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July 05 2026 09:57 pm

सोने में 2008 के बाद की सबसे बड़ी ऐतिहासिक गिरावट, $4,000 के नीचे फिसला गोल्ड; जानिए अब क्या करें निवेशक

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नई दिल्ली ब्यूरो: वैश्विक सराफा बाजार से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर आ रही है। सोना निवेशकों को एक के बाद एक तगड़े झटके लग रहे हैं। जून 2026 का महीना गोल्ड मार्केट के इतिहास में अक्टूबर 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट (Global Financial Crisis) के बाद सबसे खराब महीना साबित हुआ है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतें 4,000 डॉलर प्रति औंस के बेहद महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक स्तर को तोड़कर नीचे फिसल चुकी हैं। सिर्फ जून के एक महीने में ही सोने में करीब 12% की भारी-भरकम गिरावट दर्ज की गई है, जिससे निवेशकों में खलबली मच गई है।

पिछले 3 महीनों में 20% टूटा सोना, पिछले साल नवंबर के बाद सबसे निचला स्तर

स्पॉट गोल्ड (Spot Gold) अंतरराष्ट्रीय बाजार में बुधवार को 3,975 डॉलर प्रति औंस के आसपास संघर्ष करता नजर आया, जबकि इससे ठीक एक दिन पहले यह लुढ़ककर 3,943 डॉलर तक पहुंच गया था, जो पिछले साल नवंबर के बाद का सबसे निचला स्तर है। वहीं, अगस्त डिलीवरी वाले अमेरिकी गोल्ड फ्यूचर्स भी 4,000 डॉलर के नीचे गोता लगाकर करीब 3,988 डॉलर पर आ गए हैं। पिछले 3 महीनों के आंकड़ों पर गौर करें तो सोने की चमक करीब 20% तक फीकी पड़ चुकी है, हालांकि लॉन्ग टर्म यानी पिछले एक साल के लिहाज से सोना अभी भी करीब 20% के मुनाफे पर बना हुआ है।

आखिर क्यों अचानक ताश के पत्तों की तरह ढह गया गोल्ड मार्केट?

बाजार विश्लेषकों (Market Experts) ने सोने में आई इस ऐतिहासिक गिरावट के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारणों को जिम्मेदार ठहराया है:

अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उछाल: अमेरिका में सरकारी बॉन्ड पर मिलने वाला रिटर्न तेजी से बढ़ा है। जब बॉन्ड से सुरक्षित और फिक्स्ड रिटर्न मिलता है, तो निवेशक सोने जैसी बिना ब्याज वाली संपत्ति से पैसा निकालकर वहां लगाने लगते हैं।

मजबूत होता अमेरिकी डॉलर: डॉलर इंडेक्स लगातार मजबूत हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर महंगा होने से अन्य मुद्रा वाले देशों के लिए सोना खरीदना महंगा हो जाता है, जिससे वैश्विक मांग घटती है।

फेडरल रिजर्व का डर: अमेरिकी केंद्रीय बैंक (US Fed) द्वारा सितंबर में ब्याज दरें बढ़ाने की आशंका 67% तक पहुंच गई है। ब्याज दरें बढ़ने के डर से निवेशक सोने में नया दांव लगाने से बच रहे हैं।

इसके अलावा, मिडिल ईस्ट (ईरान-अमेरिका) में जारी भू-राजनीतिक तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें ऊंची हैं, जो महंगाई बढ़ा रही हैं और केंद्रीय बैंकों को ब्याज दरें ऊंची रखने पर मजबूर कर रही हैं।

जून 2013 के बाद की सबसे बड़ी तिमाही गिरावट, क्या कहते हैं दिग्गज एक्सपर्ट्स?

यह गिरावट केवल मासिक नहीं, बल्कि तिमाही आधार पर भी जून 2013 के बाद की सबसे बड़ी मंदी है। इसके बावजूद, मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि आम निवेशकों को घबराने या पैनिक सेलिंग करने की बिल्कुल जरूरत नहीं है।

टाटा म्यूचुअल फंड के विश्लेषकों का कहना है कि शॉर्ट टर्म में सोने में उतार-चढ़ाव (Volatility) जारी रह सकता है, लेकिन लंबी अवधि (Long Term) के लिए इसके मूलभूत कारक (Fundamentals) आज भी बेहद मजबूत हैं। कीमतों में आ रही यह कमी खरीदारों के लिए एक शानदार मौका बन सकती है।

ऑगमोंट की रिसर्च हेड रेनिशा चैनानी के मुताबिक, तकनीकी रूप से 4,000 डॉलर का स्तर टूटना बड़ी बात है। यदि यह मंदी जारी रही तो सोना 3,600 डॉलर के स्तर को भी छू सकता है। हालांकि, चूंकि बाजार इस वक्त 'ओवरसोल्ड' (Oversold) जोन में है, इसलिए यहां से 4,100 डॉलर से लेकर 4,165 डॉलर तक की एक शॉर्ट-टर्म बाउंस बैक यानी तेज रिकवरी की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

निवेशकों के लिए सलाह: खरीदें या अभी करें इंतजार?

विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय निवेशकों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार जितनी बड़ी गिरावट घरेलू बाजार में नहीं दिखेगी, क्योंकि भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर है, जो घरेलू कीमतों को एक सपोर्ट देता है। फिलहाल बाजार की नजरें अमेरिका के रोजगार के आंकड़ों (US Employment Data) पर टिकी हैं। एक्सपर्ट्स की राय है कि जो लोग लंबी अवधि के लिए निवेश करना चाहते हैं, वे इस गिरावट का फायदा उठाएं और एक साथ सारा पैसा लगाने के बजाय 'बाय ऑन डिप्स' (चरणबद्ध तरीके से थोड़ा-थोड़ा निवेश) की रणनीति अपनाएं।