सोनम वांगचुक के बाद मनोज जरांगे और अभिजीत दीपके फिर आंदोलन के लिए तैयार; सरकार को दी अंतिम चेतावनी
देश में जनआंदोलनों और अधिकारों की मांग को लेकर माहौल एक बार फिर गरमाने लगा है। एक तरफ जहां लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची (6th Schedule) में शामिल कराने के लिए प्रख्यात पर्यावरणविद और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक अपने अनशन और 'दिल्ली चलो' पदयात्रा के जरिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाए हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण की आग फिर भड़कने को तैयार है।
मराठा आरक्षण आंदोलन के प्रमुख चेहरे मनोज जरांगे पाटिल और युवा कार्यकर्ता अभिजीत दीपके ने एक बार फिर मोर्चा खोलते हुए सरकार को खुली चेतावनी (Warning) दे दी है। वांगचुक के शांतिपूर्ण जन-दबाव के मॉडल से प्रेरणा लेते हुए जरांगे और उनकी टीम ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर वादों पर तुरंत अमल नहीं हुआ, तो आगामी दिनों में पूरे राज्य में अभूतपूर्व चक्का जाम और अनशन का नया दौर शुरू होगा।
क्या है मनोज जरांगे पाटिल का अल्टीमेटम?
जालना के अंतरवाली सराटी से मराठा आरक्षण की अलख जगाने वाले मनोज जरांगे पाटिल ने सरकार की टालमटोल नीति पर कड़ा ऐतराज जताया है:
'सगे-संबंधी' अधिसूचना पर कानून: जरांगे की सबसे प्रमुख मांग है कि राज्य सरकार द्वारा जारी किए गए 'सगे-संबंधी' (Sage-Soyare) ड्राफ्ट नोटिफिकेशन को तुरंत विधानसभा में पारित कर कानूनी रूप दिया जाए, ताकि मराठा समुदाय के सभी पात्र लोगों को कुनबी (OBC) प्रमाण पत्र मिल सके।
ओबीसी कोटे से ही आरक्षण: जरांगे ने बार-बार साफ किया है कि उन्हें अलग से दिया जाने वाला 10 फीसदी आरक्षण स्वीकार्य नहीं है क्योंकि वह अदालत में टिक नहीं पाएगा। उन्हें ओबीसी कोटे के भीतर ही स्थायी संवैधानिक व्यवस्था चाहिए।
मुकदमों की वापसी: आंदोलन के दौरान मराठा युवाओं पर दर्ज किए गए सभी पुलिस मुकदमों को बिना शर्त तुरंत वापस लिया जाए।
अभिजीत दीपके और युवा ब्रिगेड की रणनीति
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और जमीनी स्तर पर युवाओं को लामबंद करने में जुटे सामाजिक कार्यकर्ता अभिजीत दीपके ने भी प्रशासन को कड़ा संदेश दिया है। उनका कहना है कि सरकार मराठा समाज के सब्र का इम्तिहान न ले।
सोशल मीडिया और ग्राउंड का समन्वय: दीपके और युवा कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के 'क्लाइमेट फास्ट' की तर्ज पर इस आंदोलन को केवल राजनीतिक रैलियों तक सीमित न रखकर जन-जागरूकता, डिजिटल कैंपेन और शांतिपूर्ण सत्याग्रह के रूप में आगे बढ़ाने की रणनीति बना रहे हैं।
गांव-गांव में बहिष्कार: चेतावनी दी गई है कि यदि मांगें नहीं मानी गईं, तो सत्ताधारी और विपक्षी दोनों पक्षों के राजनेताओं का गांवों में प्रवेश वर्जित कर दिया जाएगा।
सोनम वांगचुक के पदयात्रा मॉडल से मिल रही प्रेरणा
लद्दाख के पर्यावरणविद सोनम वांगचुक ने लेह से दिल्ली तक सैकड़ों किलोमीटर की पैदल पदयात्रा और मौन अनशन के जरिए यह साबित किया है कि बिना हिंसा के भी लाखों नागरिकों को एकजुट कर राष्ट्रीय पटल पर अपनी बात रखी जा सकती है।
मराठा आंदोलन से जुड़े रणनीतिकारों का मानना है कि वांगचुक की तरह ही अब दिल्ली और मुंबई के सत्ता के गलियारों तक सीधी आवाज पहुंचाने के लिए बड़े पैमाने पर अनुशासित और लंबी पदयात्राओं का खाका तैयार किया जा रहा है।
चुनावी दहलीज पर सरकार के सामने दोहरी चुनौती
महाराष्ट्र में आगामी राजनीतिक सरगर्मियों और चुनावी समीकरणों के बीच मनोज जरांगे की यह ताजा चेतावनी राज्य सरकार के लिए सिरदर्द बन गई है।
एक तरफ ओबीसी नेताओं का दबाव है कि उनके मौजूदा कोटे में कोई कटौती या बंटवारा न हो, वहीं दूसरी तरफ मनोज जरांगे पाटिल किसी भी समझौते के मूड में नहीं हैं। यदि वार्ता के जरिए जल्द ही कोई ठोस और कानूनी रास्ता नहीं निकाला गया, तो राज्य को एक बार फिर बड़े पैमाने पर सड़क जाम, धरने और व्यापक सामाजिक तनाव का सामना करना पड़ सकता है।