LAC पर भारत की कूटनीतिक और सैन्य जीत: चीन को पीछे हटाने पड़े सैनिक; रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा
पूर्वी लद्दाख में 2020 के सैन्य गतिरोध और गलवान घाटी की हिंसक झड़प के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर जारी तनातनी के बीच भारत के लिए एक बड़ी रणनीतिक और सैन्य राहत भरी खबर सामने आई है। रक्षा मंत्रालय की ताजा वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, उत्तरी सीमाओं पर भारतीय सेना की आक्रामक चौकसी और निरंतर कूटनीतिक वार्ता के दबाव के चलते चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) को अपने सैनिकों की भारी तैनाती में बड़ी कटौती करनी पड़ी है। मंत्रालय ने पुष्टि की है कि चीन ने एलएसी के अग्रिम क्षेत्रों और अपने पारंपरिक प्रशिक्षण इलाकों से लगभग 10 कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड (Combined Arms Brigades) के आकार के बराबर सैन्य बलों को पीछे हटा लिया है।
रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में क्या है बड़ा खुलासा?
रक्षा मंत्रालय की आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों से एलएसी के दूसरी तरफ पारंपरिक ट्रेनिंग क्षेत्रों और अग्रिम मोर्चों पर भारी संख्या में जमे चीनी सैनिकों की मौजूदगी में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है:
10 कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड पीछे हटीं: एक कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड में इन्फैंट्री (पैदल सैनिक), टैंक, तोपखाना (आर्टिलरी) और एयर डिफेंस यूनिट्स एक साथ काम करती हैं। इतने बड़े सैन्य बल का पीछे हटना सीमा पर तनाव घटने का साफ संकेत है।
दबाव में आया ड्रैगन: डेपसांग और डेमचोक जैसे फ्रिक्शन पॉइंट्स पर डिसएंगेजमेंट (सैनिकों की वापसी) और गश्त व्यवस्था बहाल होने के बाद भारतीय सेना ने अपनी अग्रिम चौकियों पर बेहद मुस्तैद पकड़ बनाई रखी, जिससे चीन के लिए अग्रिम मोर्चों पर हजारों सैनिकों को रसद पहुंचाना और टिकाए रखना मुश्किल हो रहा था।
बातचीत और कूटनीति से सीमा पर बढ़ी स्थिरता
मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि चीनी सैनिकों की संख्या में यह कमी केवल सैन्य दबाव से नहीं, बल्कि राजनीतिक, कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर हुए सघन संवाद का नतीजा है:
वर्किंग मैकेनिज्म (WMCC) की बैठकें: दोनों देशों के बीच परामर्श और समन्वय तंत्र (WMCC) की 33वीं और 34वीं बैठकों ने सीमा पर भरोसा कायम करने में बड़ी भूमिका निभाई।
कोर कमांडर स्तर की वार्ता: पूर्वी लद्दाख में सैन्य कमांडरों की 23वीं कोर कमांडर स्तर की बैठक और लोकल बॉर्डर पर्सनल मीटिंग्स (BPM) के जरिए दोनों पक्षों ने अचानक टकराव की स्थिति को रोकने पर सहमति बनाई।
उच्चस्तरीय राजनीतिक संवाद: रूस के कजान में हुए ब्रिक्स सम्मेलन और उसके बाद एससीओ (SCO) व नई दिल्ली शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई मुलाकातों ने सीमा पर शांति बहाली के रास्ते खोले।
चीन ने तैनाती घटाई, लेकिन भारत ने नहीं कम की अपनी चौकसी
रक्षा मंत्रालय ने साफ चेतावनी भी दी है कि चीन के सैनिक पीछे हटने का यह मतलब कतई नहीं है कि भारत सीमा पर अपनी तैयारियों में कोई ढील देगा:
"भारतीय सेना की सभी एलएसी सेक्टरों (लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक) में तैनाती पूरी तरह मजबूत, संतुलित और किसी भी उभरती चुनौती या आपात स्थिति से निपटने के लिए सुसज्जित है।"
सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि चीन ने भले ही अग्रिम मोर्चों से सैनिकों की संख्या घटाई हो, लेकिन एलएसी के पीछे तिब्बत और शिनजियांग क्षेत्र में उसने मिसाइल, तोपखाने, एयरबेस और स्थायी लॉजिस्टिक इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रखा है।
भारत का इंफ्रास्ट्रक्चर बना ढाल: न्योमा एयरफील्ड और बॉर्डर रोड्स
चीन की किसी भी संभावित चालाकी का जवाब देने के लिए भारत ने सीमांत इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया है:
मुध-न्योमा एयरफील्ड (लद्दाख): करीब 13,700 फीट की ऊंचाई पर तैयार इस एयरफील्ड से भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमान और भारी ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट कुछ ही मिनटों में एलएसी के सबसे संवेदनशील इलाकों में सैन्य रसद पहुंचा सकते हैं।
ऑल-वेदर कनेक्टिविटी: बीआरओ (Border Roads Organisation) ने लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक सभी मौसमों में खुली रहने वाली सड़कें, सुरंगें और रणनीतिक हेलिपैड तैयार किए हैं, जिसके दम पर भारतीय सेना अब हर मौसम में चीन के बराबर या उससे बेहतर पोजिशन में डटी हुई है।
रक्षा मंत्रालय की यह रिपोर्ट दर्शाती है कि भारत ने 'शांति वार्ता के साथ आक्रामक सैन्य मजबूती' की जो नीति अपनाई, उसी का नतीजा है कि चीन को अपनी अतिरिक्त सेना वापस बुलाने पर मजबूर होना पड़ा है।