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July 10 2026 11:38 pm

कोपेनहेगन नंबर-1 पर बरकरार, जानें रहने के मामले में कहां टिकते हैं दिल्ली-मुंबई

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दुनिया भर के प्रमुख शहरों में रहन-सहन के स्तर, नागरिक सुविधाओं और सुरक्षा का आकलन करने वाली वैश्विक संस्था इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट (EIU) ने इस सप्ताह अपनी बहुप्रतीक्षित ग्लोबल लिवेबिलिटी इंडेक्स 2026 (Global Liveability Index 2026) रिपोर्ट आधिकारिक तौर पर जारी कर दी है। इस वार्षिक वैश्विक सूचकांक में दुनिया भर के 173 प्रमुख शहरों का वहां के स्वास्थ्य, शिक्षा, संस्कृति, पर्यावरण, स्थिरता और बुनियादी ढांचे जैसे कड़े मापदंडों के आधार पर विस्तृत मूल्यांकन किया गया। इस साल की रिपोर्ट में भी डेनमार्क की खूबसूरत राजधानी कोपेनहेगन (Copenhagen) ने अपना पुराना दबदबा कायम रखते हुए दुनिया के सबसे रहने योग्य शहर का प्रतिष्ठित खिताब अपने पास बरकरार रखा है। इस वैश्विक सूची में ऑस्ट्रिया का ऐतिहासिक शहर वियना दूसरे और ऑस्ट्रेलिया का खूबसूरत शहर मेलबर्न तीसरे पायदान पर काबिज हुआ है।

भारतीय शहरों की रैंकिंग में कोई सुधार नहीं: दिल्ली और मुंबई फिर पिछड़े

वैश्विक मंच पर जहां कई देश अपने बुनियादी ढांचे को सुधार कर आगे बढ़ रहे हैं, वहीं इस सूचकांक में भारतीय शहरों (Indian Cities) की स्थिति इस बार भी काफी निराशाजनक रही है। पिछले साल के मुकाबले इस वर्ष भी भारत के प्रमुख महानगरों की रैंकिंग में कोई खास सकारात्मक बदलाव या सुधार देखने को नहीं मिला है। देश की राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली (New Delhi) इस वैश्विक सूची में 120वें स्थान पर अटकी हुई है, जबकि देश की आर्थिक राजधानी मुंबई (Mumbai) ठीक एक पायदान नीचे 121वें स्थान पर बनी हुई है। चौंकाने वाली बात यह है कि इन दोनों ही महानगरों का ग्राफ पिछले साल के मुकाबले बिल्कुल जस का तस रहा है। इसके अलावा, दक्षिण भारत के सबसे प्रमुख आईटी और बिजनेस हब माने जाने वाले चेन्नई और बेंगलुरु को इस अंतरराष्ट्रीय सूची में क्रमशः 123वां और 127वां स्थान प्राप्त हुआ है, जो भारतीय शहरी नियोजन पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है।

एशिया का बढ़ता आर्थिक दबदबा: चीन के 10 शहरों ने मारी लंबी छलांग

ग्लोबल लिवेबिलिटी रिपोर्ट 2026 के आंतरिक विश्लेषण के अनुसार, भौगोलिक दृष्टिकोण से पश्चिमी यूरोप अभी भी रहने के लिहाज से वैश्विक स्तर पर सबसे मजबूत और सुरक्षित क्षेत्र बना हुआ है, हालांकि अब उसके औसत स्कोर में एक तरह का ठहराव (Stagnation) आ गया है। इसके विपरीत, विकास की दौड़ में तेजी से दौड़ रहे एशियाई देशों के औसत लिवेबिलिटी स्कोर में इस साल उल्लेखनीय और ऐतिहासिक वृद्धि दर्ज की गई है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमारा पड़ोसी देश चीन है, जहां की सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे और शहरी विकास पर किए गए भारी निवेश के चलते वर्ष 2025 की तुलना में इस साल चीन के 10 प्रमुख शहरों की रैंकिंग में बहुत बड़ा और सकारात्मक सुधार देखा गया है। इसके विपरीत, वैश्विक अस्थिरता और ईरान युद्ध की विभीषिका के कारण पूरे खाड़ी क्षेत्र (Gulf Region) की स्थिरता को इस साल भारी नुकसान पहुंचा है, जिससे वहां के कई बड़े शहरों के स्कोर में भारी गिरावट दर्ज की गई है।

खराब रैंकिंग का वैश्विक निवेश पर पड़ेगा बुरा असर: अर्बन गवर्नेंस विशेषज्ञों ने जताई चिंता

भारतीय महानगरों के इस बेहद साधारण और लचर प्रदर्शन पर देश के प्रमुख अर्बन गवर्नेंस (शहरी शासन) विशेषज्ञों ने गहरी चिंता और नाराजगी व्यक्त की है। शहरी सुधारों के क्षेत्र में काम करने वाली प्रसिद्ध संस्था 'जनाग्रह' (Janaagraha) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) श्रीकांत विश्वनाथन ने इस रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों में हमारे शहरों की ऐसी खराब रैंकिंग का सीधा और सीधा नकारात्मक असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इसका मतलब यह है कि हम वैश्विक निवेशकों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और दुनिया के बेहतरीन टैलेंट व प्रोफेशनल्स को अपनी तरफ आकर्षित करने में लगातार कमजोर साबित हो रहे हैं। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों पर जोर देते हुए कहा कि यदि भारत को वैश्विक आर्थिक महाशक्ति और प्रतिस्पर्धा में अग्रणी बने रहना है, तो हमें अपने शहरों के इंफ्रास्ट्रक्चर, प्रदूषण नियंत्रण, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और नागरिक सुविधाओं को युद्धस्तर पर मजबूत व रहने योग्य बनाने की सख्त और तत्काल आवश्यकता है।