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July 19 2026 05:58 am

जब एक ही दिन में मनोज बाजपेयी से छिन गए थे 3 बड़े प्रोजेक्ट्स, डायरेक्टर ने पूछा था– 'सुसाइड तो नहीं कर लोगे?'

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बॉलीवुड में आज मनोज बाजपेयी (Manoj Bajpayee) को अभिनय का 'पावरहाउस' माना जाता है। 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' के सरदार खान हों, 'द फैमिली मैन' के श्रीकांत तिवारी हों या फिर 'सत्या' का भीखू म्हात्रे—उन्होंने हर किरदार को अमर कर दिया है। लेकिन आज जिस मुकाम पर मनोज बाजपेयी खड़े हैं, वहां तक पहुंचने का रास्ता कांटों भरा था। बिहार के एक छोटे से गांव से आकर मायानगरी मुंबई में अपनी पहचान बनाना उनके लिए आसान नहीं था। उनके जीवन में एक ऐसा काला दिन भी आया था, जब उन्हें सुबह से लेकर शाम तक एक के बाद एक, तीन बड़े प्रोजेक्ट्स से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। बेइज्जती और हताशा के उस दौर में भी इस कलाकार ने हिम्मत नहीं हारी और आगे चलकर इतिहास रच दिया।

1994 में 'बिना डायलॉग' के रोल से हुई थी करियर की शुरुआत

बिहार के पश्चिम चंपारण के बेलवा गांव में जन्मे मनोज बाजपेयी को साल 1994 में पहला फिल्मी ब्रेक मिला। महान निर्देशक गोविंद निहलानी की फिल्म 'द्रोहकाल' में उन्हें एक छोटा सा रोल मिला। इसी साल मशहूर डायरेक्टर शेखर कपूर ने अपनी कल्ट फिल्म 'बैंडिट क्वीन' में मनोज को डाकू मान सिंह का किरदार दिया। दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी फिल्म में मनोज बाजपेयी का एक भी कड़क डायलॉग नहीं था, लेकिन उनके चेहरे के हाव-भाव ने मेकर्स का ध्यान अपनी ओर खींचा। फिल्मों के साथ-साथ वह दूरदर्शन के प्रसिद्ध शोज जैसे 'कलाकार', 'इम्तिहान' और 'स्वाभिमान' में भी छोटे-मोटे रोल कर रहे थे।

वो एक मनहूस दिन: जब पहले ही टेक के बाद शो से निकाला

मनोज बाजपेयी ने मशहूर टॉक शो 'शेखर टुनाइट' में अपने स्ट्रगल के दिनों का एक ऐसा किस्सा सुनाया जो किसी भी उभरते कलाकार की रूह कंपा दे। मनोज ने बताया कि उस समय उनके पास तीन प्रोजेक्ट्स थे—एक सीरियल में वह मुख्य अभिनेता (Lead Role) थे, दूसरे सीरियल में सेकेंड लीड और एक बड़ी कॉर्पोरेट फिल्म में भी लीड रोल निभा रहे थे।

मनोज ने बताया, "मैं पहले सीरियल की शूटिंग के लिए सेट पर पहुंचा। पहला टेक कम्प्लीट हुआ। तभी अचानक डायरेक्टर और असिस्टेंट डायरेक्टर उठकर एक कमरे में चले गए। थोड़ी देर बाद असिस्टेंट डायरेक्टर बाहर आया और मुझे अलग ले जाकर बोला कि तुम अपने कपड़े चेंज कर लो, कुछ सही नहीं लग रहा है, आगे कुछ होगा तो बताएंगे। जब मैं कॉस्ट्यूम चेंज करके बाहर निकला, तो पूरी यूनिट और मेरे को-एक्टर्स बाहर खड़े थे, शूटिंग रुक चुकी थी। वह पल मुझे भीतर से तोड़ देने वाला था। मुझे भयंकर बेइज्जती महसूस हुई, लेकिन मैं रोया नहीं।"

दोस्त ने पूछा था- 'भाई, सुसाइड तो नहीं कर लोगे न?'

