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September 26 2026 09:49 pm

दलित सियासत के इर्द-गिर्द घूमेगा UP विधानसभा चुनाव? आंकड़ों और नए सियासी समीकरणों ने बदला चुनावी गणित

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उत्तर प्रदेश के सियासी अखाड़े में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है, लेकिन इस बार का चुनावी नैरेटिव अतीत के पारंपरिक सवर्ण समीकरणों से कहीं ज्यादा दलित और हाशिए के वर्गों की सियासत पर केंद्रित नजर आ रहा है। राज्य की कुल आबादी में करीब 21 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाला दलित मतदाता वर्ग हमेशा से सूबे की सत्ता की चाबी अपने पास रखता आया है। पिछले कुछ चुनावों के रुझानों, लोकसभा परिणामों और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के पारंपरिक वोट बैंक में आई टूट ने यह साफ कर दिया है कि 403 सीटों वाली विधानसभा में सरकार बनाने के लिए दलित समुदाय का समर्थन ही सबसे बड़ा निर्णायक कारक साबित होने वाला है। यही वजह है कि सत्ताधारी भाजपा से लेकर मुख्य विपक्षी समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी अपनी पूरी चुनावी रणनीति दलित केंद्रित मुद्दों पर तैयार कर रही हैं।

आबादी और सीटों का गणित: 21 फीसदी वोट और 86 आरक्षित सीटों का खेल

उत्तर प्रदेश में चुनावी जीत का मार्ग काफी हद तक आरक्षित सीटों के प्रदर्शन से तय होता है। राज्य में विधानसभा की कुल 403 सीटों में से 84 सीटें अनुसूचित जाति (SC) और 2 सीटें अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित हैं। राज्य की करीब 21 फीसदी दलित आबादी में जाटव समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 54 फीसदी है, जबकि गैर-जाटव दलितों—जिनमें पासी, कोरी, धोबी, वाल्मीकि और खटीक जैसी जातियां शामिल हैं—की हिस्सेदारी करीब 46 फीसदी बैठती है।

चुनावी आंकड़े बताते हैं कि 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा गठबंधन ने इन 84 आरक्षित सीटों में से 69 से अधिक सीटों पर जीत दर्ज की थी, जो 2022 में भी करीब 69 सीटों के साथ उसकी सत्ता वापसी का आधार बनीं। हालांकि, हाल के लोकसभा चुनावों में जब विपक्ष ने संविधान और आरक्षण के मुद्दे को धार दी, तो गैर-जाटव और जाटव दोनों ही वर्गों के मतदान पैटर्न में स्पष्ट बिखराव देखा गया, जिसने राजनीतिक दलों को अपनी प्राथमिकताएं बदलने पर मजबूर कर दिया।

बसपा के पारंपरिक दुर्ग में सेंधमारी और बदलता वोट शेयर

ऐतिहासिक रूप से मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) दलित राजनीति का निर्विवाद केंद्र रही है, जिसका 2007 में वोट शेयर 30 फीसदी से अधिक था और उसने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। हालांकि, पिछले एक दशक में बसपा के वोट शेयर में आई तेज गिरावट ने राज्य में एक बड़ा राजनीतिक शून्य पैदा कर दिया है। 2017 में बसपा का वोट शेयर गिरकर 22.2 फीसदी और 2022 में महज 12.8 फीसदी पर सिमट गया, जहां पार्टी को केवल 1 सीट नसीब हुई।

इस गिरावट से जो खाली जगह बनी, उस पर भाजपा और सपा दोनों ने अपने-अपने तरीके से कब्जा करने की कोशिश की। भाजपा ने कल्याणकारी योजनाओं (मुफ्त राशन, आवास, उज्ज्वला) और प्रतिनिधित्व के जरिए गैर-जाटव दलितों को अपने पाले में जोड़ा, जबकि समाजवादी पार्टी ने अपने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के जरिए दलितों, विशेष रूप से पासी और युवा जाटव वोटरों में गहरी पैठ बनाई है।

सवर्ण एजेंडा क्यों पड़ा पीछे और दलित मुद्दे क्यों आए आगे?

उत्तर प्रदेश में सवर्ण मतदाता (ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य आदि) लगभग 18 से 20 फीसदी के आसपास हैं और उनका बड़ा हिस्सा लंबे समय से भाजपा के पारंपरिक कोर वोटर के रूप में देखा जाता रहा है। इस वर्ग का ध्रुवीकरण पहले से स्थिर होने के कारण किसी भी दल के लिए केवल सवर्णों के सहारे 202 के जादुई आंकड़े तक पहुंचना असंभव है।

दूसरी तरफ, दलित समुदाय में अधिकारों, आरक्षण, जातीय जनगणना, सरकारी नौकरियों में बैकलॉग पदों को भरने और संविधान की रक्षा जैसे मुद्दों को लेकर राजनीतिक चेतना बढ़ी है। पश्चिमी यूपी से लेकर बुंदेलखंड और पूर्वांचल तक, दलित मतदाता अब किसी एक पार्टी का बंधुआ वोट बैंक नहीं रहा। जब एक 21 फीसदी का बड़ा समूह फ्लोटिंग (निर्णायक) वोटर बन जाता है, तो पूरे चुनाव का केंद्र बिंदु सवर्ण विमर्श से हटकर सामाजिक न्याय और आनुपातिक हिस्सेदारी पर टिक जाता है।

बहुकोणीय मुकाबला: भाजपा, सपा, बसपा और चंद्रशेखर की चुनौती

आगामी विधानसभा चुनाव में दलित मतों के लिए चौतरफा खींचतान देखने को मिल रही है। भाजपा जहां बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर से जुड़े स्थलों के विकास, अनुसूचित जाति अभ्युदय योजना और गैर-जाटव नेताओं को संगठन में तरजीह देकर अपने सामाजिक समीकरण को बचाए रखने में जुटी है, वहीं अखिलेश यादव की सपा ने 'अंबेडकर वाहिनी' और पीडीए के नारे के तहत आरक्षित सीटों के साथ-साथ सामान्य सीटों पर भी दलित चेहरों को आगे बढ़ाया है।

इसके अलावा, नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) दलित युवाओं के बीच एक आक्रामक विकल्प बनकर उभरी है, जो पारंपरिक बसपा समर्थकों को अपनी ओर खींच रही है। मायावती भी अपने कोर जाटव आधार को एकजुट रखने के लिए लगातार जमीन पर सक्रिय हो रही हैं। ऐसे में यह तय है कि जो भी राजनीतिक खेमा दलित समाज की आकांक्षाओं, सुरक्षा और रोजगार के सवालों पर सबसे अधिक भरोसा दिला पाएगा, यूपी की सत्ता का ताज उसी के सिर सजेगा।