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September 09 2026 02:45 am

'जब तक जरूरत न हो, सोना मत खरीदो...', पीएम मोदी की अपील के बाद गोल्ड इंपोर्ट में 15% की बड़ी गिरावट का अनुमान

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भारत में आगामी त्योहारी और शादियों के सीजन से ठीक पहले सर्राफा बाजार और देश के आयात-निर्यात तंत्र में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशवासियों से 'सोना न खरीदने' और गैर-जरूरी विदेशी खर्चों से बचने की बार-बार की जा रही भावुक अपील का सीधा असर अब देश के विदेशी व्यापार पर दिखने लगा है। इंडिया बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन (IBJA) के ताजा व्यापारिक आकलनों के अनुसार, सितंबर 2026 के महीने में भारत के सोने के आयात में करीब 15 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज होने का अनुमान है। अगस्त के महीने में जहां देश भर में करीब 45 टन सोने का आयात हुआ था, वहीं सितंबर में यह आंकड़ा घटकर काफी नीचे आ सकता है। कच्चे तेल के बाद देश के कुल आयात बिल में दूसरी सबसे बड़ी हिस्सेदारी रखने वाले सोने पर लगी इस अघोषित ब्रेक ने मुंबई के ऐतिहासिक झवेरी बाजार से लेकर देश भर के ज्वैलरी शोरूमों की कार्यप्रणाली और उपभोक्ताओं की खरीदारी की आदतों को पूरी तरह बदल कर रख दिया है।

114 दिनों में दूसरी बार अपील: आखिर क्यों पीएम मोदी ने कहा 'सोना मत खरीदो'?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1 सितंबर को अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर एक रील साझा करते हुए देश की जनता से सीधा आग्रह किया कि जब तक नितांत आवश्यकता न हो, तब तक सोने की नई खरीदारी से परहेज करें। हैरान करने वाली बात यह है कि महज 114 दिनों के भीतर यह दूसरा मौका है जब देश के प्रधानमंत्री ने सीधे तौर पर नागरिकों से सोना न खरीदने का खुला आह्वान किया है। इससे पूर्व 10 मई को हैदराबाद में आयोजित एक विशाल जनसभा के दौरान भी पीएम मोदी ने देश की आर्थिक संप्रभुता का हवाला देते हुए नागरिकों से 'एक साल तक सोने के जेवर न खरीदने' का सात-सूत्री संकल्प लेने को कहा था।

प्रधानमंत्री ने अपनी अपील में साफ तौर पर रेखांकित किया कि देश को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और विकसित राष्ट्र बनाने के लिए विदेशी मुद्रा की हर एक पाई का सदुपयोग बुनियादी ढांचे, विनिर्माण और ऊर्जा सुरक्षा में होना चाहिए। सोने की अत्यधिक और अनावश्यक खरीदारी से देश की गाढ़ी कमाई विदेशी सप्लायर्स की जेब में डॉलर के रूप में चली जाती है। पीएम मोदी ने नागरिकों को यह भी सलाह दी कि वे विदेश यात्राओं और विदेशों में जाकर महंगी डेस्टिनेशन वेडिंग्स करने के चलन से बचें और इसके बजाय घरेलू पर्यटन, स्थानीय उत्पादों और 'स्वदेशी' को प्राथमिकता दें ताकि देश की पूंजी देश के भीतर ही घूमकर रोजगार और समृद्धि का जरिया बन सके।

अगस्त में 45 टन आयात, सितंबर में 15% की गिरावट: IBJA का जमीनी आकलन

प्रधानमंत्री की इस नई अपील के बाद देश के सबसे बड़े आभूषण व्यापार संगठन 'इंडिया बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन' (आईबीजेए) ने जमीनी बाजार का आकलन करते हुए आयात में तेज मंदी की पुष्टि की है। आईबीजेए के राष्ट्रीय सचिव सुरेंद्र मेहता के अनुसार, अगस्त के महीने में देश में लगभग 45 टन सोना आयात किया गया था, लेकिन प्रधानमंत्री के सख्त संदेश और उपभोक्ताओं के सतर्क रुख के कारण सितंबर में इसमें कम से कम 15 प्रतिशत की सीधी गिरावट तय मानी जा रही है।

