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October 08 2026 06:03 pm

नाना पाटेकर के निधन की खबरों के बीच याद आया संघर्ष: कभी जेब्रा क्रॉसिंग पेंट कर कमाए 35 रुपये

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दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर के निधन के बाद उनके असाधारण जीवन और कड़े संघर्ष की कहानियां एक बार फिर लोगों की जुबान पर हैं। आज भले ही दुनिया उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली और बेबाक अभिनेताओं में गिनती हो, लेकिन शोहरत के इस मुकाम तक पहुंचने का रास्ता कांटों से भरा था। नाना पाटेकर ने अपने जीवन में इतनी तंगहाली देखी थी कि एक वक्त उन्हें पेट भरने के लिए मुंबई की सड़कों पर जेब्रा क्रॉसिंग और फिल्मों के पोस्टर पेंट करने का काम करना पड़ा था।

मुंबई के प्रतिष्ठित 'सर जेजे इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट' में पढ़ाई के दौरान नाना पाटेकर के परिवार पर भारी आर्थिक संकट आ गया था। एक रिश्तेदार द्वारा पिता के साथ किए गए धोखे के कारण उनका पूरा कारोबार ठप हो गया था। उस मुश्किल दौर में नाना ने महज 13 साल की उम्र से ही छोटे-मोटे काम करना शुरू कर दिया था। वे सड़क किनारे बैठकर फिल्मों के बड़े-बड़े बैनर पेंट करते थे और रात के वक्त मुंबई म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन के लिए सड़कों पर जेब्रा क्रॉसिंग की पट्टियां रंगा करते थे। इसके बदले उन्हें महीने के महज 35 रुपये और एक वक्त का खाना नसीब होता था। मीलों पैदल चलकर कॉलेज जाना और खाली पेट रातें गुजारना उनके संघर्ष के शुरुआती दिनों का हिस्सा था।

महज 750 रुपये में रचाई थी शादी, पत्नी नीलकांति ने दिया था हर कदम पर साथ

नाना पाटेकर की निजी जिंदगी भी उनकी तरह ही बेहद सादगी और उसूलों से भरी रही। जब वे थिएटर में अपनी पहचान बनाने के लिए जूझ रहे थे, तब उनकी मुलाकात नीलकांति से हुई। नीलकांति खुद भी रंगमंच से जुड़ी थीं और एक बैंक में कार्यरत थीं। दोनों के बीच धीरे-धीरे प्रेम प्रगाढ़ हुआ और उन्होंने शादी करने का फैसला किया। उस समय नाना पाटेकर के पास कोई जमा-पूंजी नहीं थी।

नाना पाटेकर ने खुद एक इंटरव्यू में खुलासा किया था कि साल 1978 में जब उन्होंने नीलकांति से शादी की, तो दोनों परिवारों की सहमति से पूरा विवाह समारोह महज 750 रुपये के कुल खर्च में संपन्न हुआ था। न कोई भव्य मंडप था, न ही कोई दिखावा; दोनों ने कोर्ट मैरिज और बेहद साधारण रीति-रिवाजों के साथ एक-दूसरे का हाथ थामा था। नाना ने गर्व से स्वीकार किया था कि शुरुआती दिनों में जब उनके पास काम नहीं होता था, तब घर का पूरा खर्च उनकी पत्नी नीलकांति की बैंक की नौकरी से ही चलता था।

सादगी भरी शुरुआत से लेकर सिनेमा के शिखर तक का सफर

नाना पाटेकर का जीवन इस बात की मिसाल रहा है कि अभाव और गरीबी इंसान के हौसले को नहीं तोड़ सकते। जेब्रा क्रॉसिंग पर ब्रश चलाने वाले उस लड़के ने जब 1978 में फिल्म 'गमन' से बड़े पर्दे पर कदम रखा, तो किसी ने नहीं सोचा था कि वह 'परिंदा', 'प्रहार', 'क्रांतिवीर' और 'तिरंगा' जैसी कालजयी फिल्मों से भारतीय सिनेमा की दिशा बदल देगा।

तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और पद्मश्री से सम्मानित होने के बावजूद उन्होंने कभी अपने अतीत को नहीं भुलाया। यही कारण था कि अरबों की संपत्ति और अपार शोहरत कमाने के बाद भी वे हमेशा किसानों के दुख-दर्द से जुड़े रहे और सादगी से जीवन जिया। उनके जाने के बाद उनका यही बेबाक संघर्ष और जमीन से जुड़ा स्वभाव हर किसी के दिल में हमेशा जिंदा रहेगा।