इस्लामाबाद वार्ता विफल: क्यों नहीं सुलझा अमेरिका और ईरान का विवाद? 'ट्रंप फैक्टर' या भरोसे की कमी

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India News Live,Digital Desk : पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में पूरी दुनिया की नजरें टिकी थीं, जहां एक दशक से भी ज्यादा समय के बाद अमेरिका और ईरान के शीर्ष अधिकारी आमने-सामने बैठे थे। लेकिन 21 घंटे की मैराथन बातचीत के बाद नतीजा 'शून्य' रहा। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी स्पीकर मोहम्मद बागेर गालीबाफ के बीच हुई यह ऐतिहासिक मुलाकात बिना किसी समझौते के समाप्त हो गई। आखिर इस असफलता के पीछे की असली वजह क्या थी? आइए विस्तार से समझते हैं।

1. भरोसे का भारी संकट (The Trust Deficit)

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, वार्ता के विफल होने का सबसे बड़ा कारण भरोसे की कमी रही। 1979 की क्रांति के बाद से ही दोनों देशों के बीच कड़वाहट रही है।

ईरान का नजरिया: ईरान को अमेरिका के वास्तविक इरादों पर बिल्कुल भरोसा नहीं है। उन्हें डर है कि समझौते की आड़ में अमेरिका उनकी संप्रभुता और रक्षा क्षमताओं को कमजोर करना चाहता है।

अमेरिका का रुख: अमेरिकी सूत्रों का कहना है कि ईरान यह समझने में विफल रहा कि अमेरिका का प्राथमिक उद्देश्य एक ऐसा सख्त समझौता था, जो यह गारंटी दे कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार हासिल नहीं कर सकेगा।

2. होर्मुज जलडमरूमध्य और वैश्विक ऊर्जा का पेंच

बातचीत के केंद्र में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) रहा। यह दुनिया का वह संकरा समुद्री रास्ता है जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है।

अमेरिका चाहता था कि ईरान इस जलमार्ग में किसी भी प्रकार की सैन्य गतिविधि या नाकाबंदी न करे।

ईरान ने इसे अपनी सुरक्षा और सौदेबाजी (Bargaining) के मुख्य हथियार के रूप में इस्तेमाल किया, जिस पर कोई सहमति नहीं बन पाई।

3. 'ट्रंप फैक्टर' और 'प्लान B' की आहट

बातचीत विफल होते ही अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर आक्रामक रुख अपनाया।

नाकाबंदी का एलान: ट्रंप ने होर्मुज में नाकाबंदी की बात कही और दावा किया कि अमेरिका ने ईरान के कुछ जहाज तबाह कर दिए हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की यह सक्रियता वार्ता में शामिल अमेरिकी दल पर दबाव बना रही थी, या फिर यह अमेरिका का 'प्लान B' है जिसमें कूटनीति के बजाय सैन्य शक्ति का उपयोग शामिल है।

4. परमाणु कार्यक्रम पर अड़ंगा

अमेरिका की शर्त थी कि ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह रद्द करे, जबकि ईरान इसे शांतिपूर्ण ऊर्जा और अपने राष्ट्रीय अधिकार के रूप में देखता है। ईरान किसी भी ऐसे समझौते के लिए तैयार नहीं दिखा जो उसे तकनीकी रूप से पूरी तरह पीछे धकेल दे।