेबल लगा दी जाती है। वास्तु के अनुसार सीढ़ियों के नीचे का क्षेत्र गुरुत्वाकर्षण और भारी ऊर्जा का केंद्र होता है। इस स्थान पर बैठकर भोजन करने से व्यक्ति लगातार मानसिक तनाव और दबाव महसूस करता है। परिवार के मुखिया के लिए सीढ़ियों के नीचे भोजन करना उसके निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करता है और व्यापार में घाटा करा सकता है।
वास्तु शास्त्र के अनुसार भोजन करने का सही स्थान, दिशा और नियम
घर में सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखने के लिए भोजन करने के सही वास्तु नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है।
भोजन करने के लिए घर की पश्चिम या उत्तर-पूर्व दिशा सर्वोत्तम मानी जाती है। डाइनिंग रूम को इसी क्षेत्र में बनाना सबसे लाभकारी होता है।
भोजन करते समय आपका मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। पूर्व दिशा की ओर मुख करके खाने से आयु और स्वास्थ्य में वृद्धि होती है, जबकि उत्तर दिशा की ओर मुख करने से धन, ज्ञान और करियर में उन्नति मिलती है।
दक्षिण दिशा की ओर मुख करके भोजन करने से बचना चाहिए, क्योंकि यह दिशा पितरों और यम की मानी जाती है, जिससे पाचन कमजोर होता है।
जमीन पर साफ आसन बिछाकर पालथी मारकर (सुखासन में) बैठकर खाना खाना स्वास्थ्य और वास्तु दोनों के अनुसार सबसे उत्तम है।
भोजन की थाली को कभी भी सीधे जमीन पर न रखें, उसे हमेशा किसी छोटी चौकी, पाटे या मेज पर थोड़ा ऊपर उठाकर रखें।
भोजन शुरू करने से पहले अपने हाथ-पैर और मुंह को अच्छी तरह धो लें और पहली बाइट लेने से पूर्व मां अन्नपूर्णा और ईश्वर का आभार व्यक्त करें।
जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए केवल अच्छा कमाना ही काफी नहीं है, बल्कि उस कमाई से आने वाले अन्न का सही तरीके से सम्मान करना भी उतना ही जरूरी है। भोजन से जुड़े इन आसान वास्तु नियमों को अपनी दिनचर्या में शामिल करके आप न केवल अपने स्वास्थ्य को बेहतर बना सकते हैं, बल्कि अपने घर में सुख, शांति और समृद्धि का स्थायी वास भी सुनिश्चित कर सकते हैं।