अलीगढ़ का नाम बदलकर 'हरिगढ़' करने की मांग ने पकड़ा जोर: चुनावी माहौल के बीच शासन ने मांगी विस्तृत रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर नामों को बदलने और सांस्कृतिक प्रतीकों को पुनर्जीवित करने की सियासत तेज हो गई है। ताला नगरी और तालीम के बड़े केंद्र के रूप में देश-दुनिया में मशहूर अलीगढ़ जिले का नाम बदलकर 'हरिगढ़' किए जाने की मांग ने एक बार फिर से जोर पकड़ लिया है। खास तौर पर चुनावी सरगर्मियों के बीच इस मुद्दे के फिर से पटल पर आने से राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज हो गई है। आलोचकों और राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग इसे आगामी चुनावों के मद्देनजर ध्रुवीकरण और वोट बैंक साधने की एक सोची-समझी रणनीति यानी 'हरिगढ़ कार्ड' के रूप में देख रहा है, वहीं समर्थकों का मानना है कि यह शहर की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को उसका मूल स्वरूप लौटाने की एक न्यायसंगत पहल है।
अलीगढ़ से हरिगढ़ की मांग और शासन का ताजा कदम
अलीगढ़ का नाम बदलकर हरिगढ़ करने का मामला अचानक सुर्खियों में तब आया जब शासन स्तर पर इस पर प्रशासनिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया। राजस्व परिषद के आयुक्त एवं सचिव ने मंडलायुक्त के माध्यम से अलीगढ़ जिला प्रशासन से इस प्रस्ताव पर एक विस्तृत और औचित्यपूर्ण रिपोर्ट तलब की है। यह कदम जिला पंचायत अध्यक्ष विजय सिंह द्वारा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंपे गए प्रस्ताव के बाद उठाया गया है। इससे पहले अगस्त 2021 में जिला पंचायत की पहली बोर्ड बैठक में सर्वसम्मति से अलीगढ़ का नाम हरिगढ़ करने का प्रस्ताव पास किया गया था। इसके बाद नवंबर 2023 में अलीगढ़ नगर निगम के सदन ने भी इस प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगा दी थी। हालांकि, तब यह मामला लंबे समय तक ठंडे बस्ते में पड़ा रहा था, लेकिन अब शासन द्वारा रिपोर्ट मांगे जाने के बाद इस प्रक्रिया ने एक बार फिर रफ्तार पकड़ ली है, जिससे प्रशासनिक अमले से लेकर राजनीतिक दलों तक हलचल मच गई है।
इतिहास के पन्नों में अलीगढ़: कोल से लेकर अलीगढ़ तक का सफर
किसी भी शहर का नाम बदलने की बहस के साथ उसका इतिहास हमेशा जुड़ा होता है। इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के अनुसार, पिछले लगभग 600 वर्षों के दौरान अलीगढ़ का नाम अलग-अलग शासकों के काल में पांच बार बदला जा चुका है। इस क्षेत्र का सबसे प्राचीन ज्ञात नाम 'कोल' हुआ करता था। इसके बाद 14वीं शताब्दी के दौरान इतिहासकार इब्ने बतूता के यात्रा वृत्तांतों और अन्य ऐतिहासिक दस्तावेजों में इसे 'सब्जाबाद' के नाम से भी उल्लेखित किया गया, क्योंकि उस दौर में यहां चारों तरफ हरियाली और आम के विशाल बाग हुआ करते थे। इसके पश्चात लोधी वंश के शासनकाल में यहां के गवर्नर मोहम्मद (जिनके पिता का नाम उमर था) ने अपने नाम पर इसका नाम बदलकर 'मोहम्मदगढ़' रख दिया था। मुगल काल में जब साबित खान यहां का गवर्नर बनकर आया, तो उसने इस क्षेत्र का नाम बदलकर अपने नाम पर 'साबितगढ़' कर दिया था। आगे चलकर 1775 में नजफ अली खान ने अलीगढ़ के किले पर अधिकार किया और उसने अपने नाम के आधार पर इसका नाम 'अलीगढ़' रख दिया। ब्रिटिश काल और स्वतंत्र भारत के शुरुआती दशकों में भी यही नाम प्रचलित रहा और आज तक यह इसी नाम से जाना जाता है। अब हिंदूवादी संगठनों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों का तर्क है कि 'हरिगढ़' इस शहर का प्राचीन और सनातन संस्कृति से जुड़ा मूल नाम रहा है, इसलिए इसे दोबारा स्थापित किया जाना चाहिए।
राजनीतिक सरगर्मी और 'हरिगढ़ कार्ड' के सियासी मायने
उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रतीकों और नामों की राजनीति का एक पुराना और प्रभावी इतिहास रहा है। राज्य में पिछले कुछ वर्षों के दौरान कई जिलों, रेलवे स्टेशनों और चौराहों के नाम बदले जा चुके हैं, जिनमें फैजाबाद का नाम अयोध्या और इलाहाबाद का नाम प्रयागराज किया जाना प्रमुख है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब भी चुनाव नजदीक आते हैं, इस तरह के भावनात्मक और सांस्कृतिक मुद्दे स्वतः ही राजनीतिक मंचों के केंद्र में आ जाते हैं। सत्ताधारी दल के नेताओं का मानना है कि ऐसे कदम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को मजबूत करते हैं और जनता की पुरानी भावनाओं का सम्मान करते हैं। वहीं दूसरी ओर, विपक्षी दल इसे विशुद्ध रूप से चुनावी लाभ उठाने और ध्रुवीकरण की रणनीति करार दे रहे हैं। उनका आरोप है कि जब भी जनता बेरोजगारी, महंगाई, बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं और किसानों की समस्याओं जैसे असली मुद्दों पर सरकार से सवाल पूछती है, तब ध्यान भटकाने के लिए इस प्रकार के नाम परिवर्तन के कार्ड खेले जाते हैं ताकि चुनावों में वोटों की फसल काटी जा सके।
पक्ष और विपक्ष की तीखी प्रतिक्रियाएं
नाम परिवर्तन की इस प्रक्रिया पर अलीगढ़ के स्थानीय नेताओं के बीच तीखा वैचारिक टकराव देखने को मिल रहा है। स्थानीय लोकसभा सांसद सतीश गौतम ने इस पहल का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा है कि यदि अलीगढ़ का नाम हरिगढ़ किया जाता है, तो यह सनातन प्रेमियों और क्षेत्र की जनता के लिए एक बेहद सुखद बात होगी और शासन की यह पहल पूरी तरह स्वागत योग्य है। वहीं, जिला पंचायत अध्यक्ष विजय सिंह और कोल विधायक अनिल पाराशर का भी कहना है कि हरिगढ़ इस क्षेत्र की प्राचीन पहचान और सनातन संस्कृति का प्रतीक है, जिसे वापस लाया जाना चाहिए। इसके विपरीत, विपक्षी दलों ने इस पर तीखा प्रहार किया है। समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद एवं वरिष्ठ नेता चौ. बिजेंद्र सिंह ने सरकार के इस कदम की आलोचना करते हुए कहा कि इससे जनता का कोई भला नहीं होने वाला है, और सरकार केवल समाज को बांटने तथा हिंदू-मुस्लिम मुद्दों के जरिए आपसी टकराव पैदा करने की राजनीति कर रही है। कांग्रेस पार्टी के जिलाध्यक्ष ठा. सोमवीर सिंह ने भी सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि जनता के मूल हितों की अनदेखी करके केवल राजनीतिक स्वार्थ के लिए नाम बदलने की कवायद की जा रही है, जिसका जनता आगामी चुनावों में लोकतांत्रिक तरीके से करारा जवाब देगी।
प्रशासनिक औचित्य और आगे की राह
शासन द्वारा मांगी गई विस्तृत रिपोर्ट के बाद अब गेंद जिला प्रशासन के पाले में है। जिला प्रशासन को यह रिपोर्ट तैयार करते समय यहां के ऐतिहासिक साक्ष्यों, स्थानीय जनता की भावनाओं, कानून-व्यवस्था की स्थिति और प्रशासनिक व आर्थिक प्रभावों का पूरा ब्योरा देना होगा। जानकारों का कहना है कि किसी भी जिले का नाम बदलने की प्रक्रिया बेहद लंबी होती है, जिसमें नगर निगम या जिला पंचायत के प्रस्ताव के बाद राज्य कैबिनेट की मंजूरी, केंद्रीय गृह मंत्रालय, रेलवे, डाक विभाग और सर्वे ऑफ इंडिया समेत कई केंद्रीय एजेंसियों की अनापत्ति (NOC) लेनी पड़ती है। चूंकि इस प्रक्रिया में लंबा वक्त लगता है, इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या चुनाव आचार संहिता लागू होने से पहले इस पर कोई अंतिम मुहर लग पाती है या यह मामला केवल राजनीतिक चर्चाओं तक ही सीमित रहता है। बहरहाल, इस रिपोर्ट के तलब किए जाने से अलीगढ़ की आबोहवा में राजनीतिक गर्मी बढ़ गई है और आने वाले दिनों में यह मुद्दा बहस के केंद्र में रहने वाला है।