Neem Karoli Baba: नीम करौली बाबा को क्यों माना जाता है हनुमान जी का साक्षात अवतार
उत्तराखंड के नैनीताल स्थित पावन कैंची धाम के संस्थापक और बीसवीं सदी के महानतम संतों में शुमार परम पूज्य नीम करौली बाबा (महाराज जी) का नाम संपूर्ण विश्व में आध्यात्मिक ऊर्जा, असीम करुणा और अलौकिक चमत्कारों के लिए विख्यात है। भारत के साधारण भक्तों से लेकर अमेरिका की सिलिकॉन वैली के शीर्ष दिग्गजों जैसे एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स, मेटा के प्रमुख मार्क जुकरबर्ग और हॉलीवुड अभिनेत्री जूलिया रॉबर्ट्स तक, जिसने भी बाबा की चौखट पर माथा टेका, उसका जीवन पूरी तरह परिवर्तित हो गया। नीम करौली बाबा के करोड़ों श्रद्धालु उन्हें केवल एक सिद्ध संत या योगी नहीं, बल्कि कलयुग में भगवान श्री हनुमान जी का साक्षात अवतार और उनका प्रत्यक्ष अंश मानते हैं। बाबा का सादा जीवन, बिना किसी आडंबर के भक्तों पर कृपा बरसाना, सदैव तन पर एक कंबल लपेटे रहना और निरंतर 'राम' नाम की गूंज में लीन रहना उनके भीतर हनुमान जी के साक्षात गुणों का प्रमाण देता है। यदि आप भी जानना चाहते हैं कि महाराज जी को संकटमोचन हनुमान जी का स्वरूप क्यों माना गया और इससे जुड़ी ऐतिहासिक व आध्यात्मिक घटनाएं क्या हैं, तो यह विस्तृत आलेख आपके सभी संशयों का निवारण करेगा।
नीम करौली बाबा का बाल्यकाल और तपस्या का आरंभ
नीम करौली बाबा का मूल नाम लक्ष्मीनारायण शर्मा था। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर गांव में एक संपन्न और धर्मनिष्ठ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बाल्यावस्था से ही उनका मन सांसारिक सुख-सुविधाओं और गृहस्थ जीवन में नहीं लगता था। बहुत छोटी आयु में ही उन्होंने आध्यात्मिक साधना और ईश्वर साक्षात्कार के लिए गृह त्याग कर दिया। उन्होंने देश के विभिन्न तीर्थों, जंगलों और कंदराओं में वर्षों तक कठोर तपस्या की। इसी कठोर साधना के दौरान उन्होंने हनुमान जी की अनन्य उपासना की और उन्हें सिद्ध किया। बाद में ग्रामीणों और भक्तों के आग्रह पर वे 'नीम करौली' गांव में एक गुफा में रहे, जहां से उनका नाम 'नीम करौली बाबा' पड़ा। उन्होंने अपने जीवनकाल में देश के विभिन्न हिस्सों में 100 से अधिक भव्य हनुमान मंदिरों का निर्माण करवाया, जिनमें कैंची धाम का मंदिर आज विश्व पटल पर आध्यात्मिक चेतना का महाकेंद्र बन चुका है।
क्यों माना जाता है महाराज जी को हनुमान जी का साक्षात अंश?
