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September 12 2026 06:10 pm

'ब्रिक्स किसी के खिलाफ नहीं, यह वैश्विक सुधार का मंच': पीएम मोदी बोले- UNSC में सुधार को अब और टाला नहीं जा सकता

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वैश्विक भू-राजनीति में उभरती अर्थव्यवस्थाओं के सबसे बड़े संगठन ब्रिक्स (BRICS) के शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनिया को संगठन की वास्तविक भावना और भारत के रणनीतिक दृष्टिकोण से अवगत कराया। पश्चिमी देशों द्वारा ब्रिक्स को अक्सर पश्चिम-विरोधी या अमेरिका-विरोधी धड़े के रूप में देखे जाने की धारणा को सिरे से खारिज करते हुए पीएम मोदी ने दो टूक शब्दों में कहा कि "ब्रिक्स किसी के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल साउथ के साझा हितों और वैश्विक सुधारों का एक समावेशी मंच है।" इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) और बहुपक्षीय वित्तीय संस्थानों में आमूलचूल बदलाव की वकालत करते हुए चेतावनी दी कि यदि इन वैश्विक संस्थाओं में समय रहते व्यापक सुधार नहीं किए गए, तो वे 21वीं सदी में अपनी उपयोगिता और प्रासंगिकता पूरी तरह खो देंगी।

'ब्रिक्स किसी के विरोध में नहीं': पश्चिमी धारणा को पीएम मोदी ने दिया जवाब

अपने संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिक्स के मूल उद्देश्य को रेखांकित किया। कई पश्चिमी विश्लेषकों का मानना रहा है कि ब्रिक्स का विस्तार और इसकी आर्थिक नीतियां पश्चिमी प्रभुत्व वाले वित्तीय तंत्र को चुनौती देने के लिए तैयार की जा रही हैं।

इस पर विराम लगाते हुए पीएम मोदी ने कहा:

समावेशी और गैर-टकराववादी रुख: ब्रिक्स का उद्देश्य किसी तीसरे पक्ष या पश्चिमी देशों के साथ टकराव मोल लेना नहीं है। इसका प्राथमिक लक्ष्य विकासशील देशों की प्राथमिकताओं, सतत विकास, जलवायु वित्त और डिजिटल तकनीक को जन-जन तक पहुंचाना है।

वैश्विक व्यवस्था में संतुलन: ब्रिक्स एक ध्रुवीय या दो ध्रुवीय दुनिया के बजाय एक बहुध्रुवीय (Multipolar) विश्व व्यवस्था का निर्माण करना चाहता है, जहां छोटे और विकासशील राष्ट्रों की संप्रभु आवाज को भी वैश्विक स्तर पर सम्मान मिले।

'UNSC में सुधार को अब टाल नहीं सकते': समयबद्ध बदलाव की सख्त दरकार

संबोधन का सबसे आक्रामक और महत्वपूर्ण हिस्सा संयुक्त राष्ट्र (UN) के ढांचे में सुधारों को लेकर रहा। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1945 में बनाई गई व्यवस्था आज की वैश्विक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करती।

पीएम मोदी ने जोर देकर कहा:

संस्थाओं की साख पर संकट: वैश्विक संघर्षों, महामारियों और आर्थिक संकटों को रोकने में जिस तरह बहुपक्षीय मंच असमर्थ साबित हुए हैं, उससे दुनिया भर के लोगों का इन संस्थाओं से विश्वास डगमगा रहा है।

समयसीमा तय करने की जरूरत: सुरक्षा परिषद में सुधार की प्रक्रिया दशकों से बैठकों और बयानों में उलझी हुई है। अब समय आ गया है कि इस पर अनिर्णय की स्थिति खत्म हो। यूएनएससी में भारत, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे बड़े क्षेत्रों के न्यायसंगत प्रतिनिधित्व के बिना अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और शांति की कोई भी बात बेमानी है।

विलंब का खतरा: पीएम मोदी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर सुरक्षा परिषद में स्थायी और अस्थायी सीटों के विस्तार को अब और टाला गया, तो संयुक्त राष्ट्र एक निष्क्रिय निकाय बनकर रह जाएगा।

डब्ल्यूटीओ और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय तंत्र में भी हो फेरबदल

प्रधानमंत्री ने केवल सुरक्षा परिषद तक ही अपनी बात सीमित नहीं रखी, बल्कि उन्होंने विश्व व्यापार संगठन (WTO), अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक (World Bank) जैसी वैश्विक वित्तीय संस्थाओं के नियमों पर भी सवाल उठाए।

उन्होंने कहा कि ग्लोबल साउथ (एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील देश) आज गंभीर कर्ज संकट, खाद्य असुरक्षा और ऊर्जा संकट से जूझ रहे हैं। विकसित देशों द्वारा तय किए गए वित्तीय नियम अक्सर गरीब देशों के विकास में बाधक बनते हैं। ऐसे में विकासशील देशों को सस्ती दरों पर विकास पूंजी, उन्नत तकनीक और व्यापारिक रियायतें मिलनी चाहिए ताकि विकास का पहिया किसी एक क्षेत्र तक सीमित न रहे।

कूटनीतिक संतुलन: रणनीतिक स्वायत्तता की मजबूत मिसाल

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी का यह बयान भारत की संतुलित और स्वतंत्र विदेश नीति का बेहतरीन उदाहरण है। एक तरफ भारत जहां अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वाड (Quad) के जरिए रणनीतिक और समुद्री सुरक्षा पर तालमेल बैठाए हुए है, वहीं ब्रिक्स के मंच पर वह किसी पश्चिमी विरोधी गुटबाजी का हिस्सा बने बिना विकासशील देशों के वास्तविक हक की पैरवी कर रहा है।

'सबका साथ, सबका विकास' के वैश्विक विजन को दोहराते हुए प्रधानमंत्री ने दुनिया को साफ संदेश दे दिया है कि भारत न तो किसी गुट का पिछलग्गू बनेगा और न ही किसी के खिलाफ लामबंदी का हिस्सा होगा; भारत की प्राथमिकता न्यायसंगत, पारदर्शी और लोकतांत्रिक वैश्विक व्यवस्था की स्थापना है।