आखिर क्यों हनुमान जी के इस विग्रह पर हैं दाढ़ी-मूंछें? जानें राजस्थान के इस चमत्कारी धाम की अनसुनी कहानी
India News Live,Digital Desk : राजस्थान की वीर धरा पर स्थित सालासर बालाजी धाम न केवल एक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह अपनी अनोखी धार्मिक विशेषता के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। भारत में लाखों हनुमान मंदिर हैं, लेकिन सालासर एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ पवनपुत्र हनुमान दाढ़ी और मूंछों वाले स्वरूप में विराजमान हैं। 6 अप्रैल 2026 के इस पावन अवसर पर, आइए जानते हैं कि आखिर क्यों बजरंगबली ने यहाँ यह विशेष रूप धारण किया और इसके पीछे की पौराणिक कथा क्या है।
खेत में प्रकट हुई थी 'स्वयंभू' प्रतिमा
सालासर बालाजी की कहानी साल 1811 (संवत 1811) की है। राजस्थान के आसोटा गांव में एक जाट किसान अपने खेत में हल जोत रहा था। अचानक उसका हल किसी कठोर वस्तु से टकराया। खुदाई करने पर वहां से मिट्टी में सनी एक पत्थर की मूर्ति निकली। जब किसान की पत्नी वहां भोजन (चूरमा) लेकर पहुंची, तो उन्होंने सबसे पहले उस मूर्ति को साफ किया और श्रद्धापूर्वक चूरमे का भोग लगाया। आज भी सालासर में चूरमे का भोग सबसे प्रमुख माना जाता है।
भक्त मोहनदास का सपना और दाढ़ी-मूंछ का रहस्य
हनुमान जी के परम भक्त बाबा मोहनदास को सपने में बालाजी ने इसी दाढ़ी-मूंछ वाले स्वरूप में दर्शन दिए थे। मान्यता है कि जब मूर्ति प्रकट हुई, तो मोहनदास जी को आभास हुआ कि यह वही रूप है जो उन्होंने अपने ध्यान और स्वप्न में देखा था।
प्रौढ़ स्वरूप: दाढ़ी-मूंछ वाला यह विग्रह हनुमान जी के 'प्रौढ़' और गंभीर स्वरूप को दर्शाता है, जिसे 'संकट मोचन' का साक्षात रूप माना जाता है।
स्थापना की शर्त: सपने में मिले निर्देशानुसार, मूर्ति को बैलगाड़ी में रखा गया और कहा गया कि जहाँ बैल रुक जाएंगे, वहीं मंदिर बनेगा। बैल सालासर में आकर रुक गए, जहाँ आज यह भव्य दरबार सजा है।
सालासर धाम की 3 सबसे अनोखी विशेषताएं
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| अनोखा श्रृंगार | भारत का इकलौता मंदिर जहाँ हनुमान जी के मुख पर दाढ़ी और मूंछें सुशोभित हैं। |
| नारियल की मन्नत | यहाँ खेजड़ी के पेड़ पर लाल कपड़े में नारियल बांधने से हर मनोकामना पूर्ण होती है। |
| चूरमे का प्रसाद | यहाँ मुख्य रूप से बाजरे या गेहूं के चूरमे का भोग लगाया जाता है, जिसकी शुरुआत खेत से ही हुई थी। |
मन्नत के नारियल और 11 किमी दूर का रहस्य
सालासर में एक बहुत पुरानी परंपरा है। श्रद्धालु अपनी मन्नत के लिए मंदिर परिसर में नारियल बांधते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं इन नारियलों का क्या होता है? मंदिर की मर्यादा और पवित्रता बनाए रखने के लिए, इन मन्नत के नारियलों को कभी फेंका या जलाया नहीं जाता। इन्हें मंदिर से लगभग 11 किलोमीटर दूर मुरड़ाकिया गांव के पास एक सुरक्षित स्थान पर जमीन में दबा दिया जाता है, जो भक्तों की अटूट श्रद्धा का प्रतीक है।
हनुमान जयंती और शरद पूर्णिमा पर लगता है 'कुंभ'
सालासर में साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन हनुमान जयंती और शरद पूर्णिमा के अवसर पर यहाँ विशाल मेले लगते हैं। लाखों की संख्या में श्रद्धालु पैदल यात्रा (निशान यात्रा) कर बाबा के दरबार में हाजिरी लगाने पहुँचते हैं। माना जाता है कि जो भक्त एक बार सालासर के दाढ़ी-मूंछ वाले बालाजी के दर्शन कर लेता है, उसके जीवन के बड़े से बड़े संकट मूंछों के ताव की तरह हवा में उड़ जाते हैं।