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September 05 2026 01:33 am

रात 12 बजे की पूजा के तुरंत बाद या अगले दिन सूर्योदय पर? जानें जन्माष्टमी का व्रत कितने बजे और किस विधि से खोलना चाहिए

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सनातन धर्म में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत समस्त व्रतों में 'व्रतराज' कहलाता है। करोड़ों श्रद्धालु अपने आराध्य बाल गोपाल के प्राकट्य के उपलक्ष्य में पूरे दिन निर्जला अथवा फलाहार उपवास रखकर मध्यरात्रि में भगवान के जन्मोत्सव का आनंद लेते हैं। कान्हा के जन्म, पंचामृत अभिषेक, दिव्य श्रृंगार और महाआरती के बाद सबसे महत्वपूर्ण और संशय से भरा प्रश्न जो हर भक्त के मन में उठता है, वह है—जन्माष्टमी का व्रत कितने बजे और कैसे तोड़ना चाहिए? धर्मशास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि जितना पुण्य और महत्व विधिपूर्वक उपवास रखने का होता है, उतना ही महत्व शास्त्रसम्मत समय पर 'पारण' (व्रत खोलने) का भी होता है। यदि पारण सही समय और सही विधि से न किया जाए, तो संपूर्ण व्रत का फल अधूरा या निष्फल माना जाता है। ऐसे में गृहस्थों और वैष्णवों के लिए पारण के क्या नियम हैं, क्या आधी रात 12 बजे के तुरंत बाद अन्न खाया जा सकता है या अगले दिन सूर्योदय की प्रतीक्षा करनी होती है, आइए जानते हैं धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु और पंचांग के अनुसार व्रत खोलने का सटीक समय और विधि।

जन्माष्टमी व्रत पारण का सही समय: शास्त्रों के अनुसार कब और कितने बजे खोलें उपवास?

वैदिक शास्त्रों में किसी भी व्रत के पारण के लिए स्पष्ट सिद्धांत तय किए गए हैं। जन्माष्टमी व्रत के संदर्भ में धर्मसिंधु ग्रंथ का नियम कहता है कि जब अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र दोनों समाप्त हो जाएं, तब पारण करना सर्वश्रेष्ठ होता है। यदि दोनों एक साथ समाप्त न हों, तो दोनों में से किसी एक के समाप्त होने के पश्चात पारण किया जाना चाहिए।

सामान्यतः जन्माष्टमी का पारण दो प्रमुख आधारों पर किया जाता है:

पहला समय मध्यरात्रि के पश्चात का होता है। जो गृहस्थ साधक रात्रि कालीन पूजा के तुरंत बाद व्रत का समापन करते हैं, वे मध्यरात्रि 12:45 बजे के बाद भगवान के चरणामृत और फलाहार से व्रत का आंशिक पारण करते हैं।

दूसरा और सर्वाधिक शास्त्रसम्मत समय अगले दिन प्रातः काल सूर्योदय के बाद का माना जाता है। अधिकांश पंचांगों के अनुसार अगले दिन प्रातः 6:00 बजे से लेकर दोपहर तक, जब अष्टमी तिथि या रोहिणी नक्षत्र का संचरण समाप्त होता है, तब पूर्ण अन्न ग्रहण करके पारण संपन्न किया जाता है। यदि अष्टमी तिथि सूर्योदय के बाद भी कुछ समय तक विद्यमान रहती है, तो तिथि समाप्त होने के बाद पारण करना परम पुण्यदायी माना गया है।

स्मार्त और वैष्णव परंपरा में पारण के अलग-अलग नियम: जानें आपके लिए क्या है सही

जन्माष्टमी व्रत के पारण का समय इस बात पर भी निर्भर करता है कि आप किस परंपरा के अनुयायी हैं। हिंदू धर्म में स्मार्त (गृहस्थ) और वैष्णव (साधु-संत एवं इस्कॉन परंपरा) संप्रदाय के पारण नियम एक-दूसरे से भिन्न होते हैं।

