'Masan ki Holi' played amidst controversy: मणिकर्णिका घाट पर चिता भस्म संग उड़ा गुलाल, नागा साधुओं ने रचाया शिव का फाग

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India News Live,Digital Desk : काशी की मोक्षदायिनी नगरी में विवादों और प्रशासनिक पाबंदियों के बावजूद शनिवार को 'मसान की होली' का अद्वितीय नजारा देखने को मिला। रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर बाबा मसाननाथ को चिता की पहली भस्म अर्पित करने के साथ ही विश्व प्रसिद्ध भस्मी होली की शुरुआत हुई। हालांकि, इस बार आयोजन की शास्त्रीयता और निर्माण कार्यों को लेकर काफी खींचतान दिखी, लेकिन शिवभक्तों की आस्था के आगे अवरोध फीके पड़ गए।

पाबंदियों के बीच जुटे शिवगण: मसाननाथ के भाल लगा पहला गुलाल

प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से मणिकर्णिका घाट जाने वाली गलियों को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया था, जहाँ केवल शवयात्रा में शामिल लोगों को प्रवेश की अनुमति थी। इसके बावजूद, देश-विदेश से आए पर्यटक और स्थानीय भक्त अन्य रास्तों से घाट तक पहुंचे।

परंपरा का निर्वाह: सुबह बाबा मसाननाथ मंदिर में नागा साधुओं और संतों ने विशेष पूजा-पाठ किया। चिता की ताजी भस्म बाबा को अर्पित की गई, जिसके बाद घाट पर मौजूद जनसमूह "हर-हर महादेव" के उद्घोष के साथ एक-दूसरे पर राख उड़ाने लगा।

सुरक्षा व्यवस्था: चप्पे-चप्पे पर पुलिस बल तैनात रहा। हालांकि भीड़ पिछले वर्षों के मुकाबले थोड़ी कम रही, लेकिन उत्सव के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी।

क्यों शुरू हुआ विवाद? डोमराजा परिवार में मतभेद

इस बार आयोजन की प्राचीनता और परंपरा को लेकर तीखी बहस देखने को मिली।

विरोध: डोमराजा विश्वनाथ चौधरी ने आयोजन के खिलाफ प्रशासन को ज्ञापन सौंपा था, जिसमें इसकी शास्त्रीयता पर सवाल उठाए गए थे।

समर्थन: दूसरी ओर, डोमराजा परिवार के ही कई अन्य सदस्य आयोजन के समर्थन में खड़े नजर आए। आयोजकों का तर्क है कि यह परंपरा जीवन और मृत्यु के बीच के सहज संबंध को दर्शाती है—कि मृत्यु भी शिवत्व की तरह स्वीकार्य और उत्सव का हिस्सा है।

मान्यता: क्यों खेली जाती है भस्म की होली?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव जब माता पार्वती का गौना कराकर काशी आए, तो रंगभरी एकादशी पर उन्होंने अपने गणों को साथ नहीं लिया था ताकि उनके ससुराली जन भयभीत न हों। अपने गणों (भूत, प्रेत, पिशाच) की टीस दूर करने के लिए महादेव ने अगले दिन मणिकर्णिका महाश्मशान पर उन्हें बुलाया और उनके साथ चिता भस्म की होली खेली।

2009 से मिली विश्वव्यापी पहचान

मणिकर्णिका घाट पर इस आयोजन को वर्ष 2009 में मसाननाथ मंदिर के व्यवस्थापक गुलशन कपूर ने पुनः व्यापक स्तर पर शुरू किया था। तब से यह आयोजन काशी की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा बन चुका है, जिसमें शामिल होने के लिए अब सात समंदर पार से भी लोग वाराणसी पहुंचते हैं।