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September 04 2026 05:48 am

14 साल तक ऑपरेशन का नंबर नहीं मिला, एम्स में तड़पकर बच्ची की हुई दर्दनाक मौत

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भारतीय स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की पोल खोलती एक बेहद वीभत्स और हृदयविदारक घटना देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) से सामने आई है। इस घटना ने एक बार फिर देश की सरकारी चिकित्सा व्यवस्था, लालफीताशाही और प्रशासनिक संवेदनहीनता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ जहां सरकारें विश्व स्तरीय स्वास्थ्य सुविधाएं देने और बड़े-बड़े दावे करने से नहीं थकतीं, वहीं दूसरी तरफ जमीनी हकीकत यह है कि एक मासूम बच्ची को अपनी जिंदगी बचाने के लिए जरूरी सर्जरी के वास्ते चौदह लंबे साल तक इंतजार करना पड़ा और अंततः उसे इलाज के अभाव में अपनी जान gavanani पड़ी। स्थिति इतनी अधिक दर्दनाक और शर्मनाक हो गई कि जब उस मासूम ने अस्पताल के बिस्तर पर दम तोड़ा, तो उसके गमगीन और टूटे हुए पिता ने सिस्टम के खिलाफ अनूठा और कड़ा विरोध जताते हुए अपनी बेटी के शव को लेने से ही साफ इनकार कर दिया। इस घटना के बाद से अस्पताल परिसर में तनाव का माहौल है और हर तरफ केवल यही चर्चा हो रही है कि आखिर एक गरीब परिवार की जिंदगी और उसकी पीड़ा से इस तरह का खिलवाड़ क्यों किया जाता रहा।

इस पूरी त्रासदी की पृष्ठभूमि पर अगर नजर डाली जाए तो यह किसी भी संवेदनशील इंसान की आत्मा को झकझोर देने के लिए काफी है। परिवार के सदस्यों द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, बच्ची जब बहुत छोटी थी तभी उसे एक गंभीर और जटिल बीमारी ने अपनी चपेट में ले लिया था। स्थानीय स्तर पर डॉक्टरों ने जब हाथ खड़े कर दिए और परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय थी, तब वे उम्मीद की आखिरी किरण लेकर देश के सबसे बड़े अस्पताल यानी दिल्ली एम्स पहुंचे थे। एम्स के डॉक्टरों ने बीमारी की गंभीरता को देखते हुए ऑपरेशन की सलाह तो जरूर दी, लेकिन उसके बाद शुरू हुआ तारीखों का अंतहीन और क्रूर सिलसिला। कभी डॉक्टरों की कमी, कभी मशीनों के खराब होने का बहाना, कभी लंबी वेटिंग लिस्ट तो कभी तारीख पर तारीख मिलने का यह सिलसिला एक साल, दो साल नहीं बल्कि पूरे चौदह वर्षों तक चलता रहा। बच्ची बड़ी होती गई, उसकी तकलीफें बढ़ती गईं, शरीर कमजोर होता गया, लेकिन एम्स के दस्तावेजों में उसका ऑपरेशन नंबर कभी आगे नहीं बढ़ पाया। एक बच्ची की पूरी उम्र अस्पताल के चक्कर काटते-काटते और पर्चियां बदलते-बदलते बीत गई, लेकिन सिस्टम को उस पर दया नहीं आई।

एम्स प्रशासन की सफाई और स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी हकीकत का सच

