BRICS साझा बयान पर बनी सहमति: घोषणापत्र में भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत, आतंकवाद और पश्चिम पर साधा निशाना
वैश्विक तनाव, पश्चिम एशिया में गहराते युद्ध के संकट और रूस-यूक्रेन संघर्ष के साये में आयोजित ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में आखिरकार कूटनीतिक गतिरोध टूट गया है। सदस्य देशों के शेरपाओं और राजनयिकों के बीच रात भर चली तीखी बहसों और सुबह 4 बजे तक चली मैराथन माथापच्ची के बाद सभी देश एक ऐतिहासिक साझा घोषणापत्र (Joint Declaration) जारी करने पर पूरी तरह सहमत हो गए हैं। कई संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अलग-अलग देशों के भिन्न दृष्टिकोण के कारण एक समय साझा बयान पर सहमति बनना बेहद मुश्किल लग रहा था, लेकिन भारतीय कूटनीति के लचीले और अडिग रुख ने इस गतिरोध को खत्म करने में केंद्रीय भूमिका निभाई। इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की कूटनीतिक टीम की बहुत बड़ी सफलता माना जा रहा है।
सुबह 4 बजे तक क्यों चली खींचतान? जानिए विवाद के प्रमुख मुद्दे
विस्तारित ब्रिक्स (जिसमें अब कई नए सदस्य देश शामिल हैं) के पहले बड़े शिखर सम्मेलन में साझा भाषा (Common Language) तैयार करना एक बेहद जटिल कार्य था। बैठकों में मुख्य रूप से तीन मसलों पर तीखी बहस देखने को मिली:
यूक्रेन और पश्चिम एशिया युद्ध की भाषा: कुछ सदस्य देश पश्चिमी प्रतिबंधों और अमेरिकी नीतियों पर बेहद कड़े और आक्रामक शब्दों का इस्तेमाल चाहते थे, जबकि भारत ने संतुलित, निष्पक्ष और शांति-केंद्रित भाषा की वकालत की।
डी-डॉलराइजेशन बनाम स्थानीय मुद्रा: डॉलर को पूरी तरह नकारने के चरम रुख के बजाय भारत ने स्पष्ट किया कि प्राथमिकता सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं (Local Currencies) में व्यापार को सुगम बनाने की होनी चाहिए, न कि किसी विशेष मुद्रा के खिलाफ मोर्चा खोलने की।
आतंकवाद पर दोहरे मानदंड: चीन और कुछ अन्य देशों के साथ सीमा पार आतंकवाद और आतंकी गुटों के नामकरण को लेकर शब्दों के चयन पर लंबी माथापच्ची हुई।
भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत: घोषणापत्र में शामिल हुए ये अहम बिंदु
रात भर चली इस वार्ता में भारतीय वार्ताकारों ने अपने राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक स्वायत्तता से कोई समझौता नहीं किया। साझा घोषणापत्र में भारत की प्रमुख प्राथमिकताओं को मजबूती से जगह मिली है:
आतंकवाद पर कड़ा रुख: घोषणापत्र में सीमा पार आतंकवाद, आतंकियों के सुरक्षित ठिकानों (Safe Havens) और टेरर-फंडिंग के नेटवर्क की कड़ी निंदा की गई है। भारत के प्रस्ताव पर यह स्पष्ट रेखांकित किया गया कि आतंकवाद से लड़ाई में 'दोहरे मानदंडों' के लिए कोई जगह नहीं हो सकती।
UNSC सुधारों की समयबद्ध मांग: भारत की सबसे बड़ी मांग को स्वीकार करते हुए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के विस्तार और ग्लोबल साउथ के देशों को स्थायी व अस्थायी सदस्यता देने की प्रक्रिया को जल्द आगे बढ़ाने पर पूर्ण सहमति जताई गई।
व्यापारिक प्रतिबंधों पर संतुलन: एकतरफा प्रतिबंधों से विकासशील देशों की खाद्य, ऊर्जा और उर्वरक सुरक्षा पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का जिक्र किया गया, जो भारत का लगातार रुख रहा है।
बहुध्रुवीय विश्व में भारत का बढ़ता प्रभाव
सुबह 4 बजे हुए इस समझौते ने साबित कर दिया है कि ब्रिक्स अब केवल कुछ देशों का मंच नहीं है, बल्कि दुनिया की आर्थिक और रणनीतिक दिशा तय करने वाला एक प्रभावशाली समूह बन चुका है। भारत ने बिना किसी गुटबाजी का हिस्सा बने, पश्चिमी और गैर-पश्चिमी धड़ों के बीच एक मजबूत सेतु (Bridge-Builder) का काम किया।
यदि यह साझा बयान नहीं आ पाता, तो इसे पश्चिमी विश्लेषकों द्वारा ब्रिक्स की विफलता के रूप में पेश किया जाता। लेकिन भारत की सक्रिय मध्यस्थता और कूटनीतिक परिपक्वता ने यह सुनिश्चित किया कि ब्रिक्स एक मजबूत, एकजुट और प्रगतिशील संदेश के साथ दुनिया के सामने आए। यह सफलता न केवल नई दिल्ली के बढ़ते वैश्विक कद को दर्शाती है, बल्कि यह भी स्थापित करती है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की सहमति के बिना कोई भी बड़ा भू-राजनीतिक फैसला संभव नहीं है।