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September 12 2026 10:18 pm

सहारनपुर मस्जिद ध्वस्तीकरण: हाईकोर्ट सख्त, यूपी सरकार से मांगा जवाब

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उत्तर प्रदेश के सहारनपुर स्थित कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद वर्षों पुरानी मस्जिद के ध्वस्तीकरण का विवाद अब कानूनी रूप से इलाहाबाद हाईकोर्ट की चौखट पर पहुंच चुका है। मस्जिद को बुलडोजर से जमींदोज किए जाने और कमेटी पर भारी-भरकम जुर्माना लगाए जाने के प्रशासनिक फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर हाईकोर्ट ने अहम सुनवाई की। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को अपना विस्तृत पक्ष रखने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है।

जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की एकल पीठ ने मस्जिद इंतजामिया कमेटी के मुतवल्ली मोहम्मद तनवीर अहमद की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। कोर्ट ने राज्य सरकार को तीन हफ्ते के भीतर काउंटर एफिडेविट (जवाबी हलफनामा) दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर 2026 को तय की गई है।

6.41 करोड़ रुपये के जुर्माने की वसूली पर अंतरिम रोक: कमेटी को मिली बड़ी राहत

हाईकोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए मस्जिद कमेटी को एक बड़ी तात्कालिक राहत प्रदान की है। स्थानीय प्रशासन और सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत द्वारा मस्जिद प्रबंधन पर सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे के एवज में लगाए गए करीब 6.41 करोड़ रुपये के हर्जाने (डैमेज चार्ज) की वसूली की प्रक्रिया पर अदालत ने अगली सुनवाई तक अंतरिम रोक लगा दी है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक मामले की अगली सुनवाई (12 अक्टूबर) पूरी नहीं हो जाती, तब तक प्रशासनिक स्तर पर कमेटी से किसी भी प्रकार की वित्तीय वसूली की दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। मस्जिद कमेटी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आशीष कुमार सिंह और अधिवक्ता हिमांशु दुबे व बाबर वसीम ने अदालत में पक्ष रखा, जबकि राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने पैरवी की।

क्या था पूरा मामला: 5 सितंबर को बुलडोजर चलाकर ध्वस्त की गई थी मस्जिद

विवाद की शुरुआत सहारनपुर के कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद को लेकर हुई थी, जिसे स्थानीय लोग सौ साल से भी अधिक पुरानी बताते हैं। नगर मजिस्ट्रेट (सिटी मजिस्ट्रेट) की अदालत ने 16 जुलाई 2026 को इस निर्माण को कलेक्ट्रेट की सरकारी जमीन पर अनधिकृत कब्जा करार देते हुए ध्वस्तीकरण का आदेश दिया था और साथ ही कमेटी पर 6.41 करोड़ रुपये का जुर्माना ठोका था।

मस्जिद कमेटी ने इस आदेश के खिलाफ जिला जज की अदालत में पहली अपील दाखिल की थी। 4 सितंबर को जिला अदालत द्वारा अपील खारिज किए जाने के तुरंत बाद, 5 सितंबर की सुबह भारी पुलिस बल, पीएसी और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) की तैनाती के बीच चार बुलडोजरों से मस्जिद को गिरा दिया गया था। इस कार्रवाई के विरोध में कैराना सांसद इकरा हसन और स्थानीय विधायकों ने विरोध दर्ज कराया था, जिन्हें उस दौरान हाउस अरेस्ट भी किया गया था।

हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की दलीलें: वर्शिप एक्ट और कानूनी प्रक्रिया के उल्लंघन का आरोप

मस्जिद कमेटी की ओर से हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में प्रशासनिक कार्रवाई की वैधानिकता पर कड़े सवाल उठाए गए हैं:

पूजा स्थल अधिनियम का उल्लंघन: याचिका में दलील दी गई कि यह धार्मिक स्थल आजादी से पहले से स्थापित था, ऐसे में इस पर 'पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991' (Places of Worship Act, 1991) के प्रावधान लागू होते हैं, जिसका प्रशासन ने खुला उल्लंघन किया है।

स्वामित्व और पीपी एक्ट: याचिकाकर्ताओं ने कहा कि पब्लिक प्रिमाइसेज (पीपी) एक्ट के तहत कार्रवाई करने से पहले प्रशासन को जमीन के मालिकाना हक को विधिवत साबित करना अनिवार्य था, लेकिन कमेटी के ऐतिहासिक दस्तावेजों और बिजली बिलों को अनदेखा कर दिया गया।

हड़बड़ी में ध्वस्तीकरण: कमेटी का आरोप है कि अपील खारिज होते ही उन्हें उच्च अदालत का दरवाजा खटखटाने का उचित समय दिए बिना शनिवार की तड़के ही आनन-फानन में बुलडोजर चला दिया गया।

12 अक्टूबर को होगी अगली सुनवाई: सरकार के हलफनामे पर टिकीं नजरें

इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा राज्य सरकार से तीन हफ्तों में जवाब तलब किए जाने के बाद अब सबकी नजरें प्रशासन और सरकार द्वारा दाखिल किए जाने वाले शपथ पत्र पर टिक गई हैं। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि ध्वस्तीकरण और भारी-भरकम जुर्माने के निर्धारण में किन कानूनी प्रक्रियाओं और वैधानिक प्रावधानों का पालन किया गया था। 12 अक्टूबर को होने वाली अगली सुनवाई में यह तय होगा कि इस विवाद में अदालत आगे क्या कानूनी रुख अपनाती है।