मिडल ईस्ट में शांति की आहट: 'एग्जिट' का रास्ता खोज रहे ईरान-अमेरिका, पाकिस्तान बना 'पीसमेकर'; भारत के लिए कितनी बड़ी चुनौती
India News Live,Digital Desk : पिछले 40 दिनों से मिडिल ईस्ट को बारूद की ढेर पर बिठाने वाला अमेरिका-ईरान संघर्ष अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ताजा संकेतों के अनुसार, इस युद्ध से 'सम्मानजनक निकास' (Exit) के लिए इस्लामाबाद में फिर से शांति वार्ता की मेज सजने वाली है। जहाँ अमेरिका अपनी अर्थव्यवस्था को तेल संकट से उबारना चाहता है, वहीं ईरान अपने अस्तित्व को बचाने की जद्दोजहद में है।
1. क्यों झुक रहे हैं दोनों पक्ष?
युद्ध के इस मोड़ पर दोनों देशों की अपनी मजबूरियाँ और दावे हैं:
अमेरिका का 'क्लीन स्वीप': ट्रंप प्रशासन का दावा है कि 28 फरवरी से जारी बमबारी ने ईरान के परमाणु बुनियादी ढांचे को 'पाषाण युग' में धकेल दिया है। अब ईरान के पास यूरेनियम संवर्धन की क्षमता शून्य है, जिसे दोबारा खड़ा करने में कम से कम एक दशक लगेगा। अमेरिका इसे अपनी बड़ी सामरिक जीत के रूप में पेश कर रहा है।
ईरान की 'सर्वाइवल' पॉलिटिक्स: ईरान का कट्टरपंथी शासन पूरी तरह ध्वस्त अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे के बावजूद खुद को विजयी बताएगा क्योंकि वे सत्ता बचाने में सफल रहे। उनके लिए शासन का न गिरना ही सबसे बड़ी उपलब्धि है।
तेल संकट और होर्मुज: अमेरिका की प्राथमिकता अब 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' को स्वतंत्र कराना है ताकि वैश्विक तेल आपूर्ति बहाल हो सके और अमेरिकी बाजार में ईंधन की कीमतें कम हो सकें।
2. पाकिस्तान की 'पीसमेकर' इमेज: कूटनीतिक चाल या मजबूरी?
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे हैरान करने वाली भूमिका पाकिस्तान की है। 1990 के दशक में जिस देश ने ईरान को परमाणु तकनीक बेची, वही आज 'शांतिदूत' बना हुआ है।
छवि सुधार का खेल: फील्ड मार्शल आसिम मुनीर इस मध्यस्थता के जरिए पाकिस्तान पर लगे 'आतंकवाद के समर्थक' के दाग को धोना चाहते हैं।
आर्थिक लाभ: पाकिस्तान इस 'शांतिदूत' की भूमिका का इस्तेमाल ट्रंप प्रशासन और चीन से बड़े आर्थिक और सैन्य पैकेज हासिल करने के लिए कर रहा है।
3. भारत के लिए क्या हैं खतरे?
भारतीय रणनीतिकार पाकिस्तान की इस नई भूमिका को 'डबल-एज्ड स्वॉर्ड' (दोधारी तलवार) के रूप में देख रहे हैं:
सैन्य क्षमता में वृद्धि: भारत को डर है कि मध्यस्थता के जरिए पाकिस्तान सऊदी अरब, कतर और अमेरिका के साथ अपनी जो निकटता बढ़ा रहा है, उसका अंतिम उपयोग वह भारत के खिलाफ अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने में करेगा।
प्रभाव का इस्तेमाल: खाड़ी देशों पर पाकिस्तान का बढ़ता प्रभाव भविष्य में कश्मीर या अन्य द्विपक्षीय मुद्दों पर भारत के लिए कूटनीतिक मुश्किलें खड़ी कर सकता है।
4. मोदी-ट्रंप संवाद: भारत का रुख स्पष्ट
शांति वार्ता से पहले पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच 40 मिनट की फोन कॉल बेहद महत्वपूर्ण रही।
एकमत: दोनों नेता इस बात पर सहमत हैं कि ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को स्थायी रूप से रोकना होगा और होर्मुज को हर हाल में 'ओपन' रखना होगा।
खाड़ी की सुरक्षा: भारत ने उन खाड़ी देशों की सुरक्षा को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जताई है जिन्हें ईरान ने निशाना बनाया था। भारत के लिए इस क्षेत्र की स्थिरता ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से अनिवार्य है।