'2 टेस्ट मैचों की सीरीज का कोई मतलब नहीं': गौतम गंभीर ने 25 साल पुराने ऐतिहासिक मैच का दिया हवाला
भारतीय क्रिकेट टीम के मुख्य कोच गौतम गंभीर अपने आक्रामक और स्पष्टवादी रवैये के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने टेस्ट क्रिकेट के मौजूदा स्वरूप और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट कैलेंडर में लगातार खेली जा रही 2 मैचों की टेस्ट सीरीज पर बड़ा सवाल खड़ा किया है। गंभीर का मानना है कि टेस्ट क्रिकेट में दो मैचों की सीरीज का कोई वास्तविक महत्व नहीं रह जाता, क्योंकि इसमें टीमों को अपनी गलतियों से सीखकर सीरीज में वापसी करने का मौका ही नहीं मिलता।
गंभीर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि टेस्ट क्रिकेट के वास्तविक रोमांच, खिलाड़ियों के चरित्र और खेल की शुद्धता को जिंदा रखना है, तो हर द्विपक्षीय टेस्ट सीरीज कम से कम तीन मैचों की होनी चाहिए। दो टेस्ट मैचों की श्रृंखला केवल खानापूर्ति बनकर रह गई है, जिससे खेल की गुणवत्ता और प्रशंसकों के उत्साह दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
2001 का ऐतिहासिक कोलकाता टेस्ट: 25 साल पुराना वो करिश्मा
अपनी बात को मजबूती से रखने के लिए गौतम गंभीर ने लगभग 25 साल पहले 2001 में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच खेली गई ऐतिहासिक बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी का उदाहरण दिया। उस दौर में स्टीव वॉ की कप्तानी वाली ऑस्ट्रेलियाई टीम को अजेय माना जाता था और वे लगातार 16 टेस्ट मैच जीतकर भारत दौरे पर आए थे।
मुंबई में खेला गया पहला टेस्ट मैच भारत तीन दिन के भीतर ही हार गया था। इसके बाद कोलकाता के ईडन गार्डन्स में दूसरे टेस्ट मैच में भारत पर फॉलोऑन का खतरा मंडरा रहा था। उस नाजुक मोड़ पर वीवीएस लक्ष्मण (281 रन) और राहुल द्रविड़ (180 रन) ने पूरे एक दिन बिना कोई विकेट गंवाए बल्लेबाजी कर इतिहास रच दिया था। हरभजन सिंह की हैट्रिक और घातक गेंदबाजी के दम पर भारत ने न केवल वह मैच जीता, बल्कि चेन्नई में हुआ तीसरा टेस्ट जीतकर सीरीज 2-1 से अपने नाम कर ली।
गंभीर ने तर्क दिया कि यदि 2001 में केवल 2 टेस्ट मैचों की सीरीज होती, तो भारत पहला मैच हारने के बाद कोलकाता में जीत दर्ज करके केवल सीरीज 1-1 से ड्रॉ ही कर पाता। भारत को वह ऐतिहासिक सीरीज जीतने और इतिहास के सबसे महान कमबैक को मुकम्मल करने का अवसर कभी नहीं मिलता।
वापसी का अवसर और खिलाड़ियों के चरित्र की असली परीक्षा
टेस्ट क्रिकेट केवल तकनीक का खेल नहीं है, बल्कि यह मानसिक दृढ़ता, धैर्य और परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की परीक्षा है। गंभीर के अनुसार, जब कोई टीम विदेशी दौरे पर जाती है या घरेलू मैदान पर किसी मजबूत प्रतिद्वंद्वी से टकराती है, तो पहले टेस्ट मैच में परिस्थितियां समझने में समय लग सकता है।