सुरेंद्र मेहता का कहना है कि यह गिरावट ऐसे समय में दर्ज हो रही है जब आमतौर पर गणेश उत्सव, नवरात्रि, धनतेरस और दिवाली की तैयारी के लिए ज्वैलर्स बड़े पैमाने पर बुलियन का अग्रिम स्टॉक जमा करते हैं। लेकिन इस बार बाजार में सट्टेबाजी और भारी इन्वेंट्री जमा करने का उत्साह ठंडा पड़ा हुआ है। ज्वैलर्स को आशंका है कि यदि उन्होंने जरूरत से ज्यादा विदेशी सोना मंगाया और जनता ने पीएम की अपील का सम्मान करते हुए नई खरीदारी टाल दी, तो उनकी करोड़ों रुपये की पूंजी महंगे सोने के स्टॉक में फंस जाएगी। यही कारण है कि आयातक और बड़े बुलियन डीलर्स बेहद नपे-तुले तरीके से केवल वास्तविक मांग के आधार पर ही आयात के ऑर्डर दे रहे हैं।

72 अरब डॉलर का रिकॉर्ड बिल और रुपये पर दबाव: सरकार के सामने क्या है आर्थिक मजबूरी?

प्रधानमंत्री की इस असामान्य और ऐतिहासिक अपील के पीछे भारत की व्यापक आर्थिक हकीकत और विदेशी मुद्रा की रक्षा की गहरी मजबूरी छिपी है। भारत अपनी सोने की कुल घरेलू खपत का 99 प्रतिशत से अधिक हिस्सा विदेशों से आयात करता है, क्योंकि देश के भीतर सोने का खनन न के बराबर होता है। हालिया वित्तीय आंकड़ों पर नजर डालें तो वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का कुल सोना आयात बिल 71.98 अरब डॉलर (लगभग 72 बिलियन डॉलर) के सर्वकालिक रिकॉर्ड स्तर पर जा पहुंचा, जो पिछले वित्त वर्ष के 58 अरब डॉलर से 24 प्रतिशत से भी अधिक की छलांग दर्शाता है।

दिलचस्प और चिंताजनक तथ्य यह है कि भारत ने भौतिक रूप से सोने की मात्रा में करीब 5 प्रतिशत की कमी दर्ज की थी—जो 757 टन से घटकर 721 टन रह गई थी। लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सोने के भाव रिकॉर्ड ऊंचाइयों पर पहुंचने के कारण कम मात्रा के बावजूद भारत को विदेशी मुद्रा भंडार से भारी भरकम डॉलर चुकाने पड़े। पश्चिम एशिया में जारी तनाव, भू-राजनीतिक अस्थिरता और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर पहले से ही भारी दबाव बना रखा है। जब देश सोना खरीदता है, तो उसके बदले अंतरराष्ट्रीय बैंकों को डॉलर में भुगतान करना पड़ता है। डॉलर की इस अत्यधिक मांग के कारण भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार दबाव में रहता है और देश का चालू खाता घाटा (Current Account Deficit - CAD) तेजी से बढ़ने लगता है। सरकार जानती है कि यदि सोने के इस अनियंत्रित प्रवाह को नहीं रोका गया, तो देश के विदेशी मुद्रा भंडार और व्यापक आर्थिक स्थिरता को गंभीर खतरा हो सकता है।

झवेरी बाजार में नया ट्रेंड: 'ओल्ड गोल्ड एक्सचेंज' 70% तक पहुंचने की उम्मीद

प्रधानमंत्री की अपील और आसमान छूती सोने की कीमतों ने देश भर के ज्वैलरी कारोबार में एक क्रांतिकारी बदलाव को जन्म दिया है। मुंबई के प्रसिद्ध झवेरी बाजार, दिल्ली के चांदनी चौक और दक्षिण भारत के प्रमुख ज्वैलरी हब्स में अब 'ओल्ड गोल्ड एक्सचेंज' यानी पुराने सोने के बदले नए जेवर बनवाने का चलन मुख्यधारा बन चुका है।

