सुप्रीम कोर्ट के 'मेल-इन बैलेट' फैसले पर भड़के डोनाल्ड ट्रंप: अपने ही नियुक्त किए जजों को सुनाई खरी-खोटी
अमेरिकी राजनीति में न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच एक बार फिर खुला टकराव देखने को मिला है। आगामी मिडटर्म चुनावों (November Midterms) से ठीक पहले डाक द्वारा मतदान यानी मेल-इन बैलेट (Mail-in Voting) पर कड़े प्रतिबंध लगाने की अपनी कोशिशों को सुप्रीम कोर्ट से झटका मिलने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बुरी तरह भड़क गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट के 7-2 के इस फैसले के बाद ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर लंबा बयान जारी करते हुए अदालत की कड़ी आलोचना की। सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह रही कि ट्रंप ने उन रूढ़िवादी (Conservative) जजों को भी जमकर आड़े हाथों लिया, जिन्हें खुद उन्होंने अपने पहले कार्यकाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच पर नियुक्त किया था। ट्रंप ने आरोप लगाया कि इन जजों ने अमेरिका को 100 साल पीछे धकेल दिया है।
'ये वो लोग नहीं जिनका मैंने इंटरव्यू लिया था': ट्रंप का अपने ही जजों पर हमला
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट में तीन जजों—नील गोरसच (Neil Gorsuch), ब्रेट कैवानॉ (Brett Kavanaugh) और एमी कोनी बैरेट (Amy Coney Barrett) को नियुक्त कर शीर्ष अदालत में 6-3 का मजबूत रूढ़िवादी बहुमत तैयार किया था।
हालांकि, इस मामले में चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स के साथ-साथ ट्रंप द्वारा नियुक्त इन तीनों जजों ने भी सरकार की आपातकालीन याचिका के खिलाफ रुख अपनाते हुए पाबंदियों को लागू करने से इनकार कर दिया। इस पर आपा खोते हुए ट्रंप ने लिखा:
"यह सुप्रीम कोर्ट रेडिकल लेफ्ट (कट्टर वामपंथियों) के दबाव और डर में ऐसे फैसले दे रहा है जिसने अमेरिका को कम से कम 100 साल पीछे धकेल दिया है। ये वो लोग बिल्कुल नहीं हैं जिनका मैंने यूनाइटेड स्टेट्स सुप्रीम कोर्ट में सेवा देने के लिए इंटरव्यू लिया था। वे अपने मूल स्वरूप की महज एक परछाई (shell of their original selves) बनकर रह गए हैं। अदालत के इस तरह के खराब और पक्षपाती फैसलों से देश को खरबों डॉलर का नुकसान हो रहा है।""
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों खारिज की ट्रंप प्रशासन की याचिका?
ट्रंप प्रशासन ने एक कार्यकारी आदेश (Executive Order) के जरिए अमेरिकी डाक सेवा (USPS) को मेल-इन बैलेट के वितरण और नए लिफाफा डिजाइन पर कड़े नियम लागू करने का अधिकार देने की कोशिश की थी। प्रशासन का दावा था कि डाक मतदान में बड़े पैमाने पर धांधली होती है और इसे रोकना जरूरी है।
बोस्टन फेडरल कोर्ट का फैसला: संघीय जज इंदिरा तलवानी ने चुनाव से ठीक पहले इन नियमों को लागू करने पर रोक (Injunction) लगा दी थी।
सुप्रीम कोर्ट की दलील: सुप्रीम कोर्ट ने इस रोक को हटाने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि 3 नवंबर के चुनावों के लिए कई राज्यों में डाक से मतपत्र पहले ही भेजे जा चुके हैं। राज्य और स्थानीय चुनाव अधिकारियों के पास अब इतने कम समय में नई व्यवस्था लागू करने का समय नहीं है।
जस्टिस ब्रेट कैवानॉ ने तर्क दिया कि मतदान से ठीक पहले इस तरह नियम बदलना प्रशासनिक प्रक्रिया अधिनियम (APA) के तहत अनुचित और मनमाना होगा।
अलीटो और थॉमस की तारीफ, बाकी जजों पर निकाली पुरानी भड़ास
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट के दो सबसे पुराने रूढ़िवादी जज—जस्टिस सैमुअल अलीटो और जस्टिस क्लेरेंस थॉमस ने बहुमत से असहमति (Dissent) जताई और ट्रंप प्रशासन के रुख का समर्थन किया। ट्रंप ने इन दोनों जजों की तारीफों के पुल बांधते हुए उन्हें 'लीजेंड्स' (Legends Both) करार दिया।
इसके साथ ही ट्रंप ने सुप्रीम कोर्ट के उन पुराने फैसलों पर भी अपनी भड़ास निकाली, जहां अदालत ने उनकी नीतियों का साथ नहीं दिया था:
टैरिफ पर रोक: ट्रंप द्वारा अपने दम पर अन्य देशों पर लगाए गए 'लिबरेशन डे' टैरिफ को अदालत द्वारा खारिज किए जाने पर उन्होंने कहा कि कोर्ट के इस फैसले ने देश को अरबों डॉलर की चपत लगाई है।
बर्थराइट सिटीजनशिप: अमेरिका में पैदा होने वाले बच्चों को स्वतः नागरिकता मिलने के अधिकार (Birthright Citizenship) को खत्म करने के उनके प्रयास को भी अदालत ने ब्लॉक कर दिया था, जिसे ट्रंप ने दोबारा 'पूरी तरह से आपदा' बताया।
अटॉर्नी जनरल ने किया ट्रंप का बचाव, चुनाव से पहले गरमाई सियासत
ट्रंप के इस तीखे सोशल मीडिया पोस्ट के बाद व्हाइट हाउस में अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लैंच (Todd Blanche) ने मीडिया से बातचीत में राष्ट्रपति का बचाव किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति को अपने विचार और निराशा व्यक्त करने का पूरा संवैधानिक अधिकार है और वे अपनी चिंताएं सामने रख रहे हैं।
दूसरी तरफ, डेमोक्रेटिक पार्टी और कानूनी विश्लेषकों ने ट्रंप द्वारा स्वतंत्र न्यायपालिका पर इस तरह के व्यक्तिगत हमलों को संस्थागत मर्यादाओं पर सीधा प्रहार बताया है। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद अब यह तय हो चुका है कि आगामी अमेरिकी चुनावों में मेल-इन बैलेट की पुरानी प्रक्रिया यथावत जारी रहेगी, जिससे देश भर के करोड़ों डाक मतदाता बिना किसी नई बाधा के अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकेंगे।