गोरखपुर एम्स में 'इमरजेंसी' जैसे हालात: स्ट्रेचर पर तड़पते रहे ब्रेन हेमरेज और फ्रैक्चर के मरीज, अव्यवस्था देख भड़के तीमारदार...
India News Live,Digital Desk : पूर्वोत्तर उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान एम्स (AIIMS) गोरखपुर की इमरजेंसी सेवा इन दिनों खुद 'इमरजेंसी' में नजर आ रही है। दूर-दराज के जिलों से बड़ी उम्मीद लेकर आने वाले गंभीर मरीजों को यहां इलाज के बजाय भारी अव्यवस्था और दुश्वारियों का सामना करना पड़ रहा है। हालात इतने खराब हैं कि ब्रेन हेमरेज और मल्टीपल फ्रैक्चर जैसे अति-संवेदनशील मामलों वाले मरीजों को भी घंटों तक स्ट्रेचर पर इंतजार करना पड़ रहा है। एम्स के भीतर फैली इस अव्यवस्था ने न केवल अस्पताल प्रशासन के दावों की पोल खोल दी है, बल्कि मरीजों की जान को भी जोखिम में डाल दिया है।
ब्रेन हेमरेज और फ्रैक्चर के मरीजों को नहीं मिला बेड
अस्पताल की इमरजेंसी में पहुंचे कई मरीजों के तीमारदारों ने आरोप लगाया कि गंभीर स्थिति के बावजूद डॉक्टरों और स्टाफ का रवैया संवेदनहीन बना हुआ है। देवरिया, कुशीनगर और बस्ती जैसे जिलों से आए मरीजों, जिन्हें तत्काल सर्जरी या गहन चिकित्सा की आवश्यकता थी, उन्हें घंटों तक वार्ड में शिफ्ट नहीं किया गया। ब्रेन हेमरेज जैसे मामलों में जहां एक-एक सेकंड की कीमत होती है, वहां भी कागजी कार्रवाई और बेड की कमी का हवाला देकर मरीजों को टरकाया जा रहा है। हड्डी टूटने (फ्रैक्चर) के दर्द से कराह रहे लोग फर्श और स्ट्रेचर पर लेटकर अपनी बारी का इंतजार करने को मजबूर हैं।
सुविधाओं के अभाव में दम तोड़ती उम्मीदें
करोड़ों की लागत से बने गोरखपुर एम्स से लोगों को उम्मीद थी कि उन्हें पीजीआई स्तर की सुविधाएं मिलेंगी, लेकिन वर्तमान स्थिति इसके उलट है। इमरजेंसी वार्ड में मरीजों की बढ़ती संख्या के मुकाबले डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की तैनाती काफी कम नजर आ रही है। संसाधनों की कमी और प्रबंधन की लापरवाही के कारण यहां अक्सर मरीजों और तीमारदारों की स्वास्थ्य कर्मियों के साथ तीखी झड़पें भी हो रही हैं। लोगों का कहना है कि अगर एम्स में भी उन्हें समय पर इलाज नहीं मिला, तो फिर वे कहां जाएंगे?
अस्पताल प्रबंधन के दावों पर सवालिया निशान
गोरखपुर एम्स की इस बदहाली ने क्षेत्रीय स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रशासन का दावा है कि वे हर संभव मदद कर रहे हैं, लेकिन हकीकत में इमरजेंसी गेट पर लगी एम्बुलेंस की कतारें और स्ट्रेचर पर तड़पते मरीज कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते बेड प्रबंधन और स्टाफ की संख्या में सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले समय में स्थितियां और भी भयावह हो सकती हैं। फिलहाल, गंभीर मरीजों को निजी अस्पतालों की ओर रुख करना पड़ रहा है, जिससे उन पर आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा है।