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September 09 2026 05:37 pm

Hartalika Teej 2026: 13 या 14 सितंबर कब है हरतालिका तीज? ज्योतिषियों ने दूर किया तिथि का कंफ्यूजन

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सनातन धर्म में सुहागिन महिलाओं और कुंवारी कन्याओं के लिए हरतालिका तीज का व्रत सबसे कठिन, फलदायी और अखंड सौभाग्य प्रदान करने वाला महापर्व माना गया है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखे जाने वाले इस व्रत में महिलाएं 24 घंटे का निर्जला और निराहार उपवास रखकर देवाधिदेव महादेव और माता पार्वती की रेत या मिट्टी से बनी पार्थिव प्रतिमा की आराधना करती हैं। मान्यता है कि इसी दिन कठोर तपस्या के बाद माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था। वर्ष 2026 में भाद्रपद शुक्ल तृतीया तिथि के समय विस्तार को लेकर श्रद्धालुओं के बीच भारी भ्रम की स्थिति बन गई है कि व्रत 13 सितंबर को रखा जाए या 14 सितंबर को। इस असमंजस को दूर करते हुए प्रख्यात ज्योतिषियों और पंचांगकारों ने धर्मसिंधु व निर्णयसिंधु के आधार पर हरतालिका तीज व्रत की सबसे उत्तम और शास्त्रसम्मत तिथि स्पष्ट कर दी है।

क्यों बना हुआ है हरतालिका तीज की तिथि को लेकर असमंजस?

वैदिक पंचांग की गणना के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का आरंभ रविवार, 13 सितंबर 2026 को सुबह 07 बजकर 08 मिनट पर हो रहा है। यह तृतीया तिथि अगले दिन यानी सोमवार, 14 सितंबर 2026 की सुबह 07 बजकर 06 मिनट तक ही प्रभावी रहेगी। 14 सितंबर को सुबह 07 बजकर 06 मिनट के बाद चतुर्थी तिथि लग जाएगी, जिस दिन गणेश चतुर्थी का महापर्व भी मनाया जाएगा। 13 सितंबर को सूर्योदय के समय द्वितीया तिथि होने के कारण तृतीया दोपहर और रातभर व्याप्त रहेगी। वहीं 14 सितंबर को सूर्योदय के समय तृतीया तिथि मौजूद रहेगी, लेकिन सूर्योदय के मात्र एक घंटे बाद समाप्त हो जाएगी। इसी गणना के चलते कुछ लोग 13 सितंबर तो कुछ 14 सितंबर को लेकर संशय में पड़ गए हैं।

ज्योतिष शास्त्र का फैसला: किस दिन व्रत रखना है सबसे उत्तम?

ज्योतिष विदों और पंचांग के प्रकांड विद्वानों के अनुसार हरतालिका तीज का व्रत प्रदोष व्यापिनी तृतीया में करना ही धर्मशास्त्रों के अनुसार सबसे अधिक फलदायी माना गया है। हरतालिका तीज की मुख्य पूजा शाम के समय यानी प्रदोष काल में और रात्रि के चारों प्रहरों में की जाती है। 13 सितंबर को पूरे दिन, प्रदोष काल और पूरी रात्रि तृतीया तिथि विद्यमान रहेगी। वहीं जो परंपराएं केवल सूर्योदय कालीन उदयातिथि को प्रधान मानती हैं, उनके अनुसार 14 सितंबर को सुबह तृतीया तिथि स्पर्श कर रही है, इसलिए कई पंचांगों में 14 सितंबर की तारीख भी दर्ज है। हालांकि विद्वानों का स्पष्ट मत है कि यदि आप प्रदोष काल की संपूर्ण पूजा, फुलेरा दर्शन और रात्रि जागरण का पूर्ण फल पाना चाहते हैं, तो 13 सितंबर का दिन शास्त्रों के अनुसार सबसे सटीक और अनुकूल बैठता है, जबकि उदयातिथि का पालन करने वाले परिवार 14 सितंबर को प्रातः काल संक्षेप में पूजन संपन्न कर सकते हैं।

हरतालिका तीज पूजा का शुभ मुहूर्त और चौघड़िया

हरतालिका तीज के दिन पूजन के लिए प्रातः काल और सायंकाल दोनों ही समय विशेष मुहूर्त प्राप्त हो रहे हैं। यदि आप 14 सितंबर को उदयातिथि मानकर पूजन कर रहे हैं, तो सुबह 06 बजकर 05 मिनट से 07 बजकर 06 मिनट के बीच का समय सबसे श्रेष्ठ रहेगा, क्योंकि इसके बाद चतुर्थी तिथि प्रारंभ हो जाएगी। वहीं 13 सितंबर को शाम के समय प्रदोष काल में सूर्यास्त के बाद से लेकर रात 08 बजकर 35 मिनट तक का समय पार्थिव शिवलिंग निर्माण, फुलेरा बांधने और शिव-पार्वती पूजन के लिए अत्यंत कल्याणकारी रहेगा। रात्रि के चारों प्रहर की पूजा करने वाली महिलाओं के लिए 13 सितंबर की पूरी रात तृतीया का महासंयोग साधना के लिए सर्वोत्तम वातावरण तैयार करेगा।

हरतालिका तीज पर फुलेरा दर्शन और पूजन का विशेष महत्व

हरतालिका तीज की पूजा में फुलेरा का दर्शन और स्पर्श करना अनिवार्य विधान माना जाता है। फुलेरा ताजे फूलों, लताओं और पत्तियों से तैयार किया जाने वाला एक सुंदर पुष्प मंडप या छत्र होता है, जिसे बालू या मिट्टी से बनाए गए पार्थिव शिव-पार्वती के ऊपर बांधा जाता है। शास्त्रों में मान्यता है कि हरतालिका तीज पर फुलेरा का दर्शन करने मात्र से व्यक्ति को हजारों अश्वमेघ यज्ञ और तीर्थ स्नान के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। यह छत्र प्रकृति और महादेव के साक्षात मिलन का प्रतीक है, जिसके नीचे बैठकर पूजा करने से वैवाहिक जीवन के सभी कष्ट मिटते हैं और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

सुहागिनें और कुंवारी कन्याएं जरूर रखें इन नियमों का ध्यान

हरतालिका तीज का व्रत अत्यंत निष्ठा और संयम की मांग करता है। यह व्रत पूर्णतः निर्जला रखा जाता है, इसलिए व्रती महिलाओं को अन्न और जल का त्याग करना होता है। हालांकि गर्भवती, अस्वस्थ या वृद्ध महिलाओं को फलाहार के साथ व्रत करने की शास्त्रसम्मत छूट दी गई है। इस दिन व्रती महिलाओं को दिन में सोने से बचना चाहिए और रात्रि में भगवान शिव के भजन, कीर्तन व हरतालिका तीज की पावन व्रत कथा का श्रवण करना चाहिए। माता पार्वती को 16 शृंगार की वस्तुएं, सुहाग पिटारी, चुनरी और मौसमी फल अर्पित करने चाहिए। अगले दिन सुबह विधिवत पूजा और आरती के उपरांत ब्राह्मण या जरूरतमंद को सुहाग सामग्री व दान-दक्षिणा देकर ही व्रत का पारण करना चाहिए।