उस बेइज्जती को घूंट की तरह पीकर मनोज ट्रेन में बैठे और अपनी दूसरी कॉर्पोरेट फिल्म के सेट पर पहुंच गए। वहां उनकी मुलाकात उस वक्त के असिस्टेंट डायरेक्टर 'विक्टर' (विजय कृष्ण आचार्य, जिन्होंने बाद में 'धूम 3' बनाई) से हुई। विक्टर ने जब मनोज को सेट पर देखा तो हैरान होकर पूछा कि तुम यहां क्या कर रहे हो? तुम्हारी शूटिंग तो दो दिन बाद है। मनोज ने भारी मन से बताया कि उन्हें पहले शो से निकाल दिया गया है। यह सुनकर विक्टर हिचकिचाए और बोले, "यार मनोज, मुझे दुख के साथ बताना पड़ रहा है कि इस कॉर्पोरेट फिल्म से भी तुम्हें रिप्लेस कर दिया गया है और तुम्हारी जगह किसी और को ले लिया गया है।"

मनोज पूरी तरह सुन्न हो चुके थे। जब वह वहां से जाने लगे, तो विक्टर ने डरते-डरते उनसे पूछा—"तू कमरे पर ही जा रहा है न? भाई, प्लीज सुसाइड मत कर लेना! मैं शाम को खुद दारू लेकर तेरे कमरे पर आ रहा हूं।"

शाम होते-होते तीसरे प्रोजेक्ट ने भी तोड़ा दिल

दो बड़े झटके लगने के बाद मनोज बाजपेयी ने सोचा कि चलो कम से कम तीसरा प्रोजेक्ट तो हाथ में है ही। उन्होंने तसल्ली करने के लिए तीसरे शो के डायरेक्टर के ऑफिस में फोन मिलाया। फोन वहां के असिस्टेंट ने उठाया। जब मनोज ने पूछा कि अपनी शूटिंग कब से शेड्यूल है, तो सामने से जवाब मिला—"सॉरी मनोज भाई, मेकर्स ने प्लान बदल दिया है, आपको इस प्रोजेक्ट से भी ड्रॉप कर दिया गया है।" इस तरह महज कुछ घंटों के भीतर मनोज बाजपेयी के हाथ से उनके तीनों काम छिन गए थे।

'सत्या' ने बदली किस्मत और जीत डाले 4 नेशनल अवॉर्ड्स

इस भयानक रिजेक्शन के बाद भी मनोज बाजपेयी ने हार मानने के बजाय खुद से वादा किया कि एक दिन ऐसा आएगा जब लोग उन्हें निकालने पर पछताएंगे। और वो दिन आया साल 1998 में, जब रामगोपाल वर्मा की फिल्म 'सत्या' रिलीज हुई। 'भीखू म्हात्रे' के किरदार में मनोज बाजपेयी ने ऐसा अभिनय किया कि पूरी फिल्म इंडस्ट्री उनके कदमों में आ गई।

इसके बाद उन्होंने 'शूल', 'पिंजर', 'अलीगढ़' और 'गुलमोहर' जैसी कालजयी फिल्मों में काम किया। अपनी इसी बेमिसाल अदाकारी के दम पर मनोज बाजपेयी ने भारत का सबसे प्रतिष्ठित 'नेशनल फिल्म अवॉर्ड' (National Film Award) 4 बार अपने नाम किया:

पहला नेशनल अवॉर्ड: फिल्म 'सत्या' के लिए (बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर)

दूसरा नेशनल अवॉर्ड: फिल्म 'पिंजर' के लिए (स्पेशल जूरी अवॉर्ड)

तीसरा नेशनल अवॉर्ड: फिल्म 'भोंसले' (2020) के लिए (बेस्ट एक्टर)

चौथा नेशनल अवॉर्ड: फिल्म 'गुलमोहर' के लिए (स्पेशल मेंशन)