कैसे सोशल मीडिया पर पुलिस पहुंचती है अपराधी तक? जानें आईपी ट्रैकिंग और डिजिटल फोरेंसिक का पूरा विज्ञान
India News Live,Digital Desk : डिजिटल युग में अब अपराधी के लिए अपनी पहचान छिपाना नामुमकिन सा हो गया है। हाल ही में नोएडा हिंसा के तार पाकिस्तान से जुड़ने के दावों ने एक बार फिर यह चर्चा छेड़ दी है कि पुलिस इंटरनेट के समंदर में भड़काऊ पोस्ट डालने वाले असली चेहरे को कैसे पहचान लेती है। कई बार लोगों को लगता है कि 'फेक आईडी' या 'डिलीटेड मैसेज' उन्हें सुरक्षित रख सकते हैं, लेकिन पुलिस की सोशल मीडिया मॉनिटरिंग सेल के पास ऐसे हाई-टेक हथियार हैं जिनसे अपराधी का बच निकलना नामुमकिन है।
सोशल मीडिया मॉनिटरिंग: 24/7 नजर रखती है पुलिस
देश के लगभग हर राज्य में अब पुलिस के पास 'सोशल मीडिया लैब' और 'साइबर सेल' हैं। किसी भी बड़ी घटना या त्यौहार के दौरान ये टीमें एआई-आधारित (AI-based) टूल्स का उपयोग करती हैं। ये टूल्स इंटरनेट पर चल रहे कीवर्ड्स, विवादित हैशटैग और वायरल हो रहे भड़काऊ वीडियो को तुरंत पकड़ लेते हैं। यदि कोई पोस्ट शांति भंग करने वाली लगती है, तो पुलिस उसकी जांच शुरू कर देती है।
वो 3 तरीके जिनसे पकड़ा जाता है 'डिजिटल फुटप्रिंट'
पुलिस मुख्य रूप से तीन तकनीकी चरणों का उपयोग करती है:
मेटाडेटा विश्लेषण (Metadata Analysis): जब भी आप कोई फोटो या वीडियो पोस्ट करते हैं, तो उसके पीछे एक गुप्त जानकारी छिपी होती है जिसे 'मेटाडेटा' कहते हैं। इसमें यह दर्ज होता है कि फोटो किस समय ली गई, किस डिवाइस से ली गई और उस समय उस डिवाइस की भौगोलिक लोकेशन (Geotag) क्या थी।
आईपी एड्रेस ट्रैकिंग (IP Address Tracking): हर इंटरनेट कनेक्शन का एक यूनिक 'डिजिटल पता' होता है जिसे आईपी एड्रेस कहते हैं। पुलिस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म (जैसे मेटा, एक्स) से कानूनी तौर पर उस पोस्ट का आईपी मांगती है। इसके बाद इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर (ISP) के जरिए उस सिम कार्ड या ब्रॉडबैंड कनेक्शन के मालिक तक पहुंचा जाता है।
जियोफेंसिंग (Geofencing): अगर किसी खास इलाके में हिंसा हुई है, तो पुलिस जियोफेंसिंग तकनीक का उपयोग करती है। इससे यह पता चल जाता है कि उस समय उस इलाके में कौन-कौन से मोबाइल नंबर या डिवाइस सक्रिय थे।
डिलीटेड मैसेज भी नहीं हैं सुरक्षित: डिजिटल फोरेंसिक का कमाल
अपराधी अक्सर सबूत मिटाने के लिए चैट या पोस्ट डिलीट कर देते हैं। लेकिन पुलिस के पास डिजिटल फोरेंसिक टूल्स (जैसे सेलेब्राइट - Cellebrite) होते हैं। ये टूल्स संदिग्ध के फोन या कंप्यूटर से डिलीट किए गए डेटा, व्हाट्सएप मैसेज और कॉल रिकॉर्ड्स को रिकवर कर सकते हैं। इसके अलावा, डार्क वेब पर होने वाली गतिविधियों को ट्रैक करने के लिए भी विशेष सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया जाता है।
सोशल मीडिया कंपनियों का सहयोग
भारतीय कानूनों (IT Rules) के तहत, फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स जैसी कंपनियों को पुलिस की वैध जांच में सहयोग करना अनिवार्य है। जांच अधिकारी जब कोर्ट के आदेश या आधिकारिक नोटिस के जरिए जानकारी मांगते हैं, तो ये कंपनियां यूजर की लॉगिन हिस्ट्री, फोन नंबर और ईमेल जैसी जानकारियां साझा करती हैं।