'भारतीयों को बाहर निकालो, भारत की कंपनियां बैन करो'; अमेरिका में अचानक क्यों भड़की नफरत और एंटी-इंडिया बयानबाजी?
दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र संयुक्त राज्य अमेरिका और सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के बीच कूटनीतिक स्तर पर रणनीतिक साझेदारी चाहे जितनी भी गहरी दिखाई दे रही हो, लेकिन अमेरिकी समाज और सोशल मीडिया के एक वर्ग में भारतीयों के खिलाफ असंतोष और तीखी बयानबाजी में अचानक उछाल देखा जा रहा है। "भारतीयों को देश से बाहर निकालो" (Indians Go Back), "एच-1बी वीजा बंद करो" और "भारतीय टेक कंपनियों को अमेरिका में बैन करो" जैसे नारे और ट्रेंड्स ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स से लेकर स्थानीय राजनीतिक भाषणों तक में सुनाई देने लगे हैं।
सतही तौर पर यह नफरत किसी को केवल नस्लीय पूर्वाग्रह लग सकती है, लेकिन इसके पीछे अमेरिकी अर्थव्यवस्था में गहराती मंदी, तकनीकी बदलाव (AI Revolution), बड़े पैमाने पर हुई छंटनी और आगामी अमेरिकी राजनीतिक समीकरणों का एक जटिल जाल छिपा है।
1. टेक ले-ऑफ और नौकरियों का संकट: 'हमारी नौकरियां भारतीय ले गए'
पिछले दो-तीन वर्षों में सिलिकॉन वैली और अमेरिका की दिग्गज टेक कंपनियों (जैसे मेटा, गूगल, अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट) ने लागत घटाने के नाम पर लाखों स्थानीय अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकाला है।
आर्थिक असुरक्षा और गुस्सा: इस बड़े ले-ऑफ के दौर में आम अमेरिकी युवाओं में यह धारणा घर कर गई है कि भारतीय प्रोफेशनल्स उनकी नौकरियों पर कब्जा जमा रहे हैं।
सस्ते श्रम का आरोप: अमेरिकी दक्षिणपंथी और स्थानीय कार्यकर्ता आरोप लगाते हैं कि टेक कंपनियां अमेरिकी नागरिकों को 1.5 लाख डॉलर देने के बजाय भारतीय इंजीनियरों को कम वेतन पर रखकर स्थानीय टैलेंट की अनदेखी करती हैं।
2. H-1B वीजा और ग्रीन कार्ड का विवाद
अमेरिका में जारी होने वाले कुल H-1B वर्क वीजा का 70 से 75 प्रतिशत से अधिक हिस्सा भारतीय प्रोफेशनल्स को मिलता है।
अमेरिकी रूढ़िवादी समूह और कुछ सीनेटर लगातार मांग कर रहे हैं कि H-1B वीजा कोटा पूरी तरह खत्म या बेहद सीमित किया जाए।
उनका तर्क है कि यह वीजा कार्यक्रम कुशल प्रतिभाओं को लाने के लिए शुरू हुआ था, लेकिन अब यह आउटसोर्सिंग कंपनियों के जरिए 'सस्ते विदेशी कामगारों' को लाने का हथियार बन चुका है।
3. भारतीय आईटी कंपनियों (TCS, Infosys, Wipro) को बैन करने की मांग क्यों?
अमेरिका में भारतीय आईटी सर्विस कंपनियों को बैन करने या उन पर भारी रेगुलेटरी टैक्स लगाने की मांग भी जोर पकड़ रही है।
ऑफशोरिंग का डर: अमेरिकी वित्तीय संस्थान, बैंक और हेल्थकेयर कंपनियां अपने बैक-एंड सॉफ्टवेयर, डेटा एनालिसिस और आईटी ऑपरेशंस का बड़ा हिस्सा भारतीय कंपनियों को आउटसोर्स (Offshoring) कर देती हैं।
स्थानीय दबाव: इससे अमेरिकी धरती से नौकरियां सीधे भारत शिफ्ट हो जाती हैं। वहां के स्थानीय ट्रेड यूनियन्स और आर्थिक राष्ट्रवादियों का कहना है कि अगर इन विदेशी कंपनियों के सरकारी और कॉर्पोरेट कॉन्ट्रैक्ट्स पर प्रतिबंध नहीं लगा, तो अमेरिका का सर्विस सेक्टर खोखला हो जाएगा।
4. भारतीय समुदाय की असाधारण सफलता से उपजी ईर्ष्या
अमेरिका में भारतीय प्रवासियों (Indian Diaspora) की आबादी महज 1.5 प्रतिशत के आसपास है, लेकिन उनका सामाजिक और आर्थिक प्रभाव कहीं अधिक विशाल है:
सबसे अमीर अल्पसंख्यक समुदाय: प्यू रिसर्च (Pew Research) के अनुसार, भारतीय-अमेरिकी समुदाय की औसत पारिवारिक आय (Median Household Income) करीब 1.5 लाख डॉलर प्रति वर्ष है, जो श्वेत अमेरिकियों और अन्य सभी प्रवासियों से काफी अधिक है।
शीर्ष पदों पर दबदबा: गूगल (सुंदर पिचाई), माइक्रोसॉफ्ट (सत्य नडेला) जैसी कंपनियों के शीर्ष नेतृत्व से लेकर नासा, चिकित्सा, अनुसंधान और अमेरिकी राजनीति में भारतीयों के बढ़ते प्रभुत्व ने वहां के एक धड़े में 'आर्थिक इनसिक्योरिटी' और सांस्कृतिक असुरक्षा को जन्म दिया है।
5. चुनावी राजनीति और दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद (America First)
अमेरिकी राजनीति में जब भी राष्ट्रपति या मिड-टर्म चुनावों का माहौल गर्माता है, "अमेरिका फर्स्ट" (America First) और आव्रजन विरोधी (Anti-Immigration) भावनाएं चरम पर पहुंच जाती हैं:
सीमा पर अवैध प्रवासियों के मुद्दे के साथ-साथ अब वैध तकनीकी प्रवासियों (Legal Tech Immigrants) को भी निशाना बनाया जा रहा है।
सोशल मीडिया पर 'ग्रेट रिप्लेसमेंट थ्योरी' (Great Replacement Theory) के नाम पर भ्रामक प्रचार किया जाता है कि विदेशी लोग आकर मूल अमेरिकी संस्कृति और नौकरियों को खत्म कर रहे हैं।
वास्तविकता क्या है? अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए रीढ़ हैं भारतीय
इस नकारात्मक माहौल के विपरीत, निष्पक्ष अमेरिकी अर्थशास्त्री और थिंक-टैंक मानते हैं कि भारतीय प्रतिभा और कंपनियों पर हमला करना खुद अमेरिका के लिए आत्मघाती कदम होगा।
भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और कंपनियां अमेरिकी सिस्टम को सालाना अरबों डॉलर का टैक्स देती हैं, सामाजिक सुरक्षा फंड (Social Security) में योगदान देती हैं और अमेरिका में लाखों स्थानीय रोजगार भी पैदा करती हैं। बिना भारतीय इंजीनियरों के अमेरिका की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और टेक सुपरपावर बनने की रफ्तार थम सकती है। ऐसे में 'बैन और बहिष्कार' की ये आवाजें आर्थिक हकीकत से ज्यादा अंदरूनी हताशा और राजनीतिक लाभ साधने का जरिया दिखाई देती हैं।