बंगाल में समान नागरिक संहिता का रास्ता साफ! सीएम शुभेंदु ने किया हाई-लेवल कमेटी का एलान
पश्चिम बंगाल की राजनीति और विधायी इतिहास में एक बेहद ऐतिहासिक और बड़ा मोड़ सामने आया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने राज्य में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने की विधायी प्रक्रिया सोमवार को औपचारिक रूप से शुरू कर दी। उन्होंने विधानसभा में घोषणा करते हुए बताया कि प्रस्तावित यूसीसी कानून का खाका और मसौदा तैयार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में एक उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन कर दिया गया है। सीएम ने बताया कि इस समिति को 4 हफ्ते के भीतर अपनी विस्तृत सिफारिशें सरकार को सौंपने का निर्देश दिया गया है।
अगस्त के विधानसभा सत्र में पेश होगा ऐतिहासिक विधेयक
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के अनुसार, कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद आगामी अगस्त 2026 में आयोजित होने वाले विधानसभा के विस्तारित बजट सत्र के दौरान सरकार के लिए यूसीसी विधेयक (UCC Bill) पेश करने का रास्ता पूरी तरह साफ हो जाएगा। मौजूदा विधानसभा सत्र के आखिरी दिन सदन को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने बताया कि राज्य मंत्रिमंडल (Cabinet) आगामी 2 जुलाई को होने वाली अपनी महत्वपूर्ण बैठक में इस मसौदा विधेयक पर गहन विचार-विमर्श करेगी, ताकि इसे अंतिम रूप देकर विधानसभा पटल पर रखा जा सके।
बीजेपी सरकार का सबसे बड़ा चुनावी वादा होगा पूरा
पश्चिम बंगाल में यूसीसी लागू करने का यह कदम भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार की अब तक की सबसे बड़ी और अहम विधायी पहलों में से एक माना जा रहा है। यह कदम बीजेपी के चुनावी घोषणा-पत्र में बंगाल की जनता से किए गए एक प्रमुख और सबसे बड़े वादे को पूरा करता है। अधिकारी ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित कानून को गुजरात समान नागरिक संहिता विधेयक 2026, असम यूसीसी कानून और उत्तराखंड समान नागरिक संहिता अधिनियम 2024 के सफल मॉडलों के गहन अध्ययन और आधार पर ही तैयार किया जा रहा है।
आदिवासी और जनजातीय समुदायों को मिलेगी विशेष छूट
विपक्ष के तमाम आरोपों और चिंताओं को खारिज करते हुए मुख्यमंत्री ने एक बेहद महत्वपूर्ण घोषणा की। उन्होंने साफ किया कि पश्चिम बंगाल के प्रस्तावित कानून में राज्य के मूल निवासी, आदिवासी, कुड़मी और आधिकारिक तौर पर मान्यता प्राप्त अन्य सभी जनजातीय (Tribal) समुदायों की परंपराओं का पूरा सम्मान किया जाएगा। इन सभी वर्गों को यूसीसी के दायरे से पूरी तरह छूट दी जाएगी, ठीक उसी तरह जैसे उत्तराखंड और गुजरात के यूसीसी मॉडल के तहत इन समुदायों को कानूनी संरक्षण और छूट प्रदान की गई है।
इन 9 प्रमुख क्षेत्रों पर लागू होगा एक समान कानून
शुभेंदु अधिकारी ने सदन में उन 9 मुख्य सामाजिक और कानूनी क्षेत्रों की रूपरेखा सामने रखी, जिन्हें प्रस्तावित कानून के तहत एक समान कानूनी ढांचे के दायरे में लाया जाएगा। इन क्षेत्रों में मुख्य रूप से शामिल हैं:
विवाह (शादी) और विवाह विच्छेद (तलाक)
गुजारा-भत्ता (Alimony) और भरण-पोषण
पैतृक संपत्ति का उत्तराधिकार और विरासत
बच्चों को गोद लेना (Adoption)
पारिवारिक और वैयक्तिक कानून के अन्य पहलू
ये सभी विषय वर्तमान में अलग-अलग धर्मों के अपने पर्सनल लॉ (वैयक्तिक कानूनों) के आधार पर संचालित होते हैं, जो यूसीसी लागू होने के बाद सबके लिए एक समान हो जाएंगे। सीएम ने दृढ़ता से कहा, "हम अपनी बात के पक्के हैं। हमने अपने घोषणापत्र में जनता से जो भी वादे किए हैं, उन्हें हर हाल में अक्षरशः लागू किया जाएगा।"
जानिए कैसी है जस्टिस रंजना देसाई कमेटी की बनावट?
इस उच्च-स्तरीय समिति की कमान सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठित रिटायर्ड जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई को सौंपी गई है। इस विशेषज्ञ समिति में उनके अलावा:
एक सेवानिवृत्त आईएएस (IAS) अधिकारी,
एक नामी विधि विशेषज्ञ (कानूनी मामलों के जानकार),
एक लब्धप्रतिष्ठ शिक्षाविद,
एक वरिष्ठ समाजसेवी, और
राज्य प्रशासन के एक अतिरिक्त सचिव शामिल होंगे।
यह अतिरिक्त सचिव समिति के 'सदस्य सचिव' के रूप में कार्य करेंगे और इसके समस्त प्रशासनिक व कागजी कामकाज की देखरेख करेंगे। यह कमेटी बंगाल में वर्तमान में लागू सभी वैयक्तिक और पारिवारिक कानूनों की व्यापक समीक्षा करेगी और अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपने से पहले आम जनता और सभी संबंधित पक्षों से सुझाव व विचार आमंत्रित करेगी।
विपक्ष ने सदन में काटा भारी हंगामा और की नारेबाजी
जैसे ही मुख्यमंत्री ने यूसीसी कमेटी का एलान किया, सदन में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बंद्योपाध्याय के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के विधायकों ने प्रस्तावित कानून के विरोध में जोरदार हंगामा शुरू कर दिया और सरकार विरोधी नारे लगाए। विपक्ष के इस वॉकआउट और नारेबाजी पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि यह पूरी तरह लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। जिन भी राजनीतिक दलों या व्यक्तियों को इस कानून को लेकर कोई आपत्ति, संशय या रचनात्मक सुझाव है, वे बिना किसी डर के सीधे उच्च-स्तरीय समिति के समक्ष अपने विचार लिखित रूप में सौंप सकते हैं।