मुसीबत में फिर काम आया पुराना यार: कंगाली की कगार पर खड़े मालदीव को भारत ने दिए 30 अरब रुपये
India News Live,Digital Desk : 'पड़ोसी पहले' की नीति को चरितार्थ करते हुए भारत एक बार फिर मालदीव के लिए संकटमोचक बनकर उभरा है। गंभीर आर्थिक तंगी और घटते विदेशी मुद्रा भंडार से जूझ रही मोहम्मद मुइज्जू सरकार को राहत देते हुए भारत ने 30 अरब रुपये (लगभग 400 मिलियन डॉलर) की पहली किश्त जारी कर दी है। माले स्थित भारतीय उच्चायोग ने गुरुवार को इस वित्तीय मदद की पुष्टि की, जो मालदीव की डगमगाती अर्थव्यवस्था को संभालने में संजीवनी का काम करेगी।
राष्ट्रपति मुइज्जू की भारत यात्रा और वो 'गेम चेंजर' डील
मालदीव को मिली यह बड़ी सहायता SAARC करेंसी स्वैप फ्रेमवर्क के तहत दी गई है। गौरतलब है कि अक्टूबर 2024 में जब मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू भारत दौरे पर आए थे, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी द्विपक्षीय वार्ता में इस करेंसी स्वैप समझौते पर अंतिम मुहर लगी थी। हालांकि, मुइज्जू सरकार के शुरुआती कार्यकाल में दोनों देशों के रिश्तों में कुछ कड़वाहट देखी गई थी, लेकिन आर्थिक संकट गहराने पर मुइज्जू ने भारत की ओर ही दोस्ती का हाथ बढ़ाया।
आखिर क्यों डूब रही है मालदीव की अर्थव्यवस्था?
मालदीव वर्तमान में कई मोर्चों पर वित्तीय चुनौतियों का सामना कर रहा है। पर्यटन पर टिकी इस द्वीपीय देश की अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा की भारी कमी हो गई है। बढ़ते अंतरराष्ट्रीय कर्ज और राजस्व के सीमित साधनों के कारण मालदीव पर डिफॉल्ट होने का खतरा मंडरा रहा था। ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा जारी की गई यह राशि मालदीव को भुगतान संतुलन बनाए रखने और जरूरी वस्तुओं के आयात में मदद करेगी।
आंकड़ों की जुबानी: भारत की दरियादिली का इतिहास
भारत केवल आज ही नहीं, बल्कि दशकों से मालदीव का सबसे भरोसेमंद साथी रहा है।
1.1 अरब डॉलर: साल 2012 में करेंसी स्वैप फ्रेमवर्क शुरू होने के बाद से अब तक भारत मालदीव को इतनी बड़ी राशि की वित्तीय मदद दे चुका है।
100 मिलियन डॉलर: पिछले साल ही भारत ने मालदीव के अनुरोध पर ट्रेजरी बिल्स को 'रोलओवर' किया था, ताकि मुइज्जू सरकार पर तत्काल कर्ज चुकाने का दबाव कम हो सके।
तत्काल सहायता: किसी भी प्राकृतिक आपदा या पानी के संकट के दौरान 'ऑपरेशन नीर' जैसी पहलों के जरिए भारत ने हमेशा 'फर्स्ट रिस्पॉन्डर' की भूमिका निभाई है।
क्या है करेंसी स्वैप और कैसे मिलेगी इससे राहत?
SAARC करेंसी स्वैप फ्रेमवर्क दरअसल दक्षिण एशियाई देशों के लिए एक 'सुरक्षा कवच' की तरह है। इसके तहत सदस्य देश जरूरत पड़ने पर अपनी स्थानीय मुद्रा के बदले अमेरिकी डॉलर या यूरो जैसी विदेशी मुद्रा ले सकते हैं। मालदीव जैसे देश, जो अपनी जरूरतों के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर हैं, उनके लिए यह व्यवस्था बाजार में स्थिरता लाने और मुद्रा की वैल्यू को गिरने से बचाने के लिए बेहद कारगर साबित होती है।