बच्चों को मोटापा कम करने वाली दवाएं देने से पहले सावधान! WHO ने चेताया, बताए कई गंभीर खतरे
दुनिया भर में बच्चों और किशोरों में बढ़ते मोटापे (Childhood Obesity) के बीच वजन घटाने वाली आधुनिक दवाओं का अंधाधुंध इस्तेमाल एक नई और गंभीर चिंता बनकर उभरा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इस खतरनाक प्रवृत्ति पर वैश्विक स्वास्थ्य चेतावनी जारी करते हुए माता-पिता, डॉक्टरों और नीति-निर्माताओं को सतर्क किया है। वैश्विक स्वास्थ्य संस्था ने स्पष्ट किया है कि केवल त्वरित परिणामों के लालच में बच्चों को बिना गहन चिकित्सकीय निगरानी के एंटी-ओबेसिटी या वेट-लॉस दवाएं देना उनके दीर्घकालिक स्वास्थ्य के साथ बड़ा खिलवाड़ हो सकता है।
हाल के वर्षों में वयस्कों के बीच तेजी से लोकप्रिय हुए जीएलपी-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट (GLP-1 receptor agonists) और अन्य भूख दबाने वाले औषधीय फॉर्मूलों का दायरा अब धीरे-धीरे किशोरों और कम उम्र के बच्चों तक बढ़ाया जाने लगा है। कई अभिभावक बिना किसी जीवनशैली सुधार के सीधे दवाओं के जरिए बच्चों का वजन नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे हैं। डब्ल्यूएचओ ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में रेखांकित किया है कि विकासशील उम्र में रासायनिक रूप से मेटाबॉलिज्म या भूख को दबाना बच्चों के प्राकृतिक विकास चक्र को हमेशा के लिए बाधित कर सकता है।
बढ़ते शरीर पर दवाओं के साइड इफेक्ट्स: हड्डियों, मांसपेशियों और अंगों पर सीधा असर
डब्ल्यूएचओ के स्वास्थ्य विशेषज्ञों और बाल रोग विशेषज्ञों (Pediatricians) का कहना है कि बच्चों का शरीर वयस्कों से पूरी तरह भिन्न होता है। उनके अंग, हार्मोनल संतुलन और हड्डियों का घनत्व (Bone Density) निरंतर विकास के दौर में होते हैं। वजन घटाने वाली दवाएं शरीर में आवश्यक पोषक तत्वों के अवशोषण को प्रभावित कर सकती हैं, जिससे बच्चों में कैल्शियम, विटामिन डी और प्रोटीन की गंभीर कमी होने का खतरा बढ़ जाता है। इसका सीधा असर उनकी लंबाई और हड्डियों की मजबूती पर पड़ता है।
इसके अलावा, इन दवाओं के सामान्य दुष्प्रभावों में जी मिचलाना, उल्टी, गंभीर दस्त, पेट दर्द और डिहाइड्रेशन शामिल हैं। लंबे समय तक दवाओं पर निर्भरता रहने से पैंक्रियाज (अग्नाशय), लिवर और किडनी पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जिससे कम उम्र में ही अंगों से जुड़ी बीमारियों का जोखिम पैदा हो सकता है। कई मामलों में दवाओं का सेवन बंद करते ही वजन तेजी से दोबारा बढ़ जाता है (Rebound Effect), जिससे बच्चों का चयापचय (Metabolism) हमेशा के लिए असंतुलित हो जाता है।
मानसिक स्वास्थ्य और ईटिंग डिसऑर्डर का गहराता खतरा
शारीरिक नुकसान के साथ-साथ यह दवाएं बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा नकारात्मक प्रभाव डालती हैं। बचपन और किशोरावस्था का समय आत्म-छवि (Self-Image) और आत्मविश्वास के निर्माण का होता है। जब किसी बच्चे को वजन कम करने के लिए गोलियों या इंजेक्शनों पर निर्भर कर दिया जाता है, तो उसके भीतर यह भावना घर कर जाती है कि उसका स्वाभाविक शरीर स्वीकार्य नहीं है। इससे बच्चों में चिंता, डिप्रेशन और गंभीर ईटिंग डिसऑर्डर (जैसे एनोरेक्सिया या बुलिमिया) की शुरुआत हो सकती है।
डब्ल्यूएचओ की गाइडलाइन के अनुसार, जब तक किसी बच्चे का मोटापा जानलेवा स्थिति (Morbid Obesity) या गंभीर मेटाबॉलिक जटिलताओं (जैसे टाइप-2 डायबिटीज, स्लीप एपनिया) तक न पहुंच चुका हो, तब तक दवाएं अंतिम विकल्प भी नहीं होनी चाहिए। दवाओं का इस्तेमाल केवल विशेष बाल रोग विशेषज्ञों की सख्त देखरेख और क्लिनिकल प्रोटोकॉल के तहत ही सीमित अवधि के लिए किया जाना चाहिए।
दवाओं के बजाय 'लाइफस्टाइल इंटरवेंशन' को बनाएं पहला हथियार
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बच्चों में मोटापे की रोकथाम और प्रबंधन के लिए दवाओं के बजाय प्राकृतिक और धारणीय उपायों को प्राथमिक रणनीति बनाने पर जोर दिया है:
पारिवारिक खान-पान में बदलाव: बच्चों के आहार से अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड, पैकेज्ड स्नैक्स, अत्यधिक मीठे ड्रिंक्स और जंक फूड को पूरी तरह सीमित करें। उनके भोजन में मौसमी फल, सब्जियां, दालें और साबुत अनाज की मात्रा बढ़ाएं।
रोजाना शारीरिक सक्रियता: बच्चों को प्रतिदिन कम से कम 60 मिनट की मध्यम से तेज शारीरिक गतिविधि (जैसे आउटडोर खेल, तैराकी, साइकिल चलाना या दौड़ना) के लिए प्रेरित करें।
स्क्रीन टाइम पर सख्त नियंत्रण: मोबाइल फोन, टैबलेट और टीवी पर बिताए जाने वाले समय को सीमित करें, क्योंकि स्क्रीन के सामने बैठकर खाने से ओवरईटिंग की आदत बढ़ती है।
पर्याप्त और नियमित नींद: नींद की कमी हार्मोनल असंतुलन पैदा करती है, जिससे भूख बढ़ाने वाले हार्मोन्स सक्रिय हो जाते हैं। बच्चों के लिए 8 से 10 घंटे की गहरी नींद अनिवार्य है।
डब्ल्यूएचओ ने अंत में यह संदेश दिया है कि बचपन का मोटापा कोई एक दिन में होने वाली समस्या नहीं है, इसलिए इसका समाधान किसी 'मैजिक पिल' या झटपट असर करने वाली दवा में नहीं तलाशा जा सकता। बच्चों को आजीवन स्वस्थ रखने का एकमात्र सुरक्षित रास्ता एक सक्रिय जीवनशैली और पोषक खान-पान का अनुशासन ही है।