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September 17 2026 10:40 pm

चाहे जो कर ले अमेरिका, रूस से तेल खरीदता रहेगा भारत: 100% टैरिफ वाले US बिल पर दो-टूक जवाब

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रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच मॉस्को से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत और अमेरिका के बीच कूटनीतिक तनातनी एक बार फिर चरम पर पहुंच गई है। अमेरिकी संसद (कांग्रेस) द्वारा रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक दंडात्मक टैरिफ लगाने वाले कानून को तेजी से आगे बढ़ाए जाने के बाद भारत ने वाशिंगटन को दो-टूक और सख्त संदेश दे दिया है।

भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिकी धमकियों या संभावित आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद वह रूस से कच्चे तेल की खरीद बंद नहीं करेगा। नई दिल्ली का कहना है कि भारत अपनी संप्रभु विदेश नीति और ऊर्जा जरूरतों के हिसाब से ही फैसले लेगा, न कि किसी पश्चिमी देश के दबाव में।

अमेरिकी संसद में क्या है 100 फीसदी टैरिफ वाला बिल?

अमेरिकी संसद में पेश इस विवादित विधेयक का नाम 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट' (Lindsey Graham Sanctioning Russia & Iran Act) है:

सीनेट से हो चुका है पास: अमेरिकी सीनेट 86-11 के भारी बहुमत से इस बिल को पहले ही मंजूरी दे चुकी है।

हाउस में वोटिंग की तैयारी: अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) में इस बिल ने प्रक्रियात्मक बाधा पार कर ली है और इस पर अंतिम मतदान होना है।

राष्ट्रपति को असीमित अधिकार: इस कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को यह कानूनी अधिकार मिल जाएगा कि वे रूस से तेल और गैस आयात करने वाले शीर्ष देशों से अमेरिका आने वाले सामान पर 100% तक अतिरिक्त सीमा शुल्क (Secondary Tariffs) थोप सकें।

सीधे भारत का नाम जोड़ने की कोशिश: पहले बिल में सिर्फ शीर्ष खरीदार देशों का जिक्र था, लेकिन प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटिक सांसदों द्वारा पेश संशोधन में भारत, चीन, तुर्किये, यूएई और सिंगापुर समेत 10 देशों के नाम स्पष्ट रूप से जोड़ने का प्रस्ताव रखा गया है।

'140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सर्वोपरि': विदेश मंत्रालय का पलटवार

अमेरिकी संसद में चल रही इस कवायद पर भारत सरकार के आधिकारिक सूत्रों और विदेश मंत्रालय (MEA) ने कड़ा एतराज जताते हुए अपनी स्थिति साफ कर दी है:

"भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों से जुड़े सभी फैसले अपने 140 करोड़ नागरिकों की राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देकर करता है। भारत एक विशाल ऊर्जा आयातक देश है और अंतरराष्ट्रीय बाजार से जहां भी किफायती और सुरक्षित शर्तों पर तेल मिलेगा, देश अपने नागरिकों के लिए उसकी खरीद जारी रखेगा। बाहरी प्रतिबंधों के आधार पर भारत अपनी स्वतंत्र नीति में कोई बदलाव नहीं करेगा।""

विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर पहले भी स्पष्ट कर चुके हैं कि अगर भारत ने वैश्विक स्तर पर रूसी तेल खरीदना बंद कर दिया, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 150 से 200 डॉलर प्रति बैरल तक उछल जाएंगी, जिससे पूरी दुनिया में महंगाई का महासंकट आ जाएगा। ऐसे में भारतीय खरीद वैश्विक तेल बाजार को स्थिर बनाए रखने में भी मदद कर रही है।

पहले भी 50% टैरिफ का दबाव बना चुका है अमेरिका

यह पहला मौका नहीं है जब वाशिंगटन ने रूसी तेल को हथियार बनाकर भारत पर व्यापारिक दबाव डालने की कोशिश की है:

अमेरिकी प्रशासन ने पूर्व में भी भारतीय आयातों पर टैरिफ दरों में बढ़ोतरी की थी।

अमेरिका का आरोप है कि भारत और चीन द्वारा रूसी कच्चा तेल खरीदने से मॉस्को को विदेशी मुद्रा मिल रही है, जिससे यूक्रेन युद्ध को फंडिंग मिल रही है।

भारत ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा था कि पश्चिमी देशों का यह रवैया दोहरा चरित्र (Double Standards) दर्शाता है, क्योंकि यूरोपीय देश खुद कई तरह के रूसी उत्पादों और रिफाइंड फ्यूल का उपभोग करते रहे हैं।

भारत के रुख से अमेरिका के सामने क्या हैं विकल्प?

अंतरराष्ट्रीय व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका भारत पर 100% टैरिफ लगाने का दुस्साहस करता है, तो यह दोनों देशों के द्विपक्षीय व्यापार और रणनीतिक साझेदारी (Quad आदि) के लिए आत्मघाती साबित होगा:

अमेरिका में भारतीय आईटी सेवाएं, फार्मास्युटिकल (जेनेरिक दवाएं) और कपड़ा निर्यात अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। 100% टैरिफ से अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए भी महंगाई बेतहाशा बढ़ेगी।

भारत ने रणनीतिक तेल भंडार और विभिन्न मुद्राओं (रुपया-रूबल-दिरहम) में व्यापारिक तंत्र को पहले ही मजबूत कर रखा है।

भारत के इस कड़े और अडिग रुख ने एक बार फिर दुनिया को दिखा दिया है कि वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में नई दिल्ली किसी भी महाशक्ति के दबाव में अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं से पीछे हटने वाली नहीं है।