मिसाइलों से फाइटर जेट तक... ट्रंप के ईरान युद्ध में 120 दिन में धुआं-धुआं हो गए 3,20,407 करोड़
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में ईरान के खिलाफ छेड़े गए सैन्य अभियान ने अमेरिकी खजाने पर ऐसा बोझ डाला है जिसने वाशिंगटन के रक्षा गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। पेंटागन के मुख्य महानिरीक्षक (Inspector General) की ताजा निगरानी रिपोर्ट के अनुसार, 28 फरवरी से 29 जून के बीच यानी मात्र 120 दिनों (लगभग चार महीने) के युद्ध में अमेरिका के करीब 33.4 अरब डॉलर (भारतीय मुद्रा में लगभग 3,20,407 करोड़ रुपये) पानी की तरह बह गए।
इस अभियान—जिसे अमेरिका और इजरायल ने 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' (Operation Epic Fury) का नाम दिया था—ने अमेरिकी सेना के गोला-बारूद के रणनीतिक भंडार को लगभग खाली कर दिया है। रिपोर्ट में यह साफ कहा गया है कि इतनी बड़ी रकम का दो-तिहाई से अधिक हिस्सा केवल महंगी मिसाइलों, बमों और गोला-बारूद पर खर्च हुआ है, जबकि दर्जनों फाइटर जेट, ड्रोन और सैन्य संपत्तियां युद्ध की भेंट चढ़ गईं।
कहां खर्च हुए 3.20 लाख करोड़ रुपये? हथियारों पर फूंक दी सबसे बड़ी रकम
पेंटागन की विस्तृत रिपोर्ट में 33.4 अरब डॉलर के भारी-भरकम बजट का पूरा ब्योरा पेश किया गया है, जिसने अमेरिकी रक्षा उद्योग की सीमाओं को उजागर कर दिया है:
हथियार और गोला-बारूद ($22.3 अरब): कुल खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा यानी करीब 22.3 अरब डॉलर (लगभग 2.14 लाख करोड़ रुपये) केवल मिसाइलों, प्रिसिजन गाइडेड बमों और गोला-बारूद को दागने में खत्म हो गया।
युद्ध संचालन और लॉजिस्टिक्स ($7.4 अरब): खाड़ी क्षेत्र में सेना की तैनाती, ईंधन आपूर्ति, रणनीतिक जहाजों की आवाजाही और ऑपरेशनल खर्चों पर 7.4 अरब डॉलर खर्च हुए।
सैन्य उपकरणों का नुकसान ($3.7 अरब): ईरानी हमलों और अभियानों के दौरान नष्ट या बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए अमेरिकी सैन्य साजो-सामान का कुल मूल्य लगभग 3.7 अरब डॉलर आंका गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस आंकड़े में खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों, दूतावासों और बुनियादी ढांचे को पहुंचे नुकसान की मरम्मत का खर्च अभी शामिल नहीं है।
युद्ध में अमेरिका ने क्या-क्या खोया? F-35A से लेकर F-15E तक को नुकसान
पेंटागन की महानिरीक्षक रिपोर्ट में अमेरिकी वायुसेना और नौसेना को पहुंचे गंभीर नुकसान की पुष्टि की गई है:
पांचवीं पीढ़ी का F-35A क्षतिग्रस्त: युद्ध के इतिहास में पहली बार अमेरिका का सबसे अत्याधुनिक और स्टील्थ पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान F-35A दुश्मन की सीधी फायरिंग की चपेट में आकर क्षतिग्रस्त हुआ।
F-15E स्ट्राइक ईगल और A-10: जून के अंत तक अमेरिकी वायुसेना ने अपने चार F-15E स्ट्राइक ईगल लड़ाकू विमान और एक प्रसिद्ध A-10 थंडरबोल्ट (वॉर्थॉग) ग्राउंड-अटैक विमान गंवा दिए।
ईंधन भरने वाले टैंकर और हेलीकॉप्टर: हवा में ईंधन भरने वाले 7 KC-135 स्ट्रैटोटैंकर और 7 सैन्य हेलीकॉप्टर या तो नष्ट हो गए या बुरी तरह डैमेज हुए।
30 से अधिक ड्रोन खाक: ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम ने आसमान में अमेरिका के 30 से ज्यादा सर्विलांस और स्ट्राइक ड्रोन (जैसे MQ-9 रीपर) को मार गिराया या निष्क्रिय कर दिया।
विश्लेषकों का मानना है कि इन खोए हुए उन्नत विमानों और उपकरणों की भरपाई करने में अमेरिकी रक्षा उद्योग को कई वर्षों का समय लग जाएगा।
खाड़ी में अमेरिकी ठिकानों और दूतावासों पर भारी तबाही
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के आंकड़ों के मुताबिक, ईरान की ओर से दागी गई बैलिस्टिक मिसाइलों और सुसाइड ड्रोनों ने मध्य पूर्व में फैले अमेरिकी ठिकानों को गहरा आघात पहुंचाया।
इराक, कुवैत, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में स्थित अमेरिकी राजनयिक परिसरों और सैन्य बेसों पर सैकड़ों इमारतों को आंशिक या पूर्ण नुकसान पहुंचा। राजनयिक इमारतों को हुए शुरुआती नुकसान का अनुमान ही लगभग 184 मिलियन डॉलर लगाया गया है। वहीं बड़े रनवे, हैंगर और रडार टावरों के पुनर्निर्माण की लागत इससे कहीं अधिक होगी।
हथियारों के खाली होते भंडार ने खोली अमेरिकी रक्षा उद्योग की पोल
इस रिपोर्ट ने डोनाल्ड ट्रंप के उन दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनमें उन्होंने बार-बार कहा था कि अमेरिका के पास गोला-बारूद का अथाह और लगभग "असीमित" भंडार मौजूद है।
वास्तविकता यह है कि केवल 4 महीने के सीमित अभियान ने पेंटागन की आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain Bottlenecks) की कमजोरियों को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है:
पैट्रियट (Patriot) इंटरसेप्टर मिसाइलें, THAAD और टोमाहॉक (Tomahawk) क्रूज मिसाइलों की भारी कमी हो गई है।
जिस गति से गोला-बारूद खर्च हुआ है, उस गति से लॉकहीड मार्टिन या रेथियॉन जैसी हथियार निर्माता कंपनियां उसका उत्पादन नहीं कर पा रही हैं।
पेंटागन अब उत्पादन का समय घटाने और आपातकालीन बजट के जरिए स्टॉक को दोबारा भरने के लिए संघर्ष कर रहा है।
संसद (कांग्रेस) और सैन्य हलकों में अब यह सवाल उठ रहा है कि अगर मात्र 120 दिन के सीमित टकराव में सवा तीन लाख करोड़ रुपये खाक हो गए और मिसाइलें कम पड़ गईं, तो किसी लंबे और बड़े वैश्विक टकराव की स्थिति में अमेरिका इसे कैसे संभाल पाएगा।