तनाव के साये में सऊदी अरब का बड़ा आर्थिक कदम: पश्चिमी कंसल्टिंग फर्मों के नए कॉन्ट्रैक्ट्स पर लगाई रोक
India News Live,Digital Desk : पश्चिम एशिया में जारी अमेरिका-ईरान संघर्ष की तपिश अब सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था तक पहुंच गई है। तनाव के बीच सऊदी अरब ने बड़ा फैसला लेते हुए देश में कार्यरत कई प्रमुख पश्चिमी परामर्श (कंसल्टिंग) कंपनियों के साथ होने वाले नए अनुबंधों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। इतना ही नहीं, रिपोर्टों के अनुसार कुछ पुराने भुगतानों में भी देरी की जा रही है, जिसने वैश्विक स्तर पर हलचल मचा दी है।
क्यों लिया गया यह सख्त फैसला?
वित्तीय जानकारों का मानना है कि रियाद द्वारा उठाया गया यह कदम बढ़ते वित्तीय घाटे और तेल से होने वाली आय पर पड़े नकारात्मक असर का नतीजा है। पिछले तीन महीनों से जारी अमेरिका-इजरायल-ईरान संघर्ष ने होर्मुज स्ट्रेट के समुद्री मार्गों को बुरी तरह प्रभावित किया है। इस भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण वैश्विक ऊर्जा कीमतों में भारी उछाल आया है, आपूर्ति श्रृंखलाएं (Supply Chain) बाधित हुई हैं और कई जरूरी चीजों की कमी देखने को मिली है। इसका सीधा असर सऊदी अरब के राजस्व पर पड़ रहा है।
विजन 2030 पर क्या होगा असर?
सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की महत्वाकांक्षी 'विजन 2030' योजना, जिसका लक्ष्य तेल पर निर्भरता खत्म करना और अर्थव्यवस्था का विविधीकरण करना है, पर भी इस फैसले के प्रभाव की चर्चा तेज है। विशेषज्ञों के अनुसार, रियाद सरकारी खर्चों पर लगाम कसकर अपनी प्राथमिकताओं को फिर से निर्धारित कर रहा है। साथ ही, ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट को अवरुद्ध करने की धमकियों और लाल सागर में सुरक्षा चिंताओं के कारण सऊदी अरब को अपने रक्षा बजट और बुनियादी ढांचे पर पहले से अधिक खर्च करना पड़ रहा है, जिससे बजट पर दबाव बढ़ गया है।
परामर्श कंपनियों की क्या है स्थिति?
फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, मैकिन्से, बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (बीसीजी) और 'बिग फोर' जैसी बड़ी वैश्विक कंपनियों को अनौपचारिक संकेत दे दिए गए हैं कि फिलहाल नए अनुबंधों पर रोक रहेगी। कुछ अधिकारियों का कहना है कि जुलाई तक भुगतानों को टालने के संकेत मिले हैं। हालांकि, सऊदी वित्त मंत्रालय ने इन दावों का खंडन करते हुए कहा है कि सरकार विजन 2030 के उद्देश्यों के प्रति प्रतिबद्ध है और 2026 में 99.5 प्रतिशत बिलों का भुगतान तय समय पर किया गया है।
थम नहीं रहा मिडिल ईस्ट का संकट
28 फरवरी 2026 को शुरू हुए संघर्ष के बाद भले ही अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम की घोषणा हुई हो, लेकिन जमीनी हालात अभी भी तनावपूर्ण हैं। वार्ता फिलहाल ठप्प पड़ी है और होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान का नियंत्रण खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बना हुआ है। ईरान ने खाड़ी देशों पर हमलों के आरोप भी लगाए हैं, जिन्हें सऊदी अरब और यूएई ने सिरे से खारिज किया है। तनाव का यह दौर न केवल सुरक्षा, बल्कि क्षेत्रीय आर्थिक स्थिरता के लिए भी एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है।