स्मार्त परंपरा का पालन करने वाले गृहस्थ साधक मध्यरात्रि व्यापिनी अष्टमी को मानते हैं। इसलिए गृहस्थों के लिए यह विधान है कि वे भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की रात 12:00 बजे भगवान श्रीकृष्ण के जन्म, अभिषेक, महाआरती और भोग समर्पण के बाद ही व्रत का संकल्प पूरा कर सकते हैं। गृहस्थ साधक रात 12:45 बजे से 1:00 बजे के बीच ठाकुर जी के चरणामृत, तुलसी दल और धनिया पंजीरी का प्रसाद ग्रहण करके अपना उपवास खोल लेते हैं।

इसके विपरीत, वैष्णव संप्रदाय, अखाड़ों के साधु-संत, महामंडलेश्वर और इस्कॉन व निम्बार्क संप्रदाय से जुड़े भक्त उदया तिथि और नवमी युक्ता अष्टमी को प्रधानता देते हैं। वैष्णव मत के अनुसार रात्रि में कभी भी व्रत का संपूर्ण पारण नहीं किया जाता। वे पूरी रात संकीर्तन और जागरण करते हैं और अगले दिन प्रातः काल नवमी तिथि में सूर्योदय के पश्चात, सूर्य देव को अर्घ्य देकर और ठाकुर जी को ताजा बालभोग अर्पित करने के बाद ही अन्न-जल ग्रहण करते हैं। यदि आप सामान्य पारिवारिक जीवन जी रहे हैं, तो आप स्मार्त पद्धति के अनुसार मध्यरात्रि के बाद चरणामृत लेकर अगले दिन सुबह अन्न पारण कर सकते हैं।

क्या आधी रात 12 बजे के बाद खोल सकते हैं व्रत? जानें शास्त्रोक्त सच्चाई

अक्सर भक्तों के बीच यह असमंजस रहता है कि क्या रात 12:00 बजे कान्हा का जन्म होते ही सामान्य भोजन या अन्न खाया जा सकता है? धर्मशास्त्र और आयुर्वेद दोनों ही इस विषय पर बहुत स्पष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं।

शास्त्रों के अनुसार रात्रि के समय तामसिक प्रवृत्तियां प्रबल होती हैं, इसलिए मध्यरात्रि में अन्न (रोटी, दाल, चावल या भारी भोजन) ग्रहण करना पूरी तरह वर्जित माना गया है। यदि आप रात 12:00 बजे के बाद व्रत खोलना चाहते हैं, तो उसे 'फलाहारी पारण' कहा जाता है। इसके तहत आप मध्यरात्रि पूजन के पश्चात भगवान को अर्पित किया गया पंचामृत, धनिया की पंजीरी, मखाने की खीर, कुट्टू या सिंघाड़े के आटे से बनी फलाहारी सामग्री और ऋतु फल ग्रहण कर सकते हैं।

अन्न से व्रत का पारण केवल और केवल अगले दिन सूर्योदय के बाद ही करना चाहिए। रात्रि के समय भारी या अन्न युक्त भोजन करने से न केवल व्रत की आध्यात्मिक ऊर्जा खंडित होती है, बल्कि पूरे दिन के उपवास के बाद पाचन तंत्र पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसलिए रात को केवल प्रभु का प्रसाद लेकर संतुष्ट रहें और अगले दिन सुबह स्नान के बाद ही पूर्ण भोजन करें।

जन्माष्टमी व्रत पारण की संपूर्ण प्रामाणिक विधि: क्या खाकर खोलें उपवास?

जन्माष्टमी व्रत का पारण करने की एक व्यवस्थित और पवित्र धार्मिक प्रक्रिया है, जिसका पालन करने से व्रत का संपूर्ण आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है।

पारण के दिन प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर घर की साफ-सफाई करें और गंगाजल युक्त जल से स्नान करें। इसके पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण करके तांबे के लोटे से भगवान सूर्य नारायण को जल, अक्षत और रोली मिलाकर अर्घ्य दें। अब अपने घर के पूजा स्थल पर जाएं और लड्डू गोपाल के सम्मुख घी का दीपक जलाएं। प्रभु को प्रणाम करें और रात में हुई किसी भी भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें।

