Maharashtra civic polls : ठाकरे बंधुओं का ‘मराठी एजेंडा’ पड़ा फीका, मुंबई में रिकॉर्ड 80 गैर-मराठी पार्षद निर्वाचित
India News Live,Digital Desk : मुंबई महानगरपालिका चुनाव से पहले उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने मराठी मानुष, मराठी भाषा और मुंबई को महाराष्ट्र से अलग किए जाने के कथित खतरे को लेकर जोरदार माहौल बनाने की कोशिश की। चुनाव प्रचार में इस मुद्दे को केंद्र में रखा गया, लेकिन नतीजों ने बिल्कुल उलट तस्वीर पेश कर दी। 227 सदस्यों वाली मुंबई महानगरपालिका में इस बार रिकॉर्ड 80 गैर-मराठी भाषी पार्षद चुनकर आए हैं, जो अब तक के सभी चुनावों में सबसे ज्यादा हैं।
मराठी वोटों को साधने की कोशिश, लेकिन परिणाम रहा उलटा
चुनाव के दौरान मीरा-भायंदर में भाजपा नेता कृपाशंकर सिंह के एक बयान को आधार बनाकर ठाकरे बंधुओं ने भाजपा को घेरने की कोशिश की। यह प्रचार किया गया कि भाजपा गैर-मराठी व्यक्ति को मुंबई का मेयर बनाना चाहती है। इस मुद्दे को उछालकर मराठी भाषी मतदाताओं को अपने पक्ष में लामबंद करने की रणनीति अपनाई गई।
हालांकि, इस रणनीति का असर उलटा पड़ा। प्रतिध्रुवीकरण के चलते बड़ी संख्या में गैर-मराठी मतदाताओं ने अलग रुख अपनाया और नतीजतन 80 गैर-मराठी पार्षद चुनकर सदन तक पहुंच गए।
पहले से ज्यादा बढ़ी गैर-मराठी पार्षदों की संख्या
मुंबई महानगरपालिका चुनावों के इतिहास में यह संख्या सबसे अधिक है। वर्ष 2017 के चुनावों में 72 गैर-मराठी पार्षद चुने गए थे। इस बार उस आंकड़े को भी पीछे छोड़ दिया गया।
किस पार्टी से कितने गैर-मराठी पार्षद चुने गए
इस बार गैर-मराठी पार्षदों में सबसे ज्यादा संख्या भाजपा की रही। भाजपा के 38 गैर-मराठी पार्षद चुने गए हैं। कांग्रेस के कुल 24 पार्षदों में से 18 गैर-मराठी हैं। ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के सभी आठ और समाजवादी पार्टी के दोनों पार्षद भी गैर-मराठी हैं।
मराठी अस्मिता की राजनीति करने वाली उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) के 65 पार्षदों में से छह गैर-मराठी हैं, जबकि राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के छह में से एक पार्षद गैर-मराठी है। शिंदे गुट की शिवसेना के 29 पार्षदों में तीन गैर-मराठी शामिल हैं।
मुंबई के बदलते सामाजिक समीकरण का संकेत
बीएमसी के नए सदन में गैर-मराठी पार्षदों की संख्या कुल सदन के एक तिहाई से भी अधिक हो चुकी है। इसे मुंबई के बदलते सामाजिक और राजनीतिक समीकरण के तौर पर देखा जा रहा है।
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रेम शुक्ला का कहना है कि मुंबई स्वभाव से ही बहुभाषिक और कॉस्मोपॉलिटन शहर रहा है। यहां अलग-अलग भाषाओं, जातियों और समुदायों के लोगों को हमेशा प्रतिनिधित्व मिलता रहा है। उन्होंने कहा कि जिस शहर में फीरोजशाह मेहता जैसे महापौर रह चुके हों, जिनके पूर्वज ईरान से आकर बसे थे, वहां भाषावाद की राजनीति लंबे समय तक असर नहीं दिखा सकती।
ठाकरे बंधुओं के एजेंडे पर फडणवीस का सख्त जवाब
चुनाव से पहले उद्धव और राज ठाकरे बार-बार यह मुद्दा उठाते रहे कि मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की साजिश हो सकती है। इस पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस लगातार पलटवार करते रहे। उन्होंने साफ कहा था कि मुंबई को कोई भी महाराष्ट्र से अलग नहीं कर सकता।
भाजपा को मिली 89 सीटों में से 51 मराठी पार्षदों का चुना जाना भी इस दावे को मजबूत करता है कि मराठी मतदाताओं पर केवल शिवसेना (यूबीटी) या मनसे का ही अधिकार नहीं है।