सुहरावर्दी और तितुमीर से लेकर लेनिन-मार्क्स सरणी तक लंबी है लिस्ट; कमेटी कर रही समीक्षा
पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक धरोहर, सांस्कृतिक पहचान और औपनिवेशिक व विदेशी प्रतीकों को हटाने की दिशा में सड़कों, पुलों और सार्वजनिक स्थलों के नाम बदलने की प्रक्रिया तेज हो गई है। राज्य सरकार द्वारा गठित उच्चस्तरीय समिति राजधानी कोलकाता समेत राज्य के विभिन्न हिस्सों में सड़कों के पुनर्नामकरण से जुड़े प्रस्तावों की गहन समीक्षा कर रही है। पार्क सर्कस के बहुचर्चित 'सुहरावर्दी एवेन्यू' का नाम बदलकर 'गोपाल मुखर्जी रोड' किए जाने के बाद अब कई अन्य ऐतिहासिक, विदेशी और मुस्लिम हस्तियों के नाम पर रखी गई सड़कों व चौराहों को लेकर नए नामकरण के प्रस्ताव सामने आए हैं। इस पर राज्य की राजनीति में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस छिड़ गई है।
कार्तिक महाराज की अगुवाई वाली समिति कर रही समीक्षा
राज्य सरकार ने सड़कों और सार्वजनिक स्थानों के नामों के मूल्यांकन के लिए पद्मश्री स्वामी प्रदीप्तानंद महाराज (जिन्हें आम बोलचाल में कार्तिक महाराज के नाम से जाना जाता है) की अध्यक्षता में एक विशेष समिति का गठन किया है।
इस उच्चस्तरीय समिति में मेघालय के पूर्व राज्यपाल तथागत रॉय, मुख्यमंत्री के सलाहकार सुब्रत गुप्ता और कोलकाता नगर निगम (KMC) की आयुक्त स्मिता पांडे शामिल हैं। समिति के अध्यक्ष कार्तिक महाराज के अनुसार, दुर्गा पूजा के बाद समिति की औपचारिक बैठक आयोजित होगी, जिसमें प्राप्त सभी प्रस्तावों का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आधार पर मूल्यांकन कर रिपोर्ट राज्य सरकार और विधानसभा को भेजी जाएगी।
किन-किन प्रमुख सड़कों और जगहों के नाम बदलने के प्रस्ताव?
समीक्षा के दायरे में आई प्रमुख सड़कों और स्थलों की सूची काफी विस्तृत है, जिसमें वामपंथी विचारकों से लेकर कई मुस्लिम व ऐतिहासिक नाम शामिल हैं:
1. मुस्लिम और ऐतिहासिक हस्तियों से जुड़े नाम
तितुमीर बस स्टैंड (बारासात): 19वीं सदी के किसान आंदोलन के नेता सैयद मीर निसार अली (तितुमीर) के नाम पर बने बारासात स्थित बस अड्डे का नाम बदलने का प्रस्ताव है। समिति सदस्य तथागत रॉय ने सुझाव दिया है कि इसके स्थान पर प्रमुख राष्ट्रवादी मुस्लिम हस्तियों—जैसे शिक्षाविद बेगम रुकैया, प्रख्यात लेखक काजी अब्दुल वदूद या निबंधकार एस. वाजेद अली का नाम रखा जाना चाहिए।
मुगल और पठान काल से जुड़े नाम: सरकार ने स्पष्ट किया है कि बंगाल के इतिहास में उत्पीड़नकारी रहे या 1946 के कलकत्ता दंगों और नोआखली हिंसा से कथित तौर पर जुड़े नामों को सार्वजनिक स्थलों पर जगह नहीं दी जाएगी। इसकी जगह डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसी राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति के प्रतीक हस्तियों को पूरा सम्मान दिया जाएगा।
2. वामपंथी और विदेशी विचारकों के नाम पर बनी 'सरणी'
कोलकाता के दिल में स्थित तीन बेहद प्रमुख सड़कों के नाम बदलने पर सबसे ज्यादा चर्चा है:
लेनिन सरणी: पूर्व में धर्मतला स्ट्रीट के नाम से मशहूर इस सड़क का नाम 1970 में रूसी क्रांति के जनक व्लादिमीर लेनिन के नाम पर रखा गया था। अब इसका नाम प्रसिद्ध गणितज्ञ और जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष देबप्रसाद घोष के नाम पर रखने का सुझाव दिया गया है।
कार्ल मार्क्स सरणी (खिदिरपुर): 1971 में सर्कुलर गार्डन रीच रोड का नाम बदलकर मार्क्स के नाम पर किया गया था। इसे स्थानीय बंगाली महाकवि माइकल मधुसूदन दत्त या रंगालाल बंद्योपाध्याय के नाम पर करने का प्रस्ताव है।
हो ची मिन्ह सरणी: वियतनामी नेता के नाम वाली इस महत्वपूर्ण सड़क का नाम अमेरिकी नागरिक अधिकार नेता मार्टिन लूथर किंग जूनियर के नाम पर करने की सिफारिश की गई है।
सुहरावर्दी एवेन्यू पर हुआ था बड़ा विवाद
कोलकाता नगर निगम द्वारा पार्क सर्कस स्थित सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलकर स्वतंत्रता सेनानी 'गोपाल चंद्र मुखोपाध्याय' (जिन्हें इतिहास में गोपाल पाठा के नाम से जाना जाता है) के नाम पर 'गोपाल मुखर्जी रोड' किए जाने के बाद विधानसभा में भारी हंगामा हुआ था।
विपक्ष का तर्क था कि यह सड़क पूर्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री हुसैन शहीद सुहरावर्दी के नाम पर नहीं, बल्कि कलकत्ता विश्वविद्यालय के पहले मुस्लिम उप-कुलपति और सर्जन लेफ्टिनेंट कर्नल सर हसन सुहरावर्दी के नाम पर थी। हालांकि, सरकार ने साफ कर दिया कि ऐतिहासिक भूलों को सुधारने और बंगाल की मूल अस्मिता को सम्मान देने की यह प्रक्रिया अब रुकेगी नहीं।
'इतिहास मिटाने की कोशिश' बनाम 'सांस्कृतिक पुनरुद्धार'
सड़कों के नाम बदलने की इस विस्तृत सूची पर पश्चिम बंगाल में राजनीतिक ध्रुवीकरण तेज हो गया है:
विपक्ष का आरोप: वामपंथी दलों और विपक्षी नेताओं का आरोप है कि सरकार जनहित के बुनियादी मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए शहर के समृद्ध कॉस्मोपॉलिटन और ऐतिहासिक ताने-बाने को मिटाने तथा इतिहास को दोबारा लिखने (Rewriting History) की कोशिश कर रही है।
सरकार और समिति का पक्ष: समिति का कहना है कि गुलामी की मानसिकता और विदेशी विचारधाराओं को ढोने के बजाय बंगाल के गौरव, स्थानीय महापुरुषों, वैज्ञानिकों और राष्ट्रीय स्वतंत्रता सेनानियों को सार्वजनिक मंचों पर स्थान दिलाना ही इस पुनर्गठन का एकमात्र लक्ष्य है।
अंतिम फैसला समिति की विस्तृत सिफारिशों और कैबिनेट की मंजूरी के बाद ही लागू होगा।