यदि किसी टीम का एक सत्र या एक मैच खराब चला जाए, तो 2 टेस्ट मैचों की सीरीज में उसके पास सीरीज जीतने का कोई रास्ता नहीं बचता। टीम केवल हार टालने या बराबरी करने के लिए खेलती है, जिससे मुकाबले की आक्रामकता खत्म हो जाती है। वहीं 3 मैचों की सीरीज में पहला मैच गंवाने वाली टीम के पास रणनीति बदलकर अगले दो मुकाबले जीतकर सीरीज फतह करने की पूरी संभावना बनी रहती है। यही अनिश्चितता और वापसी का जज्बा टेस्ट फॉर्मेट को सबसे खास बनाता है।
आईसीसी और बिजी क्रिकेट कैलेंडर पर खड़े होते सवाल
वर्तमान समय में फ्रैंचाइजी टी20 लीग्स और सीमित ओवरों के टूर्नामेंट्स की भरमार के कारण अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का शेड्यूल बेहद व्यस्त हो चुका है। वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप (WTC) के मौजूदा चक्र में समय बचाने और यात्रा की थकान कम करने के लिए कई क्रिकेट बोर्ड आपस में केवल 2-2 मैचों की छोटी टेस्ट सीरीज खेल रहे हैं।
न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, श्रीलंका, वेस्टइंडीज और बांग्लादेश जैसी टीमें अक्सर 2 मैचों की टेस्ट सीरीज का हिस्सा बनती हैं। केवल भारत, ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसी बड़ी टीमें ही 4 या 5 टेस्ट मैचों की लंबी सीरीज खेल पाती हैं। गंभीर का मानना है कि प्रशासकों को व्यावसायिक हितों और ब्रॉडकास्टिंग के दबाव से ऊपर उठकर पारंपरिक टेस्ट फॉर्मेट के वजूद के बारे में सोचना होगा। टेस्ट मैचों की संख्या घटाकर टी20 को बढ़ाना खेल के सबसे कठिन प्रारूप के साथ अन्याय है।
गेंदबाजों और बल्लेबाजों के विकास के लिए जरूरी है समय
एक युवा खिलाड़ी के विकास के नजरिए से भी गंभीर ने 3 मैचों की सीरीज को अनिवार्य बताया। किसी भी युवा बल्लेबाज या गेंदबाज को विदेशी पिचों और अलग परिस्थितियों के अनुकूल खुद को ढालने के लिए कम से कम 2 से 3 मैचों का समय चाहिए होता है।
दो मैचों की सीरीज में एक विफलता के बाद खिलाड़ी पर भारी दबाव आ जाता है और उसे अपनी प्रतिभा साबित करने का दूसरा मौका मिलने से पहले ही सीरीज समाप्त हो जाती है। 3 या अधिक मैचों की सीरीज में खिलाड़ी अपनी तकनीकी खामियों पर काम कर सकते हैं, विपक्षी गेंदबाजों या बल्लेबाजों के पैटर्न को समझ सकते हैं और मैदान पर प्रभावी रणनीति के साथ उतर सकते हैं।
क्रिकेट बोर्ड्स को गंभीर का सीधा संदेश
भारतीय हेड कोच ने स्पष्ट किया कि यदि इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (ICC) और सदस्य देश वास्तव में टेस्ट क्रिकेट को उसका खोया हुआ गौरव लौटाना चाहते हैं, तो उन्हें 2 मैचों के प्रारूप को पूरी तरह बंद कर देना चाहिए।
टेस्ट क्रिकेट की असली खूबसूरती उतार-चढ़ाव, दबाव और रोमांचक पलों में है। जब दो टीमें तीन हफ्तों तक एक-दूसरे के खिलाफ पांच-पांच दिन के मुकाबलों में आमने-सामने होती हैं, तभी असली चैंपियन टीम की पहचान होती है। गंभीर की यह राय न केवल क्रिकेट विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बन गई है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करती है कि क्या क्रिकेट प्रशासन खेल के इस सबसे प्रतिष्ठित प्रारूप के साथ न्याय करने के लिए तैयार है।