पहलगाम हमले की बरसी: क्यों कश्मीर की वादियों में गूंज रहा एकनाथ शिंदे का नाम? शहीद आदिल के परिवार ने बताया 'इंसानियत का रिश्ता'
India News Live,Digital Desk : जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में पिछले साल हुए भीषण आतंकी हमले की बरसी पर आज पूरा देश उन मासूमों और वीरों को याद कर रहा है, जिन्होंने दहशतगर्दों की गोलियों का सामना किया। इस भावुक माहौल के बीच कश्मीर से लेकर महाराष्ट्र तक एक नाम की खूब चर्चा हो रही है—वह है महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे। पहलगाम के स्थानीय लोग और खासकर एक शहीद का परिवार शिंदे की तारीफ करते नहीं थक रहा है।
शहीद सैयद आदिल हुसैन: जिसने मजहब नहीं, इंसानियत देखी
22 अप्रैल 2025 को जब पाकिस्तानी आतंकियों ने पहलगाम में पर्यटकों को निशाना बनाया, तब स्थानीय कश्मीरी युवक सैयद आदिल हुसैन शाह ढाल बनकर खड़ा हो गया। आतंकियों ने जब पर्यटकों का मजहब पूछकर उन्हें मारना शुरू किया, तो आदिल ने अपनी जान की परवाह किए बिना कई लोगों को सुरक्षित बचाया, लेकिन इस संघर्ष में वह खुद शहीद हो गया। आदिल की इस बहादुरी ने 'कश्मीरियत' और 'इंसानियत' की एक नई मिसाल पेश की।
मजहब की दीवार लांघकर बढ़ाया मदद का हाथ
आदिल की शहादत की खबर जब महाराष्ट्र पहुंची, तो एकनाथ शिंदे ने तुरंत आर्थिक और भावनात्मक मदद का हाथ बढ़ाया। आदिल के पिता हैदर शाह ने नम आंखों से बताया, "हम शिंदे साहब के बहुत शुक्रगुजार हैं। जब पिछले साल यह हादसा हुआ, तब से लेकर आज तक वह और उनके लोग हमारे साथ खड़े हैं। उन्होंने न मजहब देखा और न दूरी, बस एक वादा किया और उसे निभाया।"
वादे के मुताबिक बनकर तैयार हुआ 'आशियाना'
आदिल के भाई सैयद नौशाद ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि हमले के वक्त उनके पास रहने को ठीक से छत भी नहीं थी। एकनाथ शिंदे ने तब न केवल 5 लाख रुपये की नकद मदद दी, बल्कि परिवार को एक पक्का मकान बनाकर देने का वादा भी किया था।
राशन और मकान: शिंदे की टीम लगातार परिवार के संपर्क में रही और एक साल के भीतर घर बनकर तैयार हो गया।
उद्घाटन की तैयारी: अब यह मकान पूरी तरह तैयार है और जल्द ही इसका उद्घाटन होना है। परिवार का कहना है कि यह घर सिर्फ ईंट-पत्थरों का नहीं, बल्कि शिंदे साहब के प्यार और आदिल की बहादुरी का प्रतीक है।
ऑपरेशन सिंदूर और पहलगाम की यादें
पहलगाम हमले के बाद भारत ने 'ऑपरेशन सिंदूर' के जरिए सीमा पार आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद किया था। आज बरसी के मौके पर जहां सेना के शौर्य की चर्चा हो रही है, वहीं एकनाथ शिंदे द्वारा कश्मीर में निभाई गई इस 'इंसानियत की डोर' ने लोगों का दिल जीत लिया है। स्थानीय प्रशासन और पर्यटकों ने भी आदिल के स्मारक पर पहुंचकर उसे श्रद्धांजलि दी।