मकान के नक्शे पर लखनऊ हाईकोर्ट का कड़ा प्रहार: फर्जी दस्तावेज और गलत जानकारी देने वालों की खैर नहीं; रद्द होगी अनुमति
India News Live,Digital Desk : उत्तर प्रदेश की राजधानी में अवैध निर्माण और फर्जी दस्तावेजों के सहारे शहर का नक्शा बिगाड़ने वालों के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी व्यक्ति ने तथ्यों को छिपाकर या गलत जानकारी देकर भवन का मानचित्र (Map) स्वीकृत कराया है, तो संबंधित विभाग को न केवल ऐसी स्वीकृति निरस्त करनी चाहिए, बल्कि दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी अनिवार्य है।
क्या है पूरा मामला?
न्यायमूर्ति सुभास विद्यार्थी की एकल पीठ ने प्रतापगढ़ की निवासी वंदना सिंह द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया।
धोखाधड़ी का आरोप: याचिका में आरोप लगाया गया था कि विपक्षी सबीरा खातून ने जमीन की वास्तविक सीमाओं को छिपाया और गलत विवरण प्रस्तुत कर भवन निर्माण की अनुमति हासिल की।
जांच की रिपोर्ट: मामले की पड़ताल में पाया गया कि स्वीकृत नक्शे में जिन रास्तों और मानकों का जिक्र किया गया था, वे धरातल पर मौजूद ही नहीं थे। कोर्ट ने इसे प्रथम दृष्टया धोखाधड़ी और जालसाजी का मामला माना है।
दोहरी कार्रवाई का रास्ता साफ
हाईकोर्ट ने इस मामले में कानूनी पेचीदगियों को स्पष्ट करते हुए दो महत्वपूर्ण धाराओं का जिक्र किया:
धारा 7-ए: धोखाधड़ी से प्राप्त अनुमति को रद्द करना।
धारा 10: अवैध निर्माण को हटाना या ढहाना।
अदालत ने साफ कहा कि ये दोनों धाराएं अलग-अलग स्थितियों के लिए हैं और इनके तहत समानांतर (Parallel) कार्रवाई की जा सकती है। विभाग यह तर्क देकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि 'ध्वस्तीकरण की कार्रवाई (धारा 10) चल रही है, इसलिए नक्शा निरस्त (धारा 7-ए) करने की जरूरत नहीं है।' कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि धोखाधड़ी से हासिल किसी भी अनुमति को कानून का संरक्षण नहीं मिल सकता।
टाइपिंग की गलती पर पेट्रोल पंप आवंटन रद्द करना गलत
इसी दौरान लखनऊ बेंच ने एक अन्य मामले में राहत भरा फैसला भी सुनाया। न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि मात्र एक टाइपिंग की छोटी सी गलती (जैसे सड़क के प्रकार में बदलाव) के आधार पर किसी का पेट्रोल पंप आवंटन रद्द करना विधि के विरुद्ध है।
हरदोई के राघवेंद्र अवस्थी मामले में कोर्ट ने भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें सड़क का प्रकार 'MDR' के बजाय 'ODR' टाइप होने के कारण अलॉटमेंट कैंसल किया गया था। कोर्ट ने इसे मानवीय त्रुटि मानते हुए याची को राहत दी है।