कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी पर भद्रा का साया, जानिए 3 जुलाई को पूजा का सबसे शुभ समय और सही विधि
नई दिल्ली ब्यूरो: हिंदू धर्म में भगवान गणेश जी की आराधना के लिए संकष्टी चतुर्थी व्रत का विशेष महत्व है। इस साल आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी का व्रत 3 जुलाई 2026, शुक्रवार के दिन रखा जाएगा। मान्यता है कि इस दिन विघ्नहर्ता भगवान गणेश की पूरे विधि-विधान और सच्चे मन से उपासना करने से जीवन में आ रही सभी बाधाएं, संकट और आर्थिक परेशानियां दूर हो जाती हैं।
इस बार व्रत के दिन सुबह के समय भद्रा का साया भी रहने वाला है, जिससे व्रती जनों के मन में संशय है। आइए द्रिक पंचांग के अनुसार जानते हैं भद्रा का समय, उसका प्रभाव और पूजा-पाठ के सभी शुभ मुहूर्त।
संकष्टी चतुर्थी पर भद्रा का साया: क्या प्रभावित होगी पूजा?
पंचांग के अनुसार, 3 जुलाई को सुबह 05:17 मिनट से लेकर 11:20 मिनट तक भद्रा का साया रहेगा। शास्त्रों के अनुसार भद्रा काल में शुभ व मांगलिक कार्यों की मनाही होती है।
राहत की खबर: ज्योतिष शास्त्र के नियमों के मुताबिक, भद्रा का शुभ या अशुभ प्रभाव चंद्रमा की राशि स्थिति पर निर्भर करता है। इस दिन चंद्रमा मकर राशि में विराजमान रहने वाले हैं। ज्योतिष गणना के अनुसार, जब भी चंद्रमा मकर राशि में होते हैं, तो भद्रा का प्रभाव पृथ्वी लोक पर मान्य नहीं होता है। इसलिए श्रद्धालुओं को घबराने की आवश्यकता नहीं है, आपकी पूजा और व्रत में कोई बाधा नहीं आएगी।
पूजा-पाठ के सभी शुभ मुहूर्त (Auspicious Timings)
3 जुलाई 2026 को भगवान गणेश की पूजा और अन्य शुभ कार्यों के लिए पंचांग में कई श्रेष्ठ मुहूर्त बन रहे हैं, जो इस प्रकार हैं:
| मुहूर्त का नाम | समय (Time) | महत्व |
|---|---|---|
| ब्रह्म मुहूर्त | सुबह 03:55 बजे से 04:36 बजे तक | ईश्वर ध्यान और संकल्प के लिए सर्वोत्तम |
| सर्वार्थ सिद्धि योग | सुबह 05:17 बजे से 11:46 बजे तक | कार्यों में निश्चित सफलता के लिए |
| अभिजित मुहूर्त | सुबह 11:43 बजे से दोपहर 12:38 बजे तक | दिन का सबसे शक्तिशाली शुभ समय |
| विजय मुहूर्त | दोपहर 02:28 बजे से 03:24 बजे तक | विशेष कार्यों की शुरुआत के लिए |
| गोधूलि मुहूर्त | शाम 07:03 बजे से 07:23 बजे तक | संध्या आरती और पूजा के लिए |
भगवान गणेश की चरणबद्ध पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)
कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी के दिन बप्पा को प्रसन्न करने के लिए इस विधि से पूजा करें:
जलाभिषेक: सुबह स्नान के बाद साफ वस्त्र धारण करें और तांबे के लोटे से भगवान गणेश जी का जलाभिषेक करें।
श्रृंगार और तिलक: गणेश जी को लाल या पीले पुष्प, दूर्वा (दूब घास) और फल अर्पित करें। इसके बाद उन्हें पीला चंदन या सिंदूर का तिलक लगाएं।
भोग: बप्पा के प्रिय तिल के लड्डू या मोदक का भोग लगाएं।
कथा का पाठ: कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ करें या श्रवण करें।
मंत्र जाप: पूजा के दौरान 'ॐ गं गणपतये नमः' मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें।
आरती: घी का दीपक जलाकर पूरी श्रद्धा के साथ भगवान गणेश जी की आरती गाएं।
चंद्र दर्शन व अर्घ्य: संकष्टी चतुर्थी का व्रत रात में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही पूरा होता है। इसलिए रात को चंद्रोदय के बाद दर्शन करें और दूध व जल मिश्रित अर्घ्य दें।
पारण व क्षमा प्रार्थना: अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण (भोजन) करें और पूजा में हुई किसी भी अनजानी भूल के लिए भगवान से क्षमा प्रार्थना करें।