तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा उलटफेर: DMK-कांग्रेस गठबंधन में दरार, क्या भाजपा को मिलेगा नया साथी?
India News Live,Digital Desk : तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में सुपरस्टार विजय की पार्टी 'तमिझगा वेत्री कड़गम' (TVK) की ऐतिहासिक जीत ने न केवल राज्य की राजनीति की दिशा बदली है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी समीकरणों को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। कांग्रेस द्वारा चुनाव में द्रमुक (DMK) का साथ छोड़कर TVK के साथ जाने से पैदा हुई कड़वाहट ने द्रमुक को अलग-थलग कर दिया है, और इस राजनीतिक निर्वात का लाभ भाजपा (BJP) उठाने की कोशिश में है।
द्रमुक-कांग्रेस गठबंधन में तल्खी
द्रमुक और कांग्रेस के बीच गठबंधन टूटने के बाद स्थितियाँ काफी तनावपूर्ण हो गई हैं। द्रमुक ने कांग्रेस पर 'पीठ में छुरा घोंपने' का आरोप लगाया है। यह नाराजगी इतनी बढ़ गई है कि द्रमुक ने लोकसभा अध्यक्ष से संसद में अपने सांसदों की बैठने की व्यवस्था बदलने की मांग की है, ताकि उन्हें कांग्रेस से दूर बैठाया जा सके।
भाजपा का 'ओडिशा मॉडल' और संसद का अंकगणित
भाजपा के रणनीतिकारों को लगता है कि इस स्थिति का लाभ उठाकर द्रमुक का 'मुद्दों के आधार पर समर्थन' हासिल किया जा सकता है। भाजपा इसे 'ओडिशा मॉडल' की तरह देख रही है, जहाँ बीजेडी (BJD) या वाईएसआरसीपी (YSRCP) जैसे दल एनडीए का औपचारिक हिस्सा न होते हुए भी केंद्र सरकार को अहम विधेयकों पर समर्थन देते रहे हैं।
दो-तिहाई बहुमत की राह: भाजपा को संसद के उच्च सदन और विशेष विधेयकों के लिए दो-तिहाई बहुमत (362 सीटें) की दरकार है, जहाँ एनडीए फिलहाल लगभग 54-70 सीटों से पीछे है।
द्रमुक की अहम भूमिका: यदि द्रमुक के 22 सांसद भविष्य के मतदान में तटस्थ रहते हैं या वॉकआउट करते हैं, तो एनडीए के लिए जादुई आंकड़े तक पहुँचना काफी आसान हो जाएगा।
अन्नाद्रमुक की कमजोरी: राज्य में अन्नाद्रमुक (AIADMK) की हार और उसके भीतर जारी बगावत ने भाजपा के लिए द्रमुक से संपर्क साधने की राह और आसान कर दी है, क्योंकि अन्नाद्रमुक अब केंद्र की मदद के बिना अपनी राजनीतिक साख बचाने में असमर्थ दिख रही है।
विचारधारा और नीतिगत चुनौतियां
हालांकि, द्रमुक का भाजपा की तरफ रुख करना इतना आसान नहीं है। एम.के. स्टालिन के सामने दो बड़ी बाधाएं हैं:
परिसीमन का मुद्दा: द्रमुक परिसीमन प्लान की घोर विरोधी रही है और इसे दक्षिण भारत के प्रतिनिधित्व को कम करने की भाजपा की साजिश मानती है। इस मुद्दे पर लिए गए कड़े स्टैंड से पीछे हटना स्टालिन के लिए बड़ी राजनीतिक मुसीबत खड़ी कर सकता है।
सनातन धर्म विवाद: उदयनिधि स्टालिन की टिप्पणियों के बाद दोनों दलों के बीच गहरी वैचारिक खाई है। इस संवेदनशील मुद्दे पर कोई भी समझौता करना दोनों दलों के लिए पेचीदा होगा।
भविष्य की रणनीति: राष्ट्रपति चुनाव पर नजर
अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव को देखते हुए भाजपा कोई भी जोखिम नहीं लेना चाहती। संसद में एनडीए की संख्या बल को दुरुस्त करने के लिए भाजपा की कोशिश द्रमुक के मतों को अपने पक्ष में करने की है। इतिहास गवाह है कि द्रमुक और भाजपा ने पहले भी साथ काम किया है (अटल बिहारी वाजपेयी के समय), लेकिन मौजूदा राजनीतिक ध्रुवीकरण के दौर में यह 'नया रिश्ता' बन पाना अभी भी एक बड़ी राजनीतिक पहेली बना हुआ है।