'जज के साथ अन्याय हो तो वह कहां जाएं?' 5 माह में 23 फांसी की सजा सुनाने वाले न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर का छलका दर्द
न्यायपालिका को लोकतंत्र में आम नागरिक के मौलिक अधिकारों और इंसाफ की अंतिम उम्मीद माना जाता है, लेकिन जब खुद न्याय की कुर्सी पर बैठा न्यायाधीश ही व्यवस्था और प्रशासनिक फैसलों के सामने असहाय महसूस करने लगे, तो यह पूरे सिस्टम पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में तैनात अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (ADJ) रवि कुमार दिवाकर—जिन्होंने महज पांच महीनों के भीतर 23 दोषियों को मौत की सजा (फांसी) सुनाकर देशभर के कानूनी हलकों में हलचल मचा दी थी—का दर्द एक बार फिर न्यायिक आदेश के पन्नों पर छलक पड़ा है। अदालत में विचाराधीन गंभीर मामलों और मर्डर केसों की पत्रावलियों को बिना स्पष्ट कारण बताए प्रशासनिक आदेश से वापस लिए जाने पर जज दिवाकर ने गहरा आक्रोश व्यक्त करते हुए तीखा सवाल दागा है कि 'यदि किसी जज के साथ ही अन्याय होने लगे, तो वह इंसाफ मांगने कहां जाए?'
फैसले में छलका दर्द: 97 हत्या और गंभीर मुकदमों की पत्रावलियां वापस लेने पर सवाल
नई मंडी थाना क्षेत्र के वर्ष 2015 से जुड़े एक एनडीपीएस (चरस बरामदगी) मामले में अभियुक्त को दोषमुक्त करते हुए न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने फैसले के दौरान प्रशासनिक कार्यप्रणाली और मुकदमों के अचानक ट्रांसफर पर गंभीर सवाल खड़े किए। दरअसल, 18 अगस्त 2026 के एक प्रशासनिक आदेश के जरिए उनकी अदालत से हत्या और अन्य जघन्य अपराधों से जुड़े 97 मुकदमों की पत्रावलियों (पार्ट-हर्ड मामलों) को वापस (रिकॉल) लेकर दूसरे न्यायालयों में स्थानांतरित कर दिया गया था।
न्यायाधीश ने फैसले में दर्ज किया कि यदि कोई गंभीर प्रकृति का मुकदमा किसी अदालत में अंतिम सुनवाई के करीब है, तो उसे प्रशासनिक स्तर पर वापस लिए जाने के पीछे का ठोस कारण रिकॉर्ड पर दर्ज होना अनिवार्य है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए लिखा कि बिना कारण बताए पत्रावलियां वापस लेना 'न्याय से इनकार' के समान हो सकता है।
'सिर्फ प्रशासनिक शक्ति होना पर्याप्त नहीं, जवाबदेही भी जरूरी'
न्यायाधीश दिवाकर ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि किसी पद पर शक्ति का होना ही उसके मनमाने इस्तेमाल को सही नहीं ठहराता। शक्ति के साथ जिम्मेदारी, पारदर्शिता, विवेक और जवाबदेही जुड़ी होनी चाहिए।
उन्होंने लिखा:
"एक लोक सेवक में सही को सही और गलत को गलत कहने की क्षमता होनी चाहिए। लोक सेवक जिस संस्था का प्रतिनिधित्व करता है, यदि उसमें सही और गलत में भेद करने का साहस खत्म हो जाए, तो जनता का उस पवित्र संस्था से विश्वास उठने लगता है। न्यायिक प्रशासन में पारदर्शिता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।"
'मरना पसंद करूंगा, डरपोक जज कहलाना नहीं' - पहले भी बयां की थी पीड़ा
यह पहला मौका नहीं है जब जज रवि कुमार दिवाकर ने माफिया, दबाव और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर बेबाक टिप्पणी की हो। इससे पहले 7 सितंबर को पत्नी को जिंदा जलाने वाले आरोपी नदीम को 23वीं फांसी की सजा सुनाते हुए भी उन्होंने 38 पन्नों के ऐतिहासिक फैसले में माफिया तंत्र के प्रभाव पर गहरी चिंता जताई थी।
उस फैसले में जज दिवाकर ने लिखा था कि मुकदमों की फाइलें वापस लिए जाने के बाद उन्हें एक गैंगस्टर का संदेश मिला था कि अगर उन्होंने इस पर टिप्पणी की तो उन्हें जिले से बाहर ट्रांसफर करा दिया जाएगा। इस पर उन्होंने बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए लिखा था: "मुझे माता-पिता ने सिर्फ भगवान से डरना सिखाया है। अगर मैं माफिया से डरने लगूंगा तो जनता का भरोसा उठ जाएगा। मैं मरना पसंद करूंगा, लेकिन डरपोक जज कहलाना कतई स्वीकार नहीं। जब तक सिद्धांतों पर चल सकूंगा सर्विस करूंगा, वरना इस्तीफा दे दूंगा।"
ज्ञानवापी सर्वे आदेश से लेकर ताबड़तोड़ फांसी की सजा तक का सफर
न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर देश के सबसे चर्चित न्यायिक अधिकारियों में से एक रहे हैं। वाराणसी में सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के पद पर रहते हुए उन्होंने ही बहुचर्चित ज्ञानवापी परिसर के वीडियोग्राफी सर्वे का ऐतिहासिक आदेश दिया था, जिसके बाद उन्हें और उनके परिवार को जान से मारने की धमकियां तक मिली थीं। इसके बाद चित्रकूट में अब्बास अंसारी और बरेली में मौलाना तौकीर रजा से जुड़े मामलों में भी उन्होंने कड़े फैसले दिए। मुजफ्फरनगर में अपनी तैनाती के दौरान उन्होंने फास्ट ट्रैक मोड में सुनवाई करते हुए महज पांच महीनों के भीतर 11 मामलों में 23 दोषियों को मौत की सजा सुनाकर एक दुर्लभ रिकॉर्ड बनाया। अब 97 मुकदमों के अचानक ट्रांसफर और जज के ताजा आदेश ने उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक व न्यायिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।