टीईटी अनिवार्यता ने शिक्षक जताया गुस्सा, लखनऊ में विशाल रैली और ज्ञापन सौंपा

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India News Live,Digital Desk : कक्षा एक से आठ तक पढ़ाने वाले प्राथमिक और जूनियर शिक्षक अब दो साल के भीतर टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) पास करने के लिए बाध्य किए गए हैं। इस फैसले से शिक्षक नाराज हैं और उनका कहना है कि यह उनके लिए अनुचित और अन्यायपूर्ण है।

उप्र प्राथमिक शिक्षक संघ के आह्वान पर मंगलवार को बड़ी संख्या में शिक्षक जीएनके इंटर कॉलेज, सिविल लाइंस से कलेक्ट्रेट तक पैदल रैली निकालकर अपनी नाराजगी जताने पहुंचे। रैली में टीईटी की अनिवार्यता खत्म करने की मांग भी की गई। शिक्षक संघ के प्रतिनिधिमंडल ने डीएम के माध्यम से प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को ज्ञापन भी सौंपा।

संघ के संरक्षक राकेश बाबू पाण्डेय ने कहा कि 29 जुलाई 2011 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर को एक आदेश दिया था। आदेश में कहा गया कि अगर दो साल में टीईटी नहीं पास किया तो सभी शिक्षकों को नौकरी से हटा दिया जाएगा। पाण्डेय ने कहा, “जब शिक्षक उस समय नौकरी में आए थे, तब उन्होंने सभी आवश्यक योग्यताएँ पूरी की थीं। अब 20-25 साल सेवा देने के बाद टीईटी पास करना अनिवार्य करना न्यायोचित नहीं है।”

उन्होंने चेतावनी दी कि अगर केंद्र और राज्य सरकार इस “काले कानून” को वापस नहीं लेती, तो शिक्षक लखनऊ और दिल्ली में लगातार आंदोलन करेंगे। रैली में शिक्षक नेता हेमराज सिंह गौर, राकेश तिवारी, अनिल सचान, मोहित मनोहर तिवारी, राजेश शर्मा, दिनेश त्रिपाठी, साजिद, सत्येन्द्र कुमार, सुरेन्द्र तिवारी, राजकुमार अग्निहोत्री, अरविंद शुक्ला, सुशेन्द्र सचान, प्रणव, पुष्पेन्द्र सिंह, पीयूष शुक्ला, शिव गोविन्द, नरेन्द्र द्विवेदी, मुलायम सिंह, प्रदीप अवस्थी और कमलेश वर्मा मौजूद रहे।

जानकारी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के आदेश से जिले के आठवीं तक के सरकारी स्कूलों में पदस्थ 6195 में से करीब 3742 शिक्षक प्रभावित हो सकते हैं। फिलहाल, बीएसए कार्यालय को शासन से इस फैसले पर अमल करने के लिए पत्र आने का इंतजार है।

प्राथमिक शिक्षक संघ के कार्यवाहक जिलाध्यक्ष वेद प्रकाश त्रिपाठी ने कहा, “टीईटी की अनिवार्यता का पुरजोर विरोध किया जाएगा। हमारी मांग है कि 2011 से पहले नियुक्त पुराने शिक्षकों के लिए टीईटी की अनिवार्यता खत्म की जाए, ताकि उनके सामने नौकरी का संकट न आए।”

संघ के जिला मंत्री जयवीर सिंह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय सरकारी शिक्षकों के हित में नहीं है। सरकार से मांग है कि वह शिक्षकों के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखें और टीईटी की अनिवार्यता समाप्त हो।