नीम करौली बाबा को हनुमान जी का अंश मानने के पीछे कई गहरे आध्यात्मिक और प्रत्यक्ष कारण हैं, जिन्हें उनके समकालीन भक्तों और संतों ने अपनी आंखों से महसूस किया था। हिंदू धर्मग्रंथों में भगवान हनुमान जी को अष्ट सिद्धि और नौ निधि के दाता के रूप में वर्णित किया गया है। बाबा के जीवन में इन सभी सिद्धियों का प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होता था।
निरंतर राम नाम और निस्वार्थ सेवा भाव: जिस प्रकार हनुमान जी का पूरा अस्तित्व प्रभु श्रीराम के नाम और उनकी सेवा के लिए समर्पित था, ठीक उसी तरह बाबा नीम करौली के होठों पर हर क्षण 'राम' नाम का ही सुमिरन चलता रहता था। वे अपने पास आने वाले हर व्यक्ति को केवल 'सब एक हैं' और 'राम नाम जपो, भूखे को भोजन कराओ' का संदेश देते थे।
अलौकिक सिद्धियों का गुप्त प्रदर्शन: बाबा के पास अणिमा, लघिमा और महिमा जैसी सिद्धियां थीं। कई बार जब तेज धूप होती थी या कोई भक्त संकट में होता था, तो बाबा के शरीर का आकार और भार परिस्थितियों के अनुसार बदल जाता था। हालांकि वे कभी भी चमत्कार को अपनी पहचान नहीं बनने देते थे और हर चमत्कार का श्रेय तुरंत पवनपुत्र हनुमान जी को दे देते थे।
कंबल का रहस्य और हनुमान जी की ढाल: बाबा हमेशा एक साधारण ऊनी कंबल ओढ़े रहते थे। भक्तों के संस्मरणों के अनुसार, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब एक भारतीय सैनिक के माता-पिता बाबा के पास रोते हुए पहुंचे, तो बाबा ने अपने कंबल को ओढ़कर ध्यान लगाया। बाद में उस सैनिक ने घर लौटकर बताया कि युद्ध के मैदान में गोलियों की बौछार के बीच एक अदृश्य कंबल ने उसकी जान बचाई थी। बाबा के कंबल से गोलियां जमीन पर गिरती देखी गई थीं। भक्तों का मानना था कि वह कंबल साक्षात हनुमान जी की गदा और रक्षा कवच का काम करता था।
भक्तों को संकट से उबारने की शक्ति: संकटमोचन की तरह ही बाबा अपने भक्तों के आने से पहले ही उनके मन की बात, उनके बीते हुए कल और भविष्य के संकटों को जान लेते थे और बिना कुछ कहे ही संकट का निवारण कर देते थे।
कैंची धाम का घी वाला चमत्कारी प्रसंग
नीम करौली बाबा के जीवन से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध और प्रामाणिक कथा कैंची धाम के भंडारे से संबंधित है, जिसने पूरे क्षेत्र में यह विश्वास दृढ़ कर दिया कि महाराज जी साक्षात हनुमान हैं। एक बार कैंची धाम आश्रम में विशाल भंडारे का आयोजन हो रहा था। अचानक भंडारे के बीच में ही देसी घी समाप्त हो गया। उस समय आसपास कोई बाजार या दुकान नहीं थी और हजारों श्रद्धालु भोजन के इंतजार में बैठे थे। आश्रम के सेवक घबराकर बाबा के पास पहुंचे।
बाबा ने मुस्कुराते हुए डांटते हुए कहा, 'इतनी चिंता क्यों करते हो? जाओ और नीचे बहने वाली शिप्रा नदी से दो कनस्तर पानी भरकर ले आओ और उसे कड़ाही में उड़ेल दो, सब ठीक हो जाएगा।' सेवकों ने बाबा की आज्ञा मानकर बहती नदी से पानी के कनस्तर भरे और जैसे ही उसे गरम कड़ाही में डाला, वह पानी शुद्ध देसी घी में बदल गया। उस घी से पूड़ियां और प्रसाद तैयार हुआ और सभी भक्तों ने छककर भोजन किया। अगले दिन सुबह बाबा के निर्देश पर आश्रम के सेवकों ने बाजार से दो कनस्तर शुद्ध घी खरीदकर शिप्रा नदी में आदरपूर्वक प्रवाहित कर नदी का कर्ज चुकाया। यह घटना दर्शाती है कि प्रकृति के पंचतत्वों पर उनका वैसा ही अधिकार था, जैसा पवनपुत्र हनुमान जी का था।
ट्रेन की ऐतिहासिक घटना और बाबा का प्रभाव
