'मैंने 8 युद्ध रोके, किसी ने नहीं किया ऐसा काम'; बिना भारत का नाम लिए ट्रंप ने मांगा नोबेल
नोबेल शांति पुरस्कारों की औपचारिक घोषणा से ठीक पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपनी दावेदारी पेश करते हुए नार्वेजियन नोबेल कमेटी पर सीधा निशाना साधा है। वाशिंगटन डीसी स्थित व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस से पत्रकारों और अधिकारियों को संबोधित करते हुए ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने वैश्विक स्तर पर आठ ऐसे भीषण युद्धों और संघर्षों को रुकवाया है, जिन्हें रोकने की हिम्मत किसी अन्य वैश्विक नेता में नहीं थी। हालांकि, अतीत में भारत और पाकिस्तान के बीच संभावित परमाणु टकराव को टालने का बार-बार दावा करने वाले ट्रंप ने इस बार सीधे तौर पर भारत का नाम लेने से परहेज किया, लेकिन अपने व्यापक दावों के जरिए शांति के सर्वोच्च वैश्विक सम्मान पर अपनी जोरदार दावेदारी ठोक दी।
ट्रंप ने अपने चिरपरिचित आक्रामक अंदाज में कहा कि वे किसी तरह की डींग नहीं हांक रहे, बल्कि जमीनी हकीकत दुनिया के सामने रख रहे हैं। उनके मुताबिक, आधुनिक इतिहास में शायद ही किसी राष्ट्रपति ने अपने कार्यकाल में इतने बड़े स्तर पर वैश्विक रक्तपात को रोकने का साहसिक काम किया हो। ट्रंप ने तर्क दिया कि यदि निष्पक्ष रूप से देखा जाए, तो रोके गए हर एक युद्ध के लिए उन्हें अलग से नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए, लेकिन वैश्विक व्यवस्था और चयन समितियां उनके अभूतपूर्व योगदान को जानबूझकर नजरअंदाज करती आ रही हैं।
नोबेल कमेटी पर साधा निशाना: 'मुझे अवॉर्ड न देना उनके लिए बड़ी बदनामी'
डोनाल्ड ट्रंप ने केवल अपनी उपलब्धियां ही नहीं गिनाईं, बल्कि ओस्लो स्थित नोबेल पुरस्कार समिति की निष्पक्षता और साख पर भी कड़े सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि नोबेल कमेटी की ऐसी पक्षपाती छवि बन चुकी है कि वे उनके जैसे परिणाम देने वाले और स्वतंत्र सोच वाले नेताओं को सम्मानित करने से बचते हैं। ट्रंप ने चेतावनी भरे लहजे में कहा, "मुझे यह सम्मान मिले या न मिले, मैंने इससे कहीं ज्यादा काम करके दिखाया है। अगर वे मुझे यह पुरस्कार नहीं देते हैं, तो यह उनके अपने संस्थान के लिए बहुत बड़ी बदनामी की बात होगी।"
ट्रंप ने स्पष्ट किया कि वे यह बात किसी व्यक्तिगत नफरत या बदले की भावना से नहीं कह रहे, बल्कि उस वैश्विक संस्था की विश्वसनीयता को लेकर कह रहे हैं जो असली शांतिदूतों की अनदेखी करती आई है। उन्होंने दावा किया कि आज दुनिया के कई संकटग्रस्त क्षेत्रों में जो लाखों जिंदगियां सुरक्षित हैं, वह केवल उनकी कूटनीतिक दखलंदाजी और सख्त फैसलों का नतीजा है।
पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा पर तंज, बिना कुछ किए अवॉर्ड मिलने का लगाया आरोप
नोबेल कमेटी पर हमला बोलते हुए ट्रंप ने अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपति बराक ओबामा को मिले नोबेल शांति पुरस्कार (2009) का उदाहरण देकर जमकर तंज कसा। ट्रंप ने आरोप लगाया कि ओबामा को राष्ट्रपति चुने जाने के शुरुआती दिनों में ही यह सम्मान थमा दिया गया था, जबकि उस समय तक उन्होंने वैश्विक शांति के लिए रत्ती भर भी काम नहीं किया था।
ट्रंप ने कहा, "ओबामा को यह पुरस्कार मिला और उन्होंने इसके लिए कुछ भी नहीं किया था। सच तो यह है कि उन्हें आज तक खुद नहीं पता कि उन्हें यह पुरस्कार किस बात के लिए दिया गया था।" ट्रंप का तर्क था कि जिस समिति ने बिना किसी जमीनी उपलब्धि के ओबामा को सम्मानित कर दिया, वही समिति आज वास्तविक युद्धों को समाप्त कराने वाले नेता की उपलब्धियों से आंखें मूंदे बैठी है।
मचाडो के मेडल का किया जिक्र, युद्धों के बीच घिरी ट्रंप की शांति नीति
अपने दावे को पुख्ता करने के लिए ट्रंप ने वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरीना मचाडो का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पिछली बार जब यह पुरस्कार एक शानदार महिला को दिया गया, तो उन्होंने खुद आकर कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप से ज्यादा इसका कोई हकदार नहीं है और अपना मेडल उन्हें सौंप दिया। ट्रंप ने इसे अपने काम की सबसे बड़ी नैतिक स्वीकृति बताया।
हालांकि, कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि ट्रंप का यह 'नोबेल राग' ऐसे समय में आया है जब वैश्विक परिस्थितियां बेहद जटिल हैं। अमेरिका और ईरान के बीच लंबे टकराव के बाद भी तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, जिससे ऊर्जा बाजार और वैश्विक स्थिरता पर दबाव बना हुआ है। वहीं दूसरी ओर, रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध को खत्म कराने के ट्रंप के तमाम वादे और व्लादिमीर पुतिन व वोलोडिमिर जेलेंस्की के साथ बैठकों के बावजूद युद्धविराम का कोई ठोस रास्ता नहीं निकल सका है। ऐसे में नोबेल शांति पुरस्कार पर ट्रंप के इस आक्रामक दावे ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में विवाद और बहस को जन्म दे दिया है।