यूपी में प्रधानों को प्रशासक बनाने पर हाईकोर्ट सख्त! उठाया बड़ा संवैधानिक सवाल, पंचायतीराज के अपर मुख्य सचिव तलब
उत्तर प्रदेश में समय पर पंचायत चुनाव न कराए जाने और ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक (प्रबंधक) नियुक्त करने के योगी सरकार के फैसले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने इस पूरी प्रक्रिया पर गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़े कर दिए हैं। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश पंचायतीराज विभाग के अपर मुख्य सचिव को अगली सुनवाई पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के जरिए व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने और अपना रुख स्पष्ट करने का सख्त निर्देश जारी किया है। कोर्ट के इस कड़े रुख से उत्तर प्रदेश के सियासी और प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है।
क्या प्रधानों को प्रशासक बनाने से अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ रहा है कार्यकाल? हाईकोर्ट ने जताई चिंता
संजय कुमार शर्मा द्वारा दाखिल की गई एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) पर विस्तृत सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ ने साफ तौर पर कहा कि उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम की धारा 12(3-ए) की वैधानिक वैधता पर अब दोबारा नए सिरे से विचार किए जाने की अत्यंत आवश्यकता है। माननीय न्यायाधीशों ने प्रमुख रूप से यह कानूनी सवाल उठाया है कि क्या किसी निवर्तमान ग्राम प्रधान को ही दोबारा प्रशासक के रूप में नियुक्त कर देना, वास्तव में पंचायत के कार्यकाल को पिछले दरवाजे से (अप्रत्यक्ष रूप से) आगे बढ़ाने जैसा नहीं है? कोर्ट ने यह भी बिंदु उठाया कि क्या इस तरह की व्यवस्था से राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission) की स्वायत्तता और उसके संवैधानिक अधिकारों का हनन होता है?
साल 2000 के ऐतिहासिक 'प्रेम लाल पटेल बनाम यूपी राज्य' मामले का दिया हवाला
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने साल 2000 के एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कानूनी मामले 'प्रेम लाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' का विशेष रूप से संदर्भ दिया। कोर्ट ने याद दिलाया कि उस समय भी हाईकोर्ट ने इसी प्रकार के प्रशासनिक प्रावधान को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243-ई (Article 243-E) और अनुच्छेद 243-के (Article 243-K) के पूरी तरह विपरीत और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ मानते हुए पूरी तरह असंवैधानिक घोषित कर दिया था। हालांकि, बाद में जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो देश की शीर्ष अदालत ने कानून के इन जटिल प्रश्नों को भविष्य के लिए खुला छोड़ते हुए उस अपील का निस्तारण कर दिया था। अब यही सवाल दोबारा उत्तर प्रदेश के पंचायती ढांचे के सामने आ खड़ा हुआ है।
मई में खत्म हो चुका है पंचायतों का कार्यकाल, चुनाव की तैयारी कर रहे दावेदारों को लगा तगड़ा झटका
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों का पांच साल का कानूनी कार्यकाल पिछले मई महीने में ही पूरी तरह समाप्त हो चुका है। संवैधानिक नियमों के अनुसार इस अवधि से पहले ही राज्य में नए सिरे से पंचायत चुनाव संपन्न करा लिए जाने चाहिए थे। लेकिन विभिन्न प्रशासनिक और तकनीकी कारणों का हवाला देते हुए सरकार द्वारा चुनाव को टाल दिया गया। इसके विकल्प के रूप में इतिहास में पहली बार उत्तर प्रदेश सरकार ने मौजूदा प्रधानों को ही उनके संबंधित गांवों का सरकारी प्रशासक नियुक्त कर दिया। सरकार के इस अप्रत्याशित फैसले से उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में पिछले कई महीनों से नए पंचायत चुनाव की जोर-शोर से तैयारी कर रहे हजारों भावी उम्मीदवारों और स्थानीय नेताओं को बहुत तगड़ा झटका लगा है।
यूपी में 900 नई अदालतों के गठन पर भी हाईकोर्ट सख्त: मुख्य सचिव से मांगा गया शपथ पत्र
इसी सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश में न्याय व्यवस्था को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से 900 नई अदालतों के गठन के लंबित मामले पर भी अपना कड़ा रुख दिखाया है। अदालत ने सूबे के मुख्य सचिव (Chief Secretary) को आदेश दिया है कि वे अगली सुनवाई तक व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में एक विस्तृत शपथ पत्र (Affidavit) दाखिल करें और इससे संबंधित आधिकारिक शासनादेश (GO) प्रस्तुत करें। इस महत्वपूर्ण मामले की अगली सुनवाई 23 जुलाई 2026 को तय की गई है। आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश सरकार की एक उच्च स्तरीय समिति ने अक्टूबर 2024 में ही राज्य में कानून व्यवस्था और लंबित मुकदमों के बोझ को कम करने के लिए पहले चरण में 900 नई अदालतों के गठन को सैद्धांतिक मंजूरी दी थी, जिसमें 225 एचजेएस (HJS) स्तर के, 375 सिविल जज सीनियर डिवीजन और 300 सिविल जज जूनियर डिवीजन की अदालतें शामिल हैं, लेकिन इस पर जमीनी क्रियान्वयन अभी तक पूरी तरह से अटका हुआ है।