जब यह मामला मीडिया की सुर्खियों में आया और सोशल मीडिया पर प्रशासनिक लापरवाही की यह दास्तान आग की तरह फैली, तो एम्स प्रशासन की ओर से भी सफाई पेश करने का दौर शुरू हुआ। अस्पताल के अधिकारियों ने हमेशा की तरह इस बात का रोना रोया कि एम्स में हर दिन देश भर से लाखों की संख्या में मरीज इलाज के लिए आते हैं, जिसके कारण डॉक्टरों पर काम का अत्यधिक बोझ रहता है और बुनियादी ढांचे की सीमाएं होती हैं। प्रशासन का तर्क था कि अति-गंभीर और इमरजेंसी मामलों को प्राथमिकता दी जाती है, जिसके चलते कई बार रूटीन सर्जरी या जटिल मामलों की वेटिंग लिस्ट लंबी हो जाती है। हालांकि, सवाल यह उठता है कि क्या चौदह साल का इंतजार किसी भी सभ्य समाज और आधुनिक स्वास्थ्य प्रणाली का हिस्सा हो सकता है? क्या एक मरीज को अपनी बारी आने का इंतजार करते-करते इस दुनिया से विदा हो जाना चाहिए? विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल काम के बोझ का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से प्राथमिकताओं की कमी, लचर प्रबंधन और संवेदनहीन लालफीताशाही का एक जीता-जागता उदाहरण है, जहां एक गरीब की जान की कोई कीमत नहीं समझी जाती।

इस पूरी त्रासदी का सबसे मर्मस्पर्शी और झकझोर देने वाला पहलू उस पिता का संघर्ष और उसका अंतिम आक्रोश है, जिसने अपनी आंखों के सामने अपनी बेटी को तिल-तिल कर घुटते हुए देखा। जब बच्ची ने आखिरकार दम तोड़ दिया, तो अस्पताल के कर्मचारियों ने औपचारिकताएं पूरी करते हुए शव को ले जाने के लिए कहा। लेकिन उस लाचार और टूटे हुए पिता ने जिस साहस का परिचय दिया, उसने वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम कर दीं। पिता ने साफ कह दिया कि जब तक इस बात का जवाब नहीं मिलता कि उसकी बेटी को चौदह साल तक ऑपरेशन की एक अदद तारीख क्यों नहीं दी गई, तब तक वह अपनी बेटी के बेजान शरीर को यहां से नहीं ले जाएगा। उसने न्याय की मांग करते हुए कहा कि यदि जिंदा रहते हुए इस देश का सिस्टम उसकी बच्ची को एक ऑपरेशन का मौका नहीं दे सका, तो कम से कम उसकी इस मौत के जरिए वह देश की सोई हुई व्यवस्था को झकझोरना चाहता है। पिता का यह मौन और दृढ़ विरोध इस बात का प्रतीक बन गया कि कैसे एक आम नागरिक सरकारी दफ्तरों और अस्पतालों के चक्कर काटते-काटते अंदर से पूरी तरह टूट जाता है और अंत में उसके पास केवल विरोध दर्ज कराने के अलावा और कुछ नहीं बचता।

यह दर्दनाक घटना केवल एक परिवार का व्यक्तिगत शोक नहीं है, बल्कि यह हमारे देश की स्वास्थ्य सेवाओं के उस अंधेरे कोने का सच है जिसे अक्सर सरकारी विज्ञापनों और चमकदार आंकड़ों के पीछे छुपा दिया जाता है। भारत जैसे विकासशील देश में जहां स्वास्थ्य का अधिकार हर नागरिक का मौलिक हक होना चाहिए, वहां यदि किसी बच्चे को इलाज के अभाव में अपनी जान गंवानी पड़े, तो यह पूरे समाज और शासनतंत्र के लिए एक आत्ममंथन का विषय है। इस घटना के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों, मानवाधिकार संगठनों और आम नागरिकों ने एम्स प्रशासन और स्वास्थ्य मंत्रालय से कड़ी कार्रवाई की मांग की है। लोगों का कहना है कि इस मामले की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच होनी चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि भविष्य में किसी भी अन्य बच्चे को तारीखों के इस अंतहीन चक्रव्यूह में फंसकर अपनी जान न गंवानी पड़े। बहरहाल, बच्ची की मौत और पिता के उस विलाप ने एक बार फिर से यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हम वास्तव में एक ऐसे समाज का निर्माण कर पा रहे हैं जहां हर एक नागरिक की जान कीमती हो, या फिर हमारी व्यवस्थाएं कागजों पर तो मजबूत हैं लेकिन इंसानी जिंदगियों के मामले में पूरी तरह से खोखली और बेदर्द साबित हो रही हैं।