क्या पाकिस्तान सिर्फ चेहरा और असली खिलाड़ी चीन है? ट्रंप के एक इशारे से मची खलबली
India News Live,Digital Desk : ईरान और अमेरिका के बीच 40 दिनों से जारी भीषण संघर्ष पर लगे 'ब्रेक' ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। हालांकि, इस युद्धविराम (Ceasefire) का श्रेय आधिकारिक तौर पर पाकिस्तान को दिया जा रहा है, लेकिन अब इस कूटनीतिक बिसात के पीछे चीन का हाथ होने के संकेत मिल रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक हालिया बयान ने उन चर्चाओं को हवा दे दी है कि तेहरान को बातचीत की मेज पर लाने वाला असली 'गेम चेंजर' बीजिंग है।
ट्रंप का वो एक जवाब, जिसने बीजिंग की भूमिका पर मुहर लगा दी
युद्धविराम की घोषणा के बाद जब राष्ट्रपति ट्रंप से पूछा गया कि क्या इस समझौते में चीन ने कोई गुप्त भूमिका निभाई है, तो उन्होंने बेहद सधे हुए अंदाज में फोन पर जवाब दिया, "मैंने ऐसा सुना है।" ट्रंप का यह छोटा सा इशारा काफी है यह समझने के लिए कि पर्दे के पीछे बीजिंग ने अपने पुराने सहयोगी ईरान पर लचीलापन दिखाने के लिए भारी दबाव बनाया था। व्हाइट हाउस के सूत्रों के अनुसार, ट्रंप अब 14-15 मई को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिलने बीजिंग भी जा रहे हैं, जो इस कूटनीतिक तालमेल की पुष्टि करता है।
पाकिस्तान और चीन की 'साझा रणनीति' का असर
रिपोर्ट्स के अनुसार, 31 मार्च को इस्लामाबाद में सऊदी अरब, तुर्की, मिस्र और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों की बैठक के तुरंत बाद चीन ने भी अपनी सक्रियता बढ़ा दी थी। पाकिस्तान और चीन ने संयुक्त रूप से एक पांच-सूत्रीय पहल पेश की थी, जिसमें तत्काल युद्धविराम और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को खोलने की बात कही गई थी। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' ने ईरानी अधिकारियों के हवाले से दावा किया है कि जब पाकिस्तान बातचीत का दबाव बना रहा था, तब चीन ने अंतिम समय में हस्तक्षेप कर तेहरान को युद्ध टालने के लिए राजी किया।
पर्दे के पीछे की कूटनीति: शांति का दिखावा या रणनीतिक चाल?
चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने युद्धविराम का स्वागत करते हुए कहा कि सभी पक्षों को ईमानदारी दिखानी चाहिए। हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि युद्धविराम से ठीक एक दिन पहले चीन और रूस ने संयुक्त राष्ट्र के उस प्रस्ताव को वीटो (Veto) कर दिया था, जिसमें होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षा के लिए समन्वित प्रयास की बात कही गई थी। जानकारों का मानना है कि चीन इस क्षेत्र में अमेरिका के सीधे हस्तक्षेप को कम कर अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है, इसलिए उसने पाकिस्तान को 'चेहरे' के तौर पर इस्तेमाल किया।
ट्रंप की बीजिंग यात्रा और भविष्य की रणनीति
डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की है कि वे अब ईरान में वह 'विनाशकारी बल' नहीं भेजेंगे जिसकी तैयारी हो चुकी थी। उन्होंने ईरान के 10-सूत्रीय शांति प्रस्ताव को व्यवहार्य (Practical) बताया है। 10 अप्रैल को इस्लामाबाद में होने वाली बैठक में इस पर विस्तार से चर्चा होगी। वहीं, मई में होने वाली ट्रंप-शी जिनपिंग की मुलाकात को 'ऐतिहासिक अवसर' माना जा रहा है। ट्रंप ने यह भी संकेत दिया है कि वे इस साल के अंत में शी जिनपिंग की मेजबानी वाशिंगटन डीसी में करेंगे, जो संकेत है कि मध्य पूर्व के बहाने दोनों महाशक्तियों के बीच रिश्तों की नई इबारत लिखी जा रही है।
ईरान का दावा: 'यह हमारी जीत है'
एक तरफ जहां कूटनीतिक श्रेय की होड़ मची है, वहीं तेहरान ने अपनी जनता के बीच इसे 'महान विजय' के रूप में पेश किया है। ईरान ने साफ कहा है कि उसने यह युद्ध जीत लिया है क्योंकि दुश्मन को पीछे हटना पड़ा। हालांकि, हकीकत यह है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव और होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने की मजबूरी ने ही इस युद्धविराम की राह प्रशस्त की है।