इसके बाद सबसे पहले भगवान को अर्पित किया गया चरणामृत अपनी दाहिनी हथेली में लें। चरणामृत लेते समय यह भावना रखें कि यह साक्षात प्रभु का पावन प्रसाद है। चरणामृत के साथ एक तुलसी पत्र मुख में रखें। इसके बाद धनिया की पंजीरी और माखन-मिश्री का छोटा सा अंश ग्रहण करें।

यदि आप अगले दिन सुबह संपूर्ण अन्न पारण कर रहे हैं, तो शुद्ध देसी घी में बना सात्विक भोजन ग्रहण करें। इसमें कढ़ी-चावल, पूड़ी, सात्विक बिना प्याज-लहसुन की आलू या कद्दू की सब्जी बनाई जा सकती है। पारण का भोजन सदैव सात्विक, ताजा और प्रभु को भोग लगाने के बाद ही परिवार सहित ग्रहण करना चाहिए।

पारण में भूलकर भी न करें ये गलतियां: वरना निष्फल हो सकता है संपूर्ण व्रत का पुण्य

पारण के समय की गई छोटी सी लापरवाही भी पूरे 24 घंटे की कठिन तपस्या और उपवास के पुण्य को नष्ट कर सकती है। इसलिए कुछ सावधानियों का ध्यान रखना अति आवश्यक है।

सर्वप्रथम, पारण के भोजन में कभी भी लहसुन, प्याज, अधिक तीखे मसाले, मसूर की दाल या बासी खाद्य पदार्थों का प्रयोग नहीं होना चाहिए। भोजन पूरी तरह वैष्णव और सात्विक होना चाहिए।

दूसरी बात, बिना भगवान को भोग लगाए सीधे भोजन की थाली पर न बैठें। जो भी भोजन बने, उसका पहला भाग लड्डू गोपाल और गौ माता के लिए अलग निकालें।

तीसरी बात, व्रत पारण से पूर्व किसी जरूरतमंद व्यक्ति, ब्राह्मण अथवा किसी भूखे जीव को भोजन या सामर्थ्यानुसार दान अवश्य दें। स्कंद पुराण में कहा गया है कि बिना दान के किया गया व्रत पारण अधूरा रहता है।

चौथी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पारण करते समय मन में किसी के प्रति क्रोध, ईर्ष्या या जल्दबाजी का भाव न लाएं। शांत और प्रसन्न चित्त से प्रभु का धन्यवाद करते हुए भोजन ग्रहण करें।

मथुरा-वृंदावन से अवध और उन्नाव तक: पारण की लोक परंपराएं और सांस्कृतिक रंग

जन्माष्टमी के अगले दिन पारण और 'नंदोत्सव' का उल्लास पूरे उत्तर भारत में देखने लायक होता है। कान्हा की जन्मस्थली मथुरा, वृंदावन, गोकुल और बरसाना में जन्माष्टमी की अगली सुबह भव्य 'दधिकांदो' और नंदोत्सव का आयोजन होता है, जहां श्रद्धालु एक-दूसरे पर हल्दी, दही और माखन छिड़ककर कान्हा के जन्म की बधाइयां बांटते हैं।

उत्तर प्रदेश के अवध परिक्षेत्र, विशेष रूप से उन्नाव, कानपुर, लखनऊ, रायबरेली और अयोध्या के ग्रामीण व शहरी अंचलों में पारण के दिन घर-घर विशेष उत्सव का माहौल रहता है। यहां की लोक परंपरा में पारण के दिन बेटियों और बहनों को घर बुलाकर माखन, पंजीरी और पूड़ी-खीर का प्रसाद खिलाने की प्राचीन प्रथा है। उन्नाव और कानपुर के स्थानीय मंदिरों में सुबह से ही भक्तों की कतारें चरणामृत और पंजीरी का महाप्रसाद लेने के लिए उमड़ती हैं। स्थानीय हलवाई और मिष्ठान विक्रेता विशेष रूप से देसी घी के घेवर, मालपुआ और माखन की व्यवस्था करते हैं। इस प्रकार यह पावन पारण केवल एक व्रत की समाप्ति नहीं, बल्कि समाज में प्रेम, समरसता और ईश्वरीय अनुग्रह के विस्तार का महापर्व बन जाता है।