आभूषण उद्योग के शीर्ष अधिकारियों के अनुसार, सामान्य दिनों में किसी भी ज्वैलर के कुल कारोबार में पुराने सोने की रीसाइक्लिंग या एक्सचेंज की हिस्सेदारी 40 से 50 प्रतिशत के आसपास हुआ करती थी। लेकिन इस बार आगामी त्योहारी सीजन में यह आंकड़ा बढ़कर 60 से 70 प्रतिशत तक पहुंचने की पूरी संभावना है। अनुमान है कि भारतीय परिवारों और धार्मिक ट्रस्टों की तिजोरियों में लगभग 31,000 टन से अधिक सोना निष्क्रिय रूप से रखा हुआ है। जोस अलुक्कास और इंद्रिया जैसे प्रमुख ज्वैलरी ब्रांड्स के प्रबंधन का मानना है कि भारतीय संस्कृति में शादी-ब्याह और त्योहारों पर जेवर खरीदना एक गहरा भावनात्मक और मांगलिक प्रतीक है, जिसे लोग पूरी तरह छोड़ना नहीं चाहते। ऐसे में उपभोक्ता नकदी बचाने और पीएम की अपील का सम्मान करने के लिए अपनी अलमारियों में पड़े पुराने, बिना इस्तेमाल वाले सोने को बाहर निकाल रहे हैं और उसे पिघलाकर नए और आधुनिक डिजाइनों में ढलवा रहे हैं। इस ट्रेंड से ज्वैलर्स का काम भी चल रहा है और देश से विदेशी मुद्रा बाहर जाने से भी बच रही है।

अगर सफल रही अपील तो बचेंगे 25 अरब डॉलर: देश की अर्थव्यवस्था के लिए गेमचेंजर

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस मुहिम का सीधा असर देश की बैलेंस शीट पर पड़ सकता है। यदि भारतीय समाज सोने की अपनी अंधाधुंध खरीदारी को केवल 30 से 40 प्रतिशत तक कम कर देता है, तो भारत को सालाना 20 से 25 अरब डॉलर की शुद्ध विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है। यदि यह कटौती 50 प्रतिशत तक पहुंच जाती है, तो देश को करीब 36 अरब डॉलर की बचत होगी, जो भारत के संभावित चालू खाता घाटे के आधे हिस्से की भरपाई करने के लिए पर्याप्त है।

यह बचा हुआ डॉलर भारत की रणनीतिक ऊर्जा सुरक्षा, कच्चे तेल की निर्बाध आपूर्ति, सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन और आधुनिक रक्षा सौदों में काम आ सकता है। इसके अलावा जब सोने की मांग नियंत्रित होगी, तो रुपये की गिरावट पर ब्रेक लगेगा, जिससे देश में आयातित महंगाई (इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन) को थामने में रिजर्व बैंक को बड़ी राहत मिलेगी। यह कदम इस बात की मिसाल है कि कैसे जन-भागीदारी और सामूहिक आर्थिक अनुशासन के जरिए किसी देश की आर्थिक तकदीर को नई दिशा दी जा सकती है।

प्रधानमंत्री का यह आह्वान केवल एक प्रशासनिक सलाह नहीं, बल्कि 140 करोड़ नागरिकों के उपभोग व्यवहार को बदलकर देश को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाने का एक साहसिक सामाजिक प्रयोग है। आने वाले नवरात्रि, धनतेरस और शादी के महीनों में यह देखना बेहद दिलचस्प और निर्णायक होगा कि भारतीय समाज सदियों पुराने सोने के प्रति अपने गहरे आकर्षण और राष्ट्र की आर्थिक प्राथमिकताओं के बीच किस तरह संतुलन साधता है।