वट सावित्री व्रत कथा: जब सावित्री के हठ के आगे यमराज भी हार गए, जानें सत्यवान के प्राण बचाने वाली यह अद्भुत कहानी
India News Live, Digital Desk : ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाने वाला वट सावित्री व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य का पर्व है। यह व्रत न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि पति-पत्नी के अटूट प्रेम और समर्पण की मिसाल भी है। मान्यता है कि जो महिला विधि-विधान से यह व्रत और कथा श्रवण करती है, उसके पति पर आने वाले सभी संकट दूर हो जाते हैं। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को इस व्रत की महिमा और सावित्री-सत्यवान की वह कथा सुनाई थी, जिसने मृत्यु के देवता यमराज को भी निरुत्तर कर दिया था।
राजा अश्वपति की तपस्या और सावित्री का जन्म
प्राचीन काल में मद्रदेश के राजा अश्वपति संतान सुख से वंचित थे। उन्होंने देवी सावित्री की कठोर आराधना की, जिसके फलस्वरूप उन्हें एक दिव्य कन्या रत्न की प्राप्ति हुई। देवी के नाम पर ही कन्या का नाम ‘सावित्री’ रखा गया। जब सावित्री विवाह योग्य हुई, तो उसने अपने विवेक से शाल्वे देश के राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपना वर चुना। हालांकि, सत्यवान का परिवार उस समय राजपाट खोकर तपोवन में निवास कर रहा था।
नारद मुनि की भविष्यवाणी और सावित्री का अटूट संकल्प
सावित्री ने जब अपने चुनाव के बारे में पिता को बताया, तो वहां मौजूद देवर्षि नारद ने एक विचलित करने वाली भविष्यवाणी की। नारद जी ने कहा कि सत्यवान गुणवान तो है, लेकिन उसकी आयु अल्प है और ठीक एक वर्ष बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी। पिता के बार-बार समझाने के बावजूद सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रही। उसने कहा, “पिताजी, कन्यादान एक ही बार होता है और मैंने मन से सत्यवान को पति स्वीकार कर लिया है।” अंततः शुभ मुहूर्त में दोनों का विवाह संपन्न हुआ।
यमराज से सावित्री का धर्म संवाद
जैसे-जैसे सत्यवान की मृत्यु का समय निकट आया, सावित्री ने तीन दिन का कठोर उपवास शुरू किया। चौथे दिन जब सत्यवान लकड़ियां काटने जंगल गया, तो अचानक उसके सिर में तेज दर्द हुआ और वह सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गया। तभी वहां साक्षात यमराज प्रकट हुए और सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे। सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ी। यमराज ने उसे लौटने को कहा, लेकिन सावित्री ने अपनी बुद्धिमत्ता और धर्मयुक्त वचनों से यमराज को प्रभावित कर लिया।
पांच वरदान और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति
सावित्री के तर्कों से प्रसन्न होकर यमराज ने उसे एक-एक कर पांच वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने चतुराई और भक्ति से ये वर मांगे:
ससुर की आंखों की रोशनी और खोया हुआ राज्य वापस मिले।
पिता को सौ पुत्रों की प्राप्ति हो।
उसे (सावित्री को) सौ पुत्रों का सुख मिले।
पति सत्यवान दीर्घायु प्राप्त करे।
परिवार की धर्म में सदैव दृढ़ श्रद्धा बनी रहे।
चूंकि सावित्री ने सौ पुत्रों का वरदान मांग लिया था, इसलिए यमराज को धर्म की रक्षा के लिए सत्यवान के प्राण लौटाने पड़े। सावित्री उसी वट वृक्ष के नीचे लौटी जहां सत्यवान का शरीर था और वह पुनर्जीवित हो उठा। तभी से ज्येष्ठ अमावस्या को वट सावित्री व्रत के रूप में मनाया जाता है।