'राघव चड्ढा कोई गांधी नहीं हैं': उनके BJP में जाने पर अवध ओझा का तीखा हमला, 'राइट टू रिकॉल' के लिए आंदोलन का आह्वान

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India News Live,Digital Desk : आम आदमी पार्टी (AAP) छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थामने वाले राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा इन दिनों चौतरफा हमलों का सामना कर रहे हैं। अब मशहूर शिक्षक और पूर्व 'आप' नेता अवध ओझा ने भी इस मुद्दे पर अपनी बेबाक राय रखी है। एक इंटरव्यू के दौरान ओझा ने राघव चड्ढा के पाला बदलने को 'विलासिता' और 'संघर्ष की कमी' से जोड़ते हुए देश में एक नए सत्याग्रह की जरूरत बताई है।

"सुविधा भोगने वालों में संघर्ष की क्षमता नहीं होती"

यूट्यूब चैनल 'Dyuti' पर साझा किए गए वीडियो में अवध ओझा ने कहा कि राघव चड्ढा के भाजपा में जाने पर इतना हंगामा क्यों बरपा है? उन्होंने तर्क दिया कि जो व्यक्ति लंबे समय तक विलासिता और सुख-सुविधाओं के बीच रहता है, उसके भीतर लड़ने की शक्ति खत्म हो जाती है। ओझा के बयान के मुख्य अंश:

गांधी बनाम राघव: ओझा ने कहा, "राघव चड्ढा कोई महात्मा गांधी नहीं हैं जो आश्रम में रहकर चरखा चलाएं। गांधी, भगत सिंह या चंद्रशेखर आजाद को तोड़ना नामुमकिन था क्योंकि उन्होंने संघर्ष को ही अपना आनंद बना लिया था।"

पाला बदलने की मजबूरी: उन्होंने कटाक्ष किया कि जैसे ही ऐसे नेताओं को सामने संघर्ष या कठिनाई दिखाई देती है, वे तुरंत सुरक्षित ठिकाने की तलाश में पाला बदल लेते हैं।

'90 फीसदी नेता विलासिता में डूबे हैं'

अवध ओझा ने केवल राघव चड्ढा ही नहीं, बल्कि देश की वर्तमान राजनीति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि देश के 90 फीसदी नेता विलासिता में डूबे हुए हैं।

सत्ता का लालच: ओझा ने कहा कि अगर आज पाकिस्तान भी इन नेताओं को सत्ता का न्योता दे दे, तो ये वहां चले जाएंगे।

चीन बनाम पाकिस्तान: उन्होंने इस बात पर भी हैरानी जताई कि भारतीय नेता अक्सर पाकिस्तान का नाम लेते हैं लेकिन कोई चीन का नाम नहीं लेता, जबकि असल चुनौती कहीं और है।

'राइट टू रिकॉल' (Right to Recall) के लिए सत्याग्रह की मांग

नेताओं द्वारा बार-बार पाला बदलने और जनता के भरोसे को तोड़ने के मुद्दे पर अवध ओझा ने एक बड़ा समाधान पेश किया। उन्होंने कहा कि अब देश में एक सत्याग्रह और आंदोलन की जरूरत है ताकि जनता को 'राइट टू रिकॉल' मिल सके।

"इस देश का असली राजा जनता है। अगर कोई जनप्रतिनिधि जनता की आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतर रहा या बीच में पाला बदल रहा है, तो जनता के पास यह अधिकार होना चाहिए कि वह उसकी सदस्यता रद्द कर उसे वापस बुला सके।"

क्या है 'राइट टू रिकॉल'?

यह एक ऐसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया है जिसमें मतदाता अपने निर्वाचित प्रतिनिधि को उसका कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही पद से हटा सकते हैं। वर्तमान में भारत में लोकसभा या विधानसभा स्तर पर यह कानून लागू नहीं है। अवध ओझा का मानना है कि जब तक यह डर नेताओं में नहीं होगा, तब तक पाला बदलने का यह खेल जारी रहेगा।

राघव चड्ढा के बीजेपी में जाने के बाद सोशल मीडिया पर मचे घमासान के बीच अवध ओझा का यह 'सिद्धांत' युवाओं के बीच काफी चर्चा बटोर रहा है।