शांतिदूत या रणनीतिक चाल? एक तरफ ईरान से वार्ता, दूसरी ओर सऊदी को लड़ाकू विमान; पाकिस्तान की 'डबल गेम' बेनकाब
India News Live,Digital Desk : पश्चिम एशिया में मंडराते युद्ध के बादलों के बीच पाकिस्तान एक बेहद खतरनाक और दोहरी बिसात बिछाता नजर आ रहा है। एक तरफ इस्लामाबाद खुद को अमेरिका और ईरान के बीच शांति स्थापित करने वाले मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर खबरें हैं कि उसने सऊदी अरब के साथ एक 'गुप्त रक्षा सौदे' (Private Defense Deal) के तहत अपने लड़ाकू विमान सऊदी अरब भेज दिए हैं। पाकिस्तान का यह कदम न केवल ईरान को चौंका सकता है, बल्कि पूरे मध्य-पूर्व के समीकरणों को और भी पेचीदा बना सकता है।
पाक-सऊदी 'प्राइवेट डील': क्या है इस समझौते की हकीकत?
मीडिया रिपोर्ट्स और सामरिक विश्लेषकों के अनुसार, पाकिस्तान ने शनिवार को सऊदी अरब के किंग अब्दुलअजीज एयर बेस पर अपने फाइटर जेट्स और सपोर्ट एयरक्राफ्ट की एक बड़ी टुकड़ी तैनात की है।
एकतरफा बाध्यता: यह तैनाती 2025 में हुए एक गोपनीय समझौते (SMDA) के तहत की गई है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस समझौते में पाकिस्तान, सऊदी अरब की रक्षा के लिए अपनी सेना भेजने को बाध्य है, लेकिन पाकिस्तान पर हमला होने की स्थिति में सऊदी अरब की ओर से ऐसी कोई समान शर्त नहीं है।
दशकों पुराना सहयोग: यह समझौता 1982 और 2005 के पुराने रक्षा सहयोग का विस्तार है, जिसे 2025 में अंतिम रूप दिया गया। इसके तहत सऊदी की संप्रभुता और हितों की रक्षा की जिम्मेदारी पाकिस्तान ने अपने कंधों पर ली है।
ईरान के साथ 'धोखा' या मजबूरी?
पाकिस्तान की यह 'प्राइवेट डील' उसे एक बेहद असहज स्थिति में खड़ा करती है। इसके पीछे के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं:
शांति वार्ता की मेजबानी: हाल ही में पाकिस्तान ने इस्लामाबाद में अमेरिकी और ईरानी प्रतिनिधिमंडलों के बीच युद्धविराम वार्ता कराई। हालांकि यह बातचीत विफल रही, लेकिन पाकिस्तान खुद को 'न्यूट्रल' दिखाने की कोशिश कर रहा था।
धार्मिक और आंतरिक समीकरण: पाकिस्तान में शिया समुदाय की एक बड़ी आबादी है जो ईरान के प्रति सहानुभूति रखती है। ऐसे में सऊदी की तरफ से ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य गतिविधि में शामिल होना पाकिस्तान के लिए आंतरिक कलह का कारण बन सकता है।
आर्थिक बेड़ियां: सऊदी अरब ने पाकिस्तान के स्टेट बैंक में 5 अरब डॉलर से अधिक की रकम जमा कर रखी है। कंगाली की कगार पर खड़े पाकिस्तान के लिए यह आर्थिक मदद किसी ऑक्सीजन से कम नहीं है, जिसके बदले उसे सऊदी के सैन्य एजेंडे को मानना पड़ रहा है।
क्षेत्रीय तनाव और पाकिस्तान का भविष्य
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान और अमेरिका या सऊदी अरब के बीच तनाव बढ़ता है, तो पाकिस्तान अनचाहे ही इस युद्ध में खिंचा चला आएगा। 21 अप्रैल को युद्धविराम की समयसीमा समाप्त हो रही है। यदि इसके बाद सैन्य टकराव बढ़ता है, तो पाकिस्तान की 'शांतिदूत' वाली छवि पूरी तरह ध्वस्त हो सकती है। सवाल यह उठता है कि क्या पाकिस्तान अपनी आर्थिक जरूरतों के लिए ईरान जैसे पड़ोसी और भरोसेमंद देश के साथ विश्वासघात करने को तैयार है?