बाबा के चमत्कारों में सबसे प्रारंभिक और विख्यात घटना रेलवे से जुड़ी हुई है। एक बार बाबा प्रथम श्रेणी के डिब्बे में बिना टिकट यात्रा कर रहे थे। एक सख्त टिकट चेकर (टीटीई) ने उन्हें 'नीम करौली' नामक एक छोटे से वीरान स्टेशन पर जबरन ट्रेन से नीचे उतार दिया। बाबा शांति से मुस्कुराते हुए स्टेशन के पास अपनी चिमटा गाड़कर बैठ गए। इसके बाद जब ट्रेन चालक ने ट्रेन को आगे बढ़ाने के लिए इंजन स्टार्ट किया, तो ट्रेन टस से मस नहीं हुई। कई इंजनों को जोड़कर देखा गया, तकनीकी इंजीनियरों ने पूरी जांच की, लेकिन ट्रेन एक इंच भी आगे नहीं बढ़ सकी।
वहां मौजूद एक स्थानीय मजिस्ट्रेट ने अधिकारियों को बताया कि आपने एक पहुंचे हुए सिद्ध पुरुष का अपमान किया है, जब तक वे नहीं चढ़ेंगे, ट्रेन नहीं चलेगी। इसके बाद रेलवे अधिकारियों ने बाबा से हाथ जोड़कर क्षमा याचना की और उनसे ट्रेन में बैठने का विनम्र आग्रह किया। बाबा ने दो शर्तों पर ट्रेन में बैठना स्वीकार किया: पहली शर्त कि रेलवे इस छोटे से गांव में एक पक्का स्टेशन बनाएगा और दूसरी शर्त कि रेलवे साधु-संतों के साथ कभी दुर्व्यवहार नहीं करेगा। जैसे ही बाबा ट्रेन के डिब्बे में बैठे, बंद पड़ा इंजन अपने आप चालू हो गया और ट्रेन चल पड़ी। आज भी वह स्टेशन 'नीब करोरी' के नाम से जाना जाता है।
विश्व विख्यात हस्तियों की आस्था का केंद्र बना कैंची धाम
बाबा नीम करौली का प्रभाव केवल भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा। 1970 के दशक में अमेरिका के मशहूर प्रोफेसर रिचर्ड अल्बर्ट बाबा के संपर्क में आए और उन्होंने अपना जीवन बाबा को समर्पित कर 'रामदास' नाम धारण किया। उनकी पुस्तक 'बी हेयर नाउ' ने पूरी पश्चिमी दुनिया को बाबा के प्रति आकर्षित किया। इसके बाद 1974 में एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स अपने जीवन की सबसे बड़ी निराशा के दौर में शांति की तलाश में कैंची धाम पहुंचे थे। वहां बिताए समय ने उन्हें आंतरिक प्रेरणा दी, जिसके बल पर उन्होंने एप्पल जैसी क्रांतिकारी कंपनी की नींव रखी।
वर्षों बाद जब फेसबुक (मेटा) के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग अपने करियर के सबसे कठिन दौर से गुजर रहे थे, तो स्टीव जॉब्स ने ही उन्हें भारत जाकर कैंची धाम में समय बिताने की व्यक्तिगत सलाह दी थी। जुकरबर्ग ने स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक संवाद में सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि कैंची धाम में मिले आध्यात्मिक अनुभव ने उन्हें अपनी कंपनी को दोबारा खड़ा करने और दुनिया को जोड़ने का विजन दिया था। विश्व स्तर पर इतने प्रभावशाली लोगों का नतमस्तक होना यह सिद्ध करता है कि बाबा की चेतना साक्षात दैवीय और सर्वव्यापी थी।
बाबा की सादगी: कभी नहीं छूने दिए अपने चरण
आमतौर पर सिद्ध संतों के आश्रमों में उनके चरण स्पर्श करने की होड़ मची रहती है, लेकिन बाबा नीम करौली का व्यवहार इसके बिल्कुल विपरीत था। वे किसी भी भक्त को अपने चरण स्पर्श नहीं करने देते थे। यदि कोई भक्त उनके चरणों में झुकने का प्रयास करता, तो वे तुरंत उसे पीछे हटा देते और कहते, 'मेरे पैर क्यों छूते हो? हनुमान जी के पैर छुओ, प्रभु श्रीराम के पैर छुओ, वे ही सब कुछ करने वाले हैं।'
वे हमेशा अपने आप को एक सामान्य मनुष्य बताते थे और सारी महिमा अपने इष्टदेव संकटमोचन हनुमान जी के चरणों में समर्पित कर देते थे। उनका यह परम निरहंकार, असीम त्याग और भक्तों के प्रति निस्वार्थ वात्सल्य भाव ही संतों और विद्वानों को यह मानने पर विवश करता है कि वे साक्षात भगवान हनुमान जी के ही अवतार थे, जो कलियुग के जीवों को भक्ति, सेवा और कल्याण का मार्ग दिखाने के लिए धरा पर पधारे थे। 11 सितंबर 1973 को वृंदावन की पावन भूमि पर महासमाधि लेने के बाद भी आज बाबा की सूक्ष्म उपस्थिति कैंची धाम और दुनिया भर में फैले उनके लाखों श्रद्धालुओं के दिलों में निरंतर महसूस की जाती है।