बोहरा समुदाय में प्रचलित FGM प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, केंद्र को भेजा नोटिस

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India News Live,Digital Desk : इस्लाम में प्रचलित महिला जननांग विकृति (FGM), जिसे आम भाषा में खतना कहा जाता है, अब सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े तक पहुंच गई है। दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में यह प्रथा लंबे समय से चली आ रही है, लेकिन अब एक गैर-सरकारी संगठन ने इसे पूरी तरह बंद करने की मांग करते हुए याचिका दायर की है।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार समेत संबंधित संस्थाओं को नोटिस जारी कर दिया है। कोर्ट ने सभी से इस मुद्दे पर जवाब मांगा है।

क्या है याचिका की मांग?

NGO चेतना वेलफेयर सोसाइटी का कहना है कि FGM किसी भी तरह इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। इसके चलते न सिर्फ महिलाओं, बल्कि छोटी बच्चियों के अधिकारों का उल्लंघन होता है। संगठन ने कोर्ट से इस प्रथा पर तत्काल रोक लगाने की मांग भी की है।

कानून क्या कहता है?

याचिकाकर्ता के अनुसार, FGM पर रोक लगाने के लिए अभी तक कोई अलग कानून नहीं बनाया गया है। लेकिन इसे BNS की धारा 113, 118(1) और 118(3) के तहत अपराध माना जा सकता है।
इसके अलावा, पॉक्सो अधिनियम में भी बिना किसी मेडिकल कारण के बच्चों के जननांगों से छेड़छाड़ को अपराध की श्रेणी में रखा गया है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी इस प्रथा को मानवाधिकारों के उल्लंघन के रूप में देखा है।

बच्चों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर

याचिका में कहा गया है कि FGM से बच्चों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है, भविष्य में प्रसव से जुड़ी दिक्कतें हो सकती हैं, और कई मामलों में गंभीर बीमारियां भी विकसित हो सकती हैं।
कई बच्चियों को शारीरिक विकलांगता तक का सामना करना पड़ सकता है।