रिटायरमेंट के साथ ही जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया पर लगेगा विराम, विवादों से रहा गहरा नाता
India News Live,Digital Desk : इलाहाबाद हाईकोर्ट के चर्चित और विवादित बयानों के कारण सुर्खियों में रहने वाले न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव आज (बुधवार) सेवानिवृत्त होने जा रहे हैं। उनके रिटायरमेंट के साथ ही उनके खिलाफ चल रही महाभियोग (Impeachment) की लंबी प्रक्रिया भी तकनीकी रूप से समाप्त हो जाएगी। जस्टिस यादव का कार्यकाल कानूनी फैसलों से कहीं ज्यादा उनके सार्वजनिक मंचों पर दिए गए बयानों के कारण चर्चा में रहा।
VHP के कार्यक्रम से शुरू हुआ था बड़ा विवाद
जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ विवाद का मुख्य केंद्र दिसंबर 2024 में विश्व हिंदू परिषद (VHP) के विधि प्रकोष्ठ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम बना। इस कार्यक्रम में उन्होंने धर्म, शासन और अल्पसंख्यक समुदायों को लेकर कई ऐसी टिप्पणियां की थीं, जिन्हें 'हेट स्पीच' की श्रेणी में माना गया। उनके इन बयानों के बाद बार काउंसिल के सदस्यों, राजनेताओं और नागरिक समाज ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने किया था तलब, माफी से किया था इनकार
विवाद इतना बढ़ा कि सुप्रीम कोर्ट के 13 वकीलों ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना को पत्र लिखकर जस्टिस यादव के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की थी। इसके बाद शीर्ष अदालत ने उन्हें तलब भी किया था। सूत्रों के मुताबिक, कोर्ट ने उन्हें अपने बयानों के लिए माफी मांगने की सलाह दी थी, लेकिन जस्टिस यादव ने कथित तौर पर माफी मांगने से साफ इनकार कर दिया था।
राज्यसभा में महाभियोग: हस्ताक्षरों के फेर में फंसा मामला
विपक्ष के सांसदों ने 13 दिसंबर 2024 को राज्यसभा में जस्टिस यादव को हटाने के लिए महाभियोग का नोटिस दिया था।
हस्ताक्षरों का मिलान: राज्यसभा सचिवालय ने प्रस्ताव में शामिल 54 हस्ताक्षरों में विसंगति पाई थी।
वर्तमान स्थिति: साल 2025 के मध्य तक वेरिफिकेशन की प्रक्रिया में केवल 44 सांसदों ने ही अपने हस्ताक्षरों की पुष्टि की, जबकि महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने के लिए कम से कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर अनिवार्य थे। अब उनके रिटायर होने के कारण यह पूरी प्रक्रिया निष्प्रभावी हो जाएगी।
जस्टिस शेखर यादव का न्यायिक सफर
जस्टिस यादव को 12 दिसंबर 2019 को इलाहाबाद हाईकोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। बाद में 26 मार्च 2021 को वे स्थायी न्यायाधीश बने। गौरतलब है कि 2018 में कॉलेजियम ने उनके प्रमोशन को एक बार टाल दिया था, लेकिन बाद में तत्कालीन CJI रंजन गोगोई की कॉलेजियम ने उनके नाम की सिफारिश की थी।
जस्टिस यादव के रिटायरमेंट को न्यायिक हलकों में एक विवादास्पद अध्याय के अंत के रूप में देखा जा रहा है, जहां एक जज के व्यक्तिगत विचारों और संवैधानिक मर्यादा के बीच की लकीर धुंधली